यूक्रेन में युद्ध: जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के भविष्य के लिए अभिशाप या वरदान?
PK Khup Hangzo, Associate Fellow, VIF
परिचय

यूक्रेन में रूस के आक्रमण (जो अभी जारी है) ने मुख्यतः दुनिया भर के देशों की ऊर्जा नीतियों पर फिर से विचार के लिए प्रेरित किया है और इसने नवीकरणीय ऊर्जा और विकार्बनन (डीकार्बोनाइजेशन यानी कार्बन की कमी) के उसके प्रयासों को अधिक राजनीतिक गति दे दी है। विशेष रूप से यूरोपीय देशों के लिए, यह जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल रोकने के एक राष्ट्रीय सुरक्षा तर्क को रेखांकित करता है। इसके विपरीत, यूक्रेन में जारी युद्ध भी जलवायु परिवर्तन रोकने की दिशा में की जाने वाली कवायद को पटरी से उतार सकता है। चूंकि देश ऊर्जा आपूर्ति के अपने स्रोतों को एक विविधता प्रदान करने के लिए तड़प रहे हैं, इसलिए वे जीवाश्म ईंधन की तरफ अधिक रुख कर रहे हैं। हालांकि यह एक अल्पकालिक या स्टॉपगैप उपाय माना जाता है, पर यह जीवाश्म ईंधन पर उनकी निर्भरता को मजबूत कर सकता है। भारत के लिए, यूक्रेन में जारी युद्ध जीवाश्म ईंधन पर निर्भर होने के अपने जोखिम के लिए एक कड़ा सबक देता है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ बेहतर जलवायु के लिए स्वच्छ ऊर्जा पाने की दिशा में बदलाव करने और उसकी गति को तेज करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

वरदान

यूक्रेन में युद्ध के कारण पश्चिमी देशों को रूसी तेल और गैस पर उनकी निर्भरता के मुद्दे का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ा है। यूरोप अपनी सकल तेल आवश्यकताओं की लगभग 25 फीसदी, गैस आवश्यकताओं की 45 फीसदी और कोयला जरूरतों की 45 फीसदी आपूर्ति के लिए रूस पर निर्भर करता है।[1] यह जर्मनी के लिए अधिक मायने रखता है क्योंकि वह यूरोपीय देशों में ऊर्जा का सबसे बड़ा उपभोक्ता और इसी लिहाजन वह रूस का सबसे महत्त्वपूर्ण खरीदार है। रूस अब अपने उत्पादन का लगभग 33 फीसदी तेल, 66 फीसदी से अधिक मात्रा में गैस और 50 फीसदी कोयले की आपूर्ति करता है।[2]यूक्रेन में रूसी आक्रमण के मद्देनजर, रूस से तेल और गैस का आयात रोकना या उसका इस्तेमाल न करना यूरोप के लिए एक तत्कालिक सुरक्षा तकाजा बन गया है और इसने उसे स्वच्छ ऊर्जा अपनाने की दिशा में तेजी लाने के लिए नए सिरे से प्रोत्साहित किया है। इसी के मद्देनजर, यूरोपीय आयोग ने 8 मार्च 2022 को अपनी एक नई ऊर्जा रणनीति तैयार की है, जिसके मुताबिक रूसी गैस पर निर्भरता में इस वर्ष 66 फीसदी कटौती करने और 2027 तक इसे पूरी तरह से खत्म करने की योजना है।[3] REPowerEU के नाम से जानी जाने वाली इस कार्यनीति में उच्च तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और गैर-रूसी आपूर्तिकर्ताओं से पाइपलाइन से गैस का आयात करने, बायोमिथेन और नवीकरणीय हाइड्रोजन के उत्पादन और बड़ी मात्रा में उनके आयात के माध्यम से गैस की आपूर्ति में विविधता लाना; और घरों, इमारतों, उद्योग और बिजली प्रणाली में जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करना और बुनियादी ढांचे की बाधाओं को दूर करना भी शामिल है। यह उम्मीद की गई थी कि यह ऊर्जा कार्यनीति यूरोप के स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में अग्रसरण में तेजी लाएगी और अविश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं और वाष्पशील जीवाश्म ईंधन के इतर अपनी ऊर्जा स्वतंत्रता बढ़ाएगी। इस बीच, 6 अप्रैल 2022 को, जर्मनी के वाइस-चांसलर और आर्थिक मामलों एवं जलवायु कार्रवाई मंत्री, रॉबर्ट हैबेक ने "समुद्र में, जमीन पर और छतों पर” अक्षय ऊर्जा स्रोतों का विस्तार करने वाली "टर्बोचार्ज" योजनाओं का आरंभ किया।[4] यदि यह योजना क्रियान्वित हो जाती है, तो जर्मनी 2030 तक नवीकरणीय स्रोतों के साथ अपनी ऊर्जा जरूरतों का कम से कम 80 फीसद और 2035 तक लगभग 100 फीसद उत्पादन करने में सक्षम हो जाएगा। इसी तरह के प्रयास ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में चल रहे हैं। स्पष्ट रूप से, यूक्रेन में युद्ध और ऊर्जा सुरक्षा के बारे में बढ़ती चिंताओं ने यूरोपीय देशों के साथ-साथ दुनिया के अन्य लोगों को जीवाश्म ईंधन के उपयोग पर रोक लगाने की अपनी तय समयसीमा पर तत्काल फिर से विचार करने के लिए प्रेरित किया है। यह शुद्ध शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तक पहुंचने के लिए दुनिया की दौड़ पर गहरा असर डाल सकता है और ग्लोबल वार्मिंग को वर्ष 2100 के अंत तक 1.5ºC तक सीमित कर सकता है।

