Governing the Governors & Article 356

Through its forceful intervention in political developments in Uttarakhand and Arunachal Pradesh, which were brought under President’s Rule, the Supreme Court affirmed that it would not let the letter and spirit of the SR Bommai versus Union of India verdict to die. The apex court went a step ahead to actually reinstall the regimes toppled. However, there was a technical difference between the two cases.

Rising presence of Daesh in India

Until very recently in India, there have been several interpretations of threat perceptions of Daesh or the Islamic State of Iraq and Syria (ISIS). This was primarily because few Indian Muslims joined the outfit in Syria or Iraq and there has been, so far, no attack conducted by it within the country. As a result, some do not view it as a major threat while there are others who remain wary, particularly considering the outfit’s export of terror ideology worldwide.

समान नागरिक संहिता की तत्काल आवश्यकता

हाल में भारत के लॉ कमीशन से जब केन्द्रीय सरकार ने रिपोर्ट मांगी तो एक बार फिर से ये बहस छिड़ गई कि क्या अब वक्त आ गया है जब भारत सभी नागरिकों के लिए चाहे वो किसी भी धर्म के हों, एक जैसी, समान नागरिक संहिता लागु कर सके ?

तथ्यों के प्रकाश में कश्मीर घाटी की जनता के नाम एक खुला पत्र

आतंकी बुरहान की सुरक्षा बलों के द्वारा मौत के बाद एक बार फिर पाक सेना तथा आइएसआइ ने कश्मीर घाटी को हिंसा की आग में उसी प्रकार झोंकने का प्रयास किया है जिस प्रकार पाक समर्पित तालिबान ने अफगानिस्तान में किया था। परन्तु यहां पर वे सफल नहीं होंगे क्योंकि पाक अधिग्रहित कश्मीर, ब्लूचिस्तान तथा पाकिस्तान में शिया, अहमदिया तथा अन्य अल्पसंख्यकों पर ढाये जाने वाले जुल्मों सितम की रोशनी में कोई भी कश्मीरी बुद्धिजीवी इसको अपना सहयोग नहीं देगा।

काबुल तो पाकिस्तान से दूर जाएगा ही

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान को आतंकियों का पनाहगार देश बताते हुए कहा है कि उसके साथ रिश्ते बनाए रखना अफगान हुकूमत के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। गनी का यह बयान हकीकत पर आधारित है। हालांकि जब वह सत्ता में आए थे, तब पाकिस्तान का लेकर उनकी राय कुछ अलग थी। उस समय वह पाकिस्तान के साथ दोस्ती के पक्षधर थे। इसकी वजह भी थी।

तुर्की : पर्दे के पीछे सच क्या है?

जब तुर्की का तख्ता पलट का प्रयास, या कहिये की असफल प्रयास हुआ तो मैं अहमदाबाद में था। मुझे एक व्यापारिक समारोह में भारत की राष्ट्रिय सुरक्षा के बारे में बोलना था। किसी कारणवश मेरे मेजबानों ने मुझे पहले तुर्की के बारे में कुछ शब्द बोलने को कहा, क्योंकि ज्यादातर श्रोता ये समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर उस देश में हो क्या रहा है। मैं तत्परता से इसपर बोलने को तैयार हो गया, मेरे जैसे खुद को रणनीतिक टिप्पणीकार कहने वाले लोग इस देश के बारे में ना जानें ऐसा नहीं हो सकता। इसके साथ ही सबको ये ध्यान रखना चाहिए कि तुर्की एक ऐसा देश है जो एक गंभीर रूप से संघर्षरत क्षेत्र है। साथ ही ये कोई परंपरागत युद्धों में

Minimum Support Price for Agricultural Produce

Agriculture is a sensitive subject from both the political and the economic viewpoint.

चीन का यादगार दिवस

स्थाई मध्यस्थता न्यायाधिकरण (पीसीए) ने फिलीपींस और चीन के बीच मध्यस्थता के मामले में अपना फैसला सुना दिया है। ‘‘पश्चिम फिलीपीन सागर में फिलीपींस के समुद्री अधिकार क्षेत्र में चीन के साथ विवाद’’ के मामले में फिलीपींस ने 2013 में संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (यूएनसीएलओएस) के अनुबंध VII के तहत चीन के खिलाफ मध्यस्थता कार्यवाही शुरू की थी।1 पीसीए न्यायाधिकरण ने कहा है कि दक्षिण चीन सागर में चीन को कोई ‘ऐतिहासिक अधिकार’ प्राप्त नहीं है और इसने स्कारबोरो शोआल2 द्वीप में फिलीपीन द्वारा मछली पकड़ने के उसके पारंपरिक अधिकार में हस्तक्षेप किया है। चीन ने इस फैसले को अमान्य घो

Brexit And End of Globalisation

When Britain voted to leave the European Union ( called British Exit or Brexit) the Dutch Prime minister Mark Rutte said “England has collapsed politically, constitutionally and economically.” He wasn't wrong. The vote by Britain has also impacted the unity of United Kingdom since Scotland and Northern Ireland wanted to continue in Europe while England and Wales wanted out.

Among the voters, people in the younger age group wanted to remain in compared to older cohorts. Similarly, the poor wanted out compared to the rich.

रणनीतिक धैर्य से सुलझ सकती है चीन समस्या

चीन हमेशा से भारत के लिए समस्या रहा है। ऐसा इसीलिए भी है क्योंकि चीनी स्वयं तो अबूझ हैं और दिए जा रहे संदेश या संकेत को बूझने की कोशिश में उनके वार्ताकारों को अक्सर घंटों लग सकते हैं। लेकिन ऐसा इसलिए भी है क्योंकि एक दूसरे के साथ किसी भी तरह का बुनियादी या सभ्यतागत विवाद नहीं होने के बावजूद भारत और चीन कभी सामरिक मेल-मिलाप नहीं कर पाए हैं। 1962 के सीमा संघर्ष की कड़वाहट बेशक है। दोनों देशों के आकार और क्षमताओं को देखते हुए उनके बीच मुकाबले की भावना भी है। इसके अलावा क्षेत्रीय विवाद भी हैं, जो द्विपक्षीय संबंधों के व्यापक संदर्भों में देखने पर मामूली ही लगते हैं। इसीलिए दोनों देशों को टकराव भरे