रायसी का राष्ट्रपति बनना और इसके निहितार्थ
Kingshuk Chatterjee

इस्लामिक गणराज्य ईरान में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव के परिणाम के बारे में ज्यादातर लोग पहले ही अनुमान लगा चुके थे। इस चुनाव में ईरानी न्यायपालिका के वर्तमान मुखिया इब्राहिम रायसी के चुने जाने से ईरान और दुनिया पर क्या असर पड़ेगा, इस बारे में सीधे तौर पर कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी है। इस पद के लिए चुने जाने के बाद से लेकर अभी तक नए राष्ट्रपति ने उनके द्वारा अकसर दी जाने वाली कूटनीतिक रूप से विवादास्पद टिप्पणियों से परहेज किया है। गौरतलब है कि ऐसी टिप्पणियां अब तक उनकी पहचान का हिस्सा रही हैं। उन्होंने दृढ़ता से कहा है कि वह निवर्तमान रूहानी प्रशासन द्वारा जिनेवा में फिर से तैयार किए जा रहे जेसीपीओए समझौते के प्रति प्रतिबद्ध रहेंगे। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि वह नए सिरे से तय किए गए ऐसे किसी भी प्रावधान का समर्थन नहीं करेंगे जो "ईरान के राष्ट्रीय हितों" को जोखिम में डालता हो। उनके होने वाले प्रशासन की बनावट और स्वरूप के बारे में पिछले दो हफ्तों से चल रही अटकलों के अलावा अभी तक कुछ भी साफ नहीं है। नए आने वाले प्रशासन का स्वरूप कैसा होगा, इस बारे में अनुमान लगाने के लिए हमारे पास नए राष्ट्रपति के पिछले रिकार्ड, टिप्पणियों और उनके तथाकथित सहयोगियों के अलावा कुछ भी नहीं है।

इब्राहिम रायसी के रूप में प्रसिद्ध सैय्यद इब्राहिम रायसोलसादाती मुसलमानों की धार्मिक नगरी मशहद में मौलवियों के परिवार से संबंध रखते हैं। उन्होंने क्यूम मदरसा में इस्लाम का अध्ययन किया और वे पढ़ाई में बेहद तेज़ थे। शायद (अयातुल्ला खुमैनी के सबसे पसंदीदा शिष्यों में से एक) मुर्तजा मोताहारी के छात्र होने के कारण रायसी क्रांतिकारी मौलवियों से जुड़ गए। 1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान यह सब मौलवी क्रांति में शामिल हो गए और 1979-80 में अपने प्रभाव के दिनों में कामचलाऊ "क्रांतिकारी न्याय" देने के लिए विभिन्न क्रांतिकारी न्यायाधिकरणों से संबद्ध हो गए। 1981 में रायसी को औपचारिक रूप से कारज और फिर हमदान प्रांत के अभियोजक के रूप में नियुक्त किया गया। फिर 1985 में उन्हें तेहरान के उप अभियोजक के रूप में तरक्की दी गई। ऐसा माना जाता है कि उस पद पर रहते हुए वह विभिन्न वामपंथी और उदार विद्रोहियों की फांसी में शामिल थे (एक अनुमान के अनुसार यह संख्या 2,800 से लेकर 3,000 के बीच थी जबकि कई अन्य अनुमानों के अनुसार यह संख्या 30,000 के करीब थी) - रायसी ने हालांकि आधिकारिक तौर पर इस बारे में अपनी कोई जिम्मेदारी या भूमिका स्वीकार नहीं की है।

1989 में अली खमैनी को उनके वर्तमान पद रहबर (सर्वोच्च नेता) के रूप में पदोन्नत किया गया जबकि रायसी को तेहरान के मुख्य अभियोजक के रूप में नियुक्त किया गया। 2004 से लेकर 2014 तक वह ईरान के उप मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहे जिसके बाद उन्हें (2014-16) अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया गया। हालांकि बेहद समृद्ध आर्थिक प्रतिष्ठान (बोन्याद) अस्तान-ए-कुद्स रेजावी का अध्यक्ष बनने के लिए उन्होंने यह पद छोड़ दिया। 2019 मंो खमैनी ने उन्हें इस्लामिक गणराज्य के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया (वह इस पद पर आज भी बरकरार हैं) और उन्हें मजलिस-ए-खोबरेगान (विशेषज्ञ सभा) का पहला उपाध्यक्ष भी चुना गया। मजलिस-ए-खोबरेगान वह सभा है जो समय आने पर 'अली खमैनी' का उत्तराधिकारी चुनेगी।