अभिशाप

जब तक नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन सुचारु नहीं हो जाता है,तब तक यूरोपीय देश जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहेंगे। गैस उपलब्धता में कमी को दूर करने के लिए इन देशों ने कोयले के घरेलू उत्पादन में वृद्धि करने और कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को फिर से चालू करने का फैसला किया है। इसने एक कोयले जैसे ईंधन को एक नया जीवन दिया है, जिसे जलवायु परिवर्तन के बारे में बढ़ती चिंता के मद्देनजर पूरी तरह से हटा देने की मुहिम चलाई गई थी। उदाहरण के लिए, जर्मनी, जो कोयले से अपनी बिजली का लगभग 25 प्रतिशत उत्पन्न करता है, उसका लक्ष्य 2030 तक कोयले का उपयोग ऊर्जा आपूर्ति के मद से खत्म करना था। लेकिन जर्मनी ने ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए अब कोयला भंडारण की घोषणा की है। इसने कुछ कोयला संयंत्रों को अंतिम रूप से बंद करने में भी देरी की है, जिससे रूसी गैस आयात पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए उन्हें लंबे समय तक स्टैंडबाय पर रखा गया है।[5] ग्रीस, जो कोयले से अपनी बिजली का लगभग 10 फीसदी उत्पन्न करता है, 2023 तक कोयले के उपयोग को समाप्त करने का लक्ष्य रखता है। अब इसका उद्देश्य कोयला खनन को बढ़ावा देना और अपने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का संचालन 2028 तक बढ़ाना है। ग्रीस, जो कोयले से लगभग 10 फीसदी बिजली उत्पन्न करता है, पहले उसने 2023 तक कोयले का उपयोग खत्म करने का लक्ष्य रखा था। अब यूक्रेन में युद्ध की परिस्थिति में ग्रीस का उद्देश्य कोयला खनन को बढ़ावा देना है और अपने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के संचालन को 2028 तक बढ़ाना है। पोलैंड, जो कोयले से अपनी जरूरतों की लगभग 70 फीसदी बिजली उत्पन्न करता है, वह 2049 तक कोयले के उपयोग को समाप्त करने का लक्ष्य रखा है। अब, इन देशों के दूर के लक्ष्यों पर भी सवाल उठाया जा रहा है।[6] इस बीच, अमेरिका ने तेल के अपने आयात के विस्तार की योजना बनाई है, यहां तक कि पहले से अलग-थलग किए गए वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों की देहली तक उसने गुहार लगाई है। फ्रैकिंग और ड्रिलिंग के जरिए घरेलू अमेरिकी तेल और गैस का उत्पादन भी बढ़ रहा है। जबकि कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधन पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने को एक अस्थायी उपाय बतौर माना जाता है या इसे अल्पकालिक ऊर्जा सुरक्षा समाधान के रूप में देखा जाता है, लेकिन इससे लंबे समय तक दीर्घकालिक निर्भरता पैदा करने की आशंका है। यह पृथ्वी को कार्बन शून्य करने की यूरोप एवं दुनिया के देशों की योजनाओं को आगे खींच ले जा सकता है। यह आने वाले कई वर्षों तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन रोकने के काम को अवरुद्ध कर सकता है और इसकी वजह से जलवायु पर वैश्विक लक्ष्य पहुंच से बाहर हो सकते हैं।

इसके अलावा, यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के मद्देनजर ज्यादा से ज्यादा सैन्य खर्च की कथित आवश्यकता देशों को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

