आतंकवाद से आतंक तकः अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंताजनक घटनाक्रम

आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) के कब्जे वाले क्षेत्र जब से वापस हासिल किए जाने लगे हैं, तभी से तमाम विश्लेषणों में संगठन का खात्मा होने के अनुमान लगाए जाने लगे हैं। तथाकथित खिलाफत में तेजी से घटते वित्तीय संसाधन तथा विदेशी लड़ाकों की संख्या में कमी के कारण भी ऐसी भविष्यवाणी की जा रही हैं। आईएसआईएस की धमक के बारे में जो चर्चा चल रही है, उसमें कुछ सचाई है, लेकिन इस चरमपंथी विचारधारा की पूरी तरह हार के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आते। साथ ही साथ इस बात में भी संदेह है कि दुनिया भर से लड़ाकों और समर्थकों को आकर्षित करने के लिए संगठन जिस आध्यात्मिक एवं वैचारिक आधार का सहारा

From Terrorism to Terror: Worrisome Developments for the International Community

Ever since the territories under the captivity of the terrorist organisation—Islamic State of Iraq and Syria (ISIS)—began to be recaptured, several analyses have been made predicting the outfit’s doomsday. The rapidly depleting financial sources and the reduction in the size of foreign fighters in the so-called caliphate are other attributing factors for this prognosis. While the ongoing discussions about the trampling of ISIS hold some substance, a complete defeat of its extremist ideology is nowhere in the vicinity.

Surgical Strikes and More

The surgical strikes by the Indian army on the launch pads along the Line of Control (LoC) in J&K for infiltrating terrorists into India is a long-awaited step with major implications for the future. For 55 years India has not crossed the LoC in J&K to retaliate against Pakistan’s direct aggression and acts of war through proxies. Especially after Pakistan became nuclear and its involvement in terrorism in J&K and across India assumed grave proportions, we have desisted from cross-LoC operations for fear of escalation and concern about the nuclear environment in which we are operating.

इस्लामी कट्टरपंथः जाकिर नाइकके रास्ते

पीस टीवी प्रसारण पर शिकंजा

जाकिर नाईक, मुंबई आधारित एक टेलीविजन उद्घोषक है। जाकिर नाइक का नाम हाल ही में सुर्खियों में रहा है, क्योंकि 2 जुलाई, 2016 को ढ़ाका के होले आर्टिसन बेकरी पर हुए आतंकी हमले में शामिल बांग्लादेशी युवाओं में से एक ने यह कबूल किया कि वह जाकिर नाइक के कट्टरपंथी भाषणों और व्याख्यान से प्रभावित था। उसके कुछ दिनों बाद ही 7 जुलाई को ढ़ाका के समीप ईद की नमाज के दौरान हमले की कोशिश के सिलसिले में पकड़े गए दूसरे युवक ने भी इसी तरह का बयान दिया। नाइक का नाम भारत में भी मुस्लिम युवाओं को कट्टर बनाने के मामले में सामने आया है।

पूरे विश्व में हिंसा तथा आतंक के विरूद्ध फतवा जारी करने का समय

बरेली की आला हज़रत दरगाह की संस्था मंजर-ए-इस्लाम सौदागरान ने पाकिस्तान के जमात-उल-दावा के संस्थापक तथा लश्कर-ए-तैय्यबा के प्रमुख हाफिज़ सईद के विरूद्ध फतवा जारी करते हुए उसे गैर इस्लामिक करार देते हुये हुक़्म जारी किया है कि हाफिज़ सईद के साथ सम्बन्ध रखने वाला या उसकी बातों को सुनने वाले को काफिर माना जायेगा। मुस्लिम धर्म गुरूओं का यह कदम एक स्वागत योग्य कदम है, क्योंकि काफी लम्बे समय से हाफिज सईद दक्षिण एशिया के इस हिस्से में अशान्ति तथा हिंसा का पर्याय बन चुका था।

भारत के विरूद्ध पाकिस्तान का प्रोपेगेन्डा/मनोवैज्ञानिक युद्ध

आतंकवाद को और ज्यादा प्रभावशाली तथा सफल बनाने के लिये आतंकवाद चलाने वाला देश इसके साथ प्रोपेगेन्डा तथा मनोवैज्ञानिक युद्ध का भी इस्तेमाल करता है और यही सब हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान पिछले लम्बे समय से भारत के विरूद्ध कर रहा है। जैसा कि पूरा विश्व जानता है वर्ष 1971 के बंगलादेश युद्ध में करारी हार मिलने के बाद पाकिस्तान ने भारत से बदला लेने के लिये पहले अपनी सीमा से लगते पंजाब में खालिस्तान के नाम पर आतंकवाद तथा साम्प्रदायिक फूट डालने की कोशिश की और जब वह इसमें सफल नही हुआ तो उसने अपना फोकस जम्मू कश्मीर में तथा खासकर कश्मीर घाटी पर केन्द्रित कर लिया। आतंक बुरहान वानी की मौत पर हुए हिंसक प्रर्दशन

Islamic Radicalisation: The Zakir Naik Way

Zakir Naik, a Mumbai based televangelist has been in news recently after one of the Bangladeshi youth involved in July 2, 2016 terrorist attack at the Dhaka Holey Artisan Bakery, admitted to having been influenced by the radical speeches and lectures of Zakir Naik. Soon thereafter, another youth captured in connection with attempted attack at the Eid prayer meeting near Dhaka on July 7, made similar confession. His name also cropped up in connection with radicalisation of Muslim youths in India. Obviously, he came under intense media scrutiny amidst demands for action.

भारत में दाएश की बढ़ती पैठ

कुछ समय पहले तक भारत में दाएश या इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) के खतरों की कई प्रकार से व्याख्या की जा रही थी। इसकी वजह यह थी कि कुछ भारतीय मुसलमान सीरिया अथवा इराक में इस संगठन में शामिल हो गए थे और उसके बाद से देश के भीतर किसी तरह का हमला नहीं हुआ है। नतीजतन कुछ लोगों को यह बड़ा खतरा नहीं लगता है, लेकिन कुछ लोग इस संगठन की आतंकी विचारधारा का दुनिया भर में प्रसार होता देखकर इसके बारे में चिंता जताते हैं। हकीकत यह है कि महाराष्ट्र के कल्याण से जुलाई 2014 में चार मुस्लिम युवाओं के इराक जाने पर कुछ ध्यान गया था, लेकिन उससे फौरी तौर पर कोई चिंता नहीं हुई। चिंता उनमें से एक - आरिफ मज

The Nomenclature Effect: Global Terror needs to be defined

The definition of terrorism eludes nation states in the larger international system. It is a rather arcane and perplexing situation in which the big and small nation states have not wholeheartedly attempted to decipher a globally recognized Coda for delineating the fundamentals and deleterious ramifications of the global vortex of terror, terror modules, harbouring states and the larger ensconcing rubric of the tentacled and warped ideology. Since taking over as Prime Minister in May 2014, Narendra Modi, has dexterously and religiously attempted to define and record international terrorism.

Rising presence of Daesh in India

Until very recently in India, there have been several interpretations of threat perceptions of Daesh or the Islamic State of Iraq and Syria (ISIS). This was primarily because few Indian Muslims joined the outfit in Syria or Iraq and there has been, so far, no attack conducted by it within the country. As a result, some do not view it as a major threat while there are others who remain wary, particularly considering the outfit’s export of terror ideology worldwide.