इस्लामी गणराज्य की न्यायपालिका के पदाधिकारी के रूप में बेहद प्रभावशाली रसूख के बावजूद न्यायविद के रूप में रायसी की वास्तविक अहर्ताएं काफी हद तक सवालों के घेरे में हैं।1 इस्लामी गणराज्य के न्यायिक पदों की सीढ़ियों पर उनके लगातार बढ़ते कदम हालांकि इसका स्पष्ट प्रमाण हैं कि वह ईरान में सत्ता के नेटवर्क के भीतर बेहद अच्छे से जुड़े हुए हैं और ऐसा माना जाता है कि खमैनी के साथ उनके विशेष घनिष्ठ संबंध है। न्यायपालिका में उनका अब तक का इतिहास कट्टर क्रांतिकारी का रहा है जो कि पूर्व राष्ट्रपतियों रफसनजानी, खाटामी और वर्तमान राष्ट्रपति रूहानी के सुधारवादी एजेंडे से बिल्कुल उलट है। इन सभी लोगों के सहयोगियों पर रायसी और अलग-अलग पदों पर तैनात उनके सहयोगियों द्वारा नियमित रूप से मुकदमे चलाए गए और समय-समय पर उन्हें सार्वजनिक जीवन से वंचित कर दिया गया। अस्तान-ए-क़ुदस रेज़ावी से उनके संबंधों के बूते वह ईरानी राजनीतिक क्षेत्र में कट्टरपंथी रूढ़िवादियों के अन्य गढ़ सेपाह-ए-पासदारन-ए-इंकलाब-ए-इस्लामी (इस्लामिक रिपब्लिक गार्ड्स कॉर्प्स, अर्थात आईआरजीसी) से जुड़े आर्थिक संगठनों के नेटवर्क के भी सीधे संपर्क में आ गए। यह नेटवर्क बोन्याद-हा (निर्माण से लेकर खनन, मल्टी-स्पेशिल्टी अस्पतालों से लेकर कालीन कारखानों तक की कंपनियां चलाने वाली आर्थिक फांउडेशन जिसे ईरानी सरकार से बड़ी मात्रा में आर्थिक सहायता मिलती हैं) से गहराई से जुड़ा है। इसका तात्पर्य यह है कि नए राष्ट्रपति का उस सामाजिक गठबंधन से घनिष्ठ संबंध है जो ओसुलगिरन (पुरातनपंथी) मोर्चे का मुख्य आधार है। गौरतलब है कि यह देश के उन सबसे रूढ़िवादी कट्टरपंथी लोगों का संगठन हैं जो वर्तमान में मजलिस (संसद) और इस्लामिक गणराज्य में राज्य की ताकत पर हावी हैं।