इसलिए जलवायु शमन और अनुकूलन में निवेश कार्यक्रम ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है। लेकिन सेनाएं अत्यधिक ऊर्जा उपयोगकर्ता हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिकी रक्षा विभाग तेल का दुनिया का सबसे बड़ा संस्थागत उपयोगकर्ता है और इस रूप में वह दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा संस्थागत उत्पादक है। 2017 में इसका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन स्वीडन, डेनमार्क और पुर्तगाल जैसे पूरे औद्योगिक देशों से अधिक था।[7] इस प्रकार, रक्षा और सुरक्षा पर बढ़ा हुआ ध्यान ऊर्जा की खपत को तेज कर सकता है और जलवायु कार्रवाई से संसाधनों को दूर करते हुए उत्सर्जन को बढ़ा सकता है।

यूक्रेन में युद्ध जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सहयोग पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। ग्रीनहाउस गैसों को केवल समाप्त किया जा सकता है, और वैश्विक डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है, बशर्तें अगर सारे देश एक साथ मिल कर काम करें। इसमें, रूस को एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है क्योंकि यह जीवाश्म ईंधन का एक प्रमुख उत्पादक है। वर्ष 2020 के ब्योरों के मुताबिक, यह अमेरिका के बाद दुनिया में प्राकृतिक गैस का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक (कुल वैश्विक उत्पादन की 17 फीसदी) देश है और तेल के मामले में अमेरिका और सऊदी अरब के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक (सकल वैश्विक उत्पादन का 12 फीसद) है।[8] इस बात की आशंका है कि रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के पश्चिमी देशों द्वारा की जाने वाली कार्रवाई जलवायु परिवर्तन और कार्बनशून्यता पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग के उत्साह को कम कर सकते हैं।

भारत के लिए इसका मतलब

भारत रूस के तेल और गैस का प्रमुख खरीदार नहीं है। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में रूस से इसका तेल आयात इसकी आवश्यकताओं का केवल 0.2 प्रतिशत था।[9] इस प्रकार, यूक्रेन के आक्रमण के परिणामस्वरूप रूस से ऊर्जा आपूर्ति में होने वाला व्यवधान भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे-सीधे दुष्प्रभावित नहीं करता है। हालांकि, यूक्रेन में युद्ध ने दुनिया भर में तेल और गैस की कीमत में नाटकीय वृद्धि की है और यह भारत के लिए चिंता का एक कारण है। भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा खपत करने वाला देश है और यह आयात पर अत्यधिक निर्भर है। 2021 में, इसने अपनी तेल आवश्यकताओं का 85 फीसद और मुख्य रूप से मध्य पूर्व से अपनी गैस आवश्यकताओं का 54 फीसद आयात किया है।[10] इस प्रकार, भारत वैश्विक ऊर्जा बाजार में झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है और अस्थायी संकेत हैं कि वर्तमान वैश्विक ऊर्जा सदमे देश के महत्त्वाकांक्षी स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को दुष्प्रभावित कर सकता है। 2021 में ब्रिटेन के ग्लासगो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP26) के दौरान, भारत ने अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता को 500,000 MW/500GW तक बढ़ाने और 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के साथ अपनी बिजली का कम से कम 50 प्रतिशत उत्पादन करने का संकल्प किया है। इसके अलावा, भारत ने 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने का भी वादा किया हुआ है। भारत ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। फरवरी 2022 तक, नवीकरणीय ऊर्जा 395,607.86 मेगावाट/395.60 गीगावॉट की कुल बिजली स्थापित क्षमता का 26.88 प्रतिशत था।[11] जबकि कोयला भारत में बिजली का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है और यह 28 फरवरी 2022 तक देश कुल बिजली स्थापित क्षमता का 51.54 फीसद हिस्सा है लेकिन आने वाले वर्षों में जैसे ही नवीकरणीय ऊर्जा का अधिक से अधिक उत्पादन होगा, कोयले आधारित ऊर्जा उत्पादन का हिस्सा उत्तरोत्तर घट जाएगा। हालांकि, मौजूदा वैश्विक ऊर्जा संकट भारत को कोयले पर अपनी निर्भरता बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिसका उसके पास भारी भंडार है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पर गौर किया है। उन्होंने कहा कि "कोयले पर निर्भरता, और जिस गति से हम इसके उपयोग से बाज आना चाहते हैं,उसे अब चुनौती मिलेगी।”[12] यहां तक कि अगर भारत ऊर्जा संकट को दूर करने के लिए कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता को अस्थायी रूप से बढ़ाता है, तो भी उसे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल रोकने के अपने घोषित उद्देश्य से अपना मुंह नहीं फेरना चाहिए। यदि कुछ भी हो, यूक्रेन में युद्ध और आगामी वैश्विक ऊर्जा संकट को जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता के खिलाफ चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए और भारत में नवीकरणीय ऊर्जा पर अमल तेज करना चाहिए।

पाद टिप्पणियां :