भ्रष्टाचार रोकने के जोशीले हिमायती होने का रुख अपनाने के अलावा आर्थिक एजेंडे के बारे में रायसी के पास कहने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है जो महत्वपूर्ण हो। उनका यह रुख सुधारवादियों और अहमदीनेजाद प्रशासन, दोनों की आलोचना करने का आसान तरीका है। हालांकि जिस सामाजिक गठबंधन के बूते वह सत्ता में पहुंचे हैं और अतीत में सुधारवादी एजेंडे पर उनकी अनौपचारिक टिप्पणियों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि रायसी ईरानी अर्थव्यवस्था को व्यापक वैश्विक व्यवस्था से एकीकृत करने के समर्थक हैं, विशेषकर यदि इस एकीकरण में पश्चिमी दुनिया से जुड़ना शामिल हो। ट्रंप की अधिकतम दबाव की नीति के जवाब में रायसी ने मोक़ाव्वमत-ए-बेशतरीन (अधिकतम प्रतिरोध) के समर्थन में बात की है जिसमें इक्तिसाद-ए मोक़ाव्वमति (प्रतिरोध अर्थव्यवस्था) अर्थात ईरान की औद्योगिक क्षमता को बढ़ाना, देश की अर्थव्यवस्था की तेल पर निर्भरता को कम करना और आयात प्रतिस्थापन आदि शामिल है। संक्षेप रूप में, ये उद्देश्य ईरान के बेहद बदनाम सुधारवादियों के आर्थिक एजेंडे के समान ही हैं, सिवाय इसके कि सुधारवादी चाहते हैं कि 'सुधार प्राप्त' अर्थव्यवस्था पर निजी उद्यमों को प्रभुत्व हो वहीं कट्टरपंथी इस बात के इच्छुक हैं कि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार और लाभार्थी बड़े-बड़े क्रांतिकारी संगठनों (जैसे आईआरजीसी, बसीजी रिजर्विस्ट आदि) से जुड़े आर्थिक संगठन हों।

तेहरान में सत्ता के हलकों में अब रायसी के मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले संभावित सदस्यों के नामों के अनुमान लगाए जा रहे हैं। इन नामों में से पूर्व बसीजी अली रज़ा ज़कानी (जो रायसी के पक्ष में राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर हो गए थे), महमूद नबावियन (मजलिस के कट्टरपंथी सदस्य) जैसे लोगों को इन नीतियों का समर्थक माना जाता है। सुधारवादी लोग ईरान-इराक युद्ध की समाप्ति के बाद से ही सामाजिक और राजनीतिक सुधार और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण ईरानी अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुधार पर काम कर रहे थे। ऐसी संभावना है कि नए प्रशासन द्वारा इन सुधारों पर आगे काम नहीं किया जाएगा।

निवर्तमान रूहानी प्रशासन जेसीपीओए को बहाल करने और अमेरिका द्वारा 2018 के बाद से तेहरान को लाचारी की स्थिति में लाने वाले प्रतिबंधों को हटाए जाने के लिए अपनी पूरी कोशिश कर रहा है। ऐसा नहीं लगता है कि रायसी और ईरानी सत्ता के अंदर (अली खमैनी सहित) रूहानी का समर्थन करने वाली अन्य सामाजिक और राजनीतिक ताकतें इस बात के समर्थन में हैं कि इस्लामी गणराज्य परमाणु विकल्प को पूरी तरह से छोड़ दे। यूरेनियम को 60% से अधिक तक समृद्ध करने के बाद ईरान आज अपनी परमाणु क्षमता के शस्त्रीकरण के जितना करीब है, उसके उतना करीब वह जेसीपीओए पर हस्ताक्षर करने से पहले या हस्ताक्षर करने के बाद से आज तक कभी नहीं था। इसके बावजूद रायसी ने औपचारिक रूप से यह कहा है कि वह जेसीपीओए का पालन करेंगे (बशर्ते इसमें कोई नया प्रावधान नहीं जोड़ा गया हो)। ऐसा खास तौर पर इसलिए किया जा रहा है क्योंकि तेहरान को यह सख्त जरूरत है कि प्रतिबंधों का यह दौर जल्द समाप्त हो। हालांकि रूहानी और सुधारवादियों के विपरीत रायसी प्रशासन से यह उम्मीद नहीं है कि वह ईरानी अर्थव्यवस्था को दोबारा पश्चिमी दुनिया से जोड़ेंगे – उन्हें प्रतिबंधों के समाप्त होने की जरूरत इसलिए है ताकि वे गैर-पश्चिमी दुनिया (अन्य देशों के साथ विशेष रूप से रूस और चीन) से आसानी से व्यापार कर सकें।

ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि देश बाहरी दुनिया के साथ आसानी से व्यवसाय कर सके। पिछले एक दशक से इसकी अर्थव्यवस्था रुकी हुई है (बल्कि कुछ समय के लिए यह संकुचित भी हुई) जिससे ग्रामीण-शहरी गरीबों और मध्यम वर्ग आदि से संबंधित लोगों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है और देश अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आर्थिक अवसर उत्पन्न करने में विफल रहा है। ईरान यदि बाहरी दुनिया के साथ व्यापार करने में सक्षम नहीं हो जाता है तो उसकी प्रतिरोध अर्थव्यवस्था बेशक रातोंरात गिर नहीं जाएगी परंतु इस्लामिक गणराज्य अत्यधिक तनाव में आ जाएगा जिससे उसकी स्थिरता भी खतरे में आ सकती है। इस तरह ऐसी संभावना है कि आगामी प्रशासन जेसीपीओए की बहाली का स्वागत करेगा ताकि ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खोलकर इसके आर्थिक लाभों का दोहन किया जा सके परंतु पश्चिमी देशों को ईरान से बाहर रखा जाएगा। यह भी उम्मीद है कि पिछले कई महीनों की तरह अपने पड़ोसियों के प्रति भी ईरान का रुख सुलहकारी बना रहेगा। हालांकि ऐसा तभी होगा यदि रियाद और अबू धाबी भी ऐसा ही रुख अपनाते हैं। अब जब अमेरिका का पक्का विचार है कि उसे इस क्षेत्र से बाहर निकलना है तो पड़ोस में लंबे समय तक अस्थिरता तेहरान के हित में नहीं है।

जहां तक अंदाजा लगाया जा सकता है, रायसी और उनके संभावित सहयोगियों का भारत के प्रति कोई निश्चित मत नहीं है। हालांकि ऐसी संभावना है कि नया प्रशासन बीजिंग से नजदीकियां बढ़ाना जारी रखेगा ताकि इस वर्ष की शुरूआत में तेहरान द्वारा 25 वर्ष की अवधि के लिए किए गए 400 बिलियन अमेरिकी डालर के विशाल आर्थिक समझौते पर आगे बढ़ा जा सके। इस समझौते को सुधारवादियों के साथ-साथ रूढ़िवादी कट्टरपंथियों दोनों के व्यापक हिस्से का समर्थन प्राप्त था। रूहानी ने इस समझौते को अमेरिकी प्रतिबंधों के विरुद्ध सुरक्षा के रूप में व्यक्त किया; जबकि रायसी जैसे कट्टरपंथियों ने जेसीपीओए के पुनः बहाल होने की स्थिति में पश्चिम पर किसी भी निर्भरता से बचने के लिए इसका समर्थन किया है। हालांकि ईरान की सत्ता पर काबिज कट्टरपंथियों के बीच कई लोग ऐसे भी हैं जो किसी एक ताकत पर आश्रित होने से असहज हैं, भले ही यह ताकत चीन ही क्यों न हो। वे इस बात के लिए उत्सुक हैं कि बीजिंग देश में अकेला सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक खिलाड़ी नहीं हो और वे ऐसी संभावनाओं का स्वागत करेंगे कि मुख्य निवेशक और/या व्यापारिक भागीदार अथवा इसके ऊर्जा निर्यात के खरीदार या दोनों के रूप में कोई अन्य ताकत भी ईरान में मौजूद हो – बशर्ते ऐसी ताकत पश्चिम से नहीं हो। इस तरह भारत के पास ईरान में वापस जाने का एक अच्छा अवसर है।

हालांकि इस बार दोबारा प्रवेश के लिए शुरुआती कीमत पहले की तुलना में अधिक होने की संभावना है। तेहरान में सत्ता के गलियारों में कुछ लोगों को लगता है कि 2010 में और फिर 2018 में प्रतिबंध लागू होने पर नई दिल्ली ने अपने नुकसान को बहुत आसानी से नियंत्रित कर लिया। 2013 तक नई दिल्ली (विशेष रूप से रिलायंस) के ईरान से निकलने तक ईरानी तेल निर्यात और ईरान के लिए कच्चे तेल की रिफाइनिंग के स्रोत के रूप में भारत सबसे महत्वपूर्ण साझीदारों में से एक था। चीन (सिनोपेक और सीएनपीसी) हालांकि वहां टिके रहे। तब से लेकर अब तक तेहरान ने अपनी स्वयं की कई रिफाइनरियां तैयार कर ली हैं और ऐसी संभावना है कि स्थानीय बाजार के लिए कच्चे तेल को परिष्कृत करने के लिए ईरान भारत पर उस तरह निर्भर नहीं रहेगा जैसे वह पहले था। तेहरान की नई दिल्ली से अपेक्षा रहेगी कि यह आगे ईरान में व्यापार करने के बारे में अपनी गंभीरता साबित करे, विशेषकर यदि प्रतिबंध बरकरार रहते हैं या फिर से लगाए जाते हैं। प्रतिबंधों से विशेष रूप से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों बैंकिंग, बीमा और अन्य उद्देश्यों को सुविधाजनक बनाने के लिए विशेष प्रयोजन साधन (एसपीवी, जैसे पिछले कुछ वर्षों से यूरोपीय संघ काम कर रहा है) बनाने का सुझाव देकर आसानी से ऐसा संकेत दिया जा सकता है।