[1] “RPoEwerEU: अधिक से अधिक वहनीय, सुरक्षित एवं सतत ऊर्जा के लिए संयुक्त यूरोपीयन कार्रवाई।” यूरोपीयन कमीशन। 8 मार्च 2022. https://ec.europa.eu/commission/presscorner/detail/en/ip_22_1511
[2]विल्क्स, विलियम, वैनेसा डेज़ेम और अर्ने डेल्फ़्स। “जर्मनी फेसेज रिकनिंग फॉर रिलाइंग ऑन चीप एनर्जी।” ब्लूमबर्ग, 5 मार्च 2022. https://www.bloomberg.com/news/articles/2022-03-05/germany-faces-reckoning-for-relying-on-putin-for-cheap-energy
[3] “REPowerEU: अधिक से अधिक वहनीय, सुरक्षित एवं सतत ऊर्जा के लिए संयुक्त यूरोपीयन कार्रवाई।” यूरोपीयन कमीशन। 8 मार्च 2022. https://ec.europa.eu/commission/presscorner/detail/en/ip_22_1511
[4] “जर्मनी प्रेजेंट्स न्यू यूक्रेन-एक्सलिरेटेड रिन्यूवल्स प्लान” डीडब्ल्यू। 6 अप्रैल 2022. https://www.dw.com/en/germany-presents-new-ukraine-accelerated-renewables-plan/a-61383714#:~:text=The%20plan%20foresees%20Germany%20producing,of%20its%20energy%20with%20renewables.
[5] “ट्रैफिक लाइट कोलिएशन वांट्स टू सस्पेंड दि शटडाउन ऑफ कोल-फायर्ड पॉवर प्लांट्स” RBB24. 24 मार्च 2022. https://www.rbb24.de/studiocottbus/wirtschaft/2022/03/lausitz-kohle-stilllegung-kraftwerke-aussetzen-ausstieg-2030-habeck.html
[6] “पोलैंड विल नॉट गिव अप कोल सून, सजेस्ट ससिन।” बिजनेस इन्साइडर। 4 अप्रैल 2022. https://businessinsider.com.pl/wiadomosci/polska-niepredko-zrezygnuje-z-wegla-sugeruje-sasin/9l6j7tk
[7]क्राफोर्ड, नेटा सी.2019.“पेंटागन फ्यूल यूज, क्लाइमेट चेंज, एंड दि कॉस्ट्स ऑफ वॉर।” वॉट्सन इंस्टिट्यूट फॉर इंटरनेशनल पब्लिक अफेयर्स। ब्राउन यूनिवर्सिटी। 13 नवम्बर। https://watson.brown.edu/costsofwar/files/cow/imce/papers/Pentagon%20Fuel%20Use%2C%20Climate%20Change%20and%20the%20Costs%20of%20War%20Revised%20November%202019%20Crawford.pdf
[8]बोकाट-लिंडेल, स्पेंसर। “व्हॉट दि यूक्रेन वार मिन्स फॉर दि फ्यूचर ऑफ क्लाइमेट चेंज।” न्यूयार्क टाइम्स। 16 मार्च 2022. https://www.nytimes.com/2022/03/16/opinion/ukraine-climate-change-russia.html
[9] “इंडिया इम्पोर्ट्स लेस दैन 1 फीसदी ऑयल फ्रॉम रसिया: पुरी।” दि हिंदू, 21 मार्च 2022. https://www.thehindu.com/news/national/india-imports-less-than-1-oil-from-russia-puri/article65245797.ece
[10] “इंडिया इम्पोर्ट्स लेस दैन 1 फीसदी ऑयल फ्रॉम रसिया: पुरी।” दि हिंदू, 21 मार्च 2022. https://www.thehindu.com/news/national/india-imports-less-than-1-oil-from-russia-puri/article65245797.ece
[11]सेट्रल इलेक्ट्रिक अथॉरिटी(सीईए). 2022.“ऑल इंडिया इंस्टाल्ड कैपिसिटी (मेगावाट में) ऑफ पॉवर स्टेशंस (28.02.2022 तक)।” इंस्टाल्ड कैपिसिटी रिपोर्ट। https://cea.nic.in/installed-capacity-report/?lang=en
[12]लक्ष्मण, श्रीराम “इंडिया मूव अवे फ्रॉम कोल हैम्पर्ड वाई यूक्रेन वॉर: निर्मला सीतारमण” दि हिन्दू। 19 अप्रैल 2022. https://www.thehindu.com/news/national/indias-move-away-from-coal-hampered-by-ukraine-war-nirmala-sitharaman/article65335032.ece

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>


Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)
Image Source: https://www.bellingcat.com/news/2022/04/04/russias-bucha-facts-versus-the-evidence/

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