नई दिल्ली के लिए सही सलाह यही रहेगी कि वह इसके रास्ते में आने वाले मोलभाव के लिए मजबूत बने और गंभीरतापूर्वक कार्रवाई करे और साथ ही यह ईरान की सत्ता में दखल रहने वाले लोगों अर्थात आईआरजीसी/बसिज मिलिशिया से संबद्ध कंपनियों के साथ काम करने के लिए तत्पर रहे। भारत को मौजूदा परियोजनाओं (जैसे चाबहाड़, डेलोरम-जारंज रेलवे लिंक) या ऊर्जा एवं परिवहन अवसंरचना परियोजनाओं के संबंध में हमारी नई परियोजनाओं में चीनी भागीदारों के साथ जुड़ने के लिए भी कहा जा सकता है। ऐसी संभावना नहीं है कि ये सब मात्र सौदेबाजी की चतुर रणनीतियां होंगी - इसलिए ऐसे प्रस्ताव दिए जाने की स्थिति में इन पर सावधानी से विचार किया जाना चाहिए। नई दिल्ली कठिनाइयों के बावजूद अगर अंत तक डटा रहे तो हो सकता है कि ईरान अपने "पुराने मित्र" को समायोजित करने में ज्यादा इच्छुक हो।

इन टिप्पणियों का स्रोत ईरान से मिलने वाली इलेक्ट्रॉनिक और प्रिटं मीडिया सुगबुगाहट में निहित है, इसलिए वास्तविक स्थिति से दूर रहकर की गई ऐसी टिप्पणियों का विशिष्ट महत्व या विश्वसनीयता नहीं है। सरकार की दिशा और रुझान काफी हद तक अंततः चुनी गई कैबिनेट पर निर्भर करेगा, चाहे इसमें व्यावहारिक रूढ़िवादी (लारिजानी के सहयोगी) शामिल हों या बाजार (एक समय में खमैनी का स्वभाविक प्रभाव क्षेत्र) से संबद्ध लोग अथवा इसमें पूरी तरह से पूर्व-आईआरजीसी से जुड़े लोग हावी हों। बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या रायसी को बेहद बीमार सर्वोच्च नेता के निधन के बाद खमैनी के वास्तविक उत्तराधिकारी के रूप में माना जा रहा है या क्या उनकी पदोन्नति मात्र इसलिए की गई है ताकि अपने पिता के पद पर काबिज होने के लिए मुजतबा खमैनी का रास्ता आसान हो सके (इस बारे में कई लोग काफी समय से बहस कर रहे हैं) – इससे ही यह निर्धारित होगा कि रायसी के पास दीर्घकालिक दृष्टिकोण होगा या नहीं।

समापन नोट्स
  1. विधिवेत्ता के रूप में उनकी शैक्षणिक अर्हताओं पर कोई स्पष्टता नहीं है - एक समय में वे अयातुल्ला (शिया मकतब पदानुक्रम में वरिष्ठ प्रोफेसर जैसा कुछ) होने का दावा करते थे परंतु चुनौती दिए जाने पर वह स्वयं को इसके बजाय होज्जत-उल-इस्लाम (एसोसिएट प्रोफेसर जैसा कुछ) कहने लगे।

Translated by Shiwanand Dwivedi(Original Article in English)

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