वर्ष के अंत में डीआरडीओ का मिसाइल परीक्षण- एक उल्लेखनीय उपलब्धि | Vivekananda International Foundation
वर्ष के अंत में डीआरडीओ का मिसाइल परीक्षण- एक उल्लेखनीय उपलब्धि
Lt Gen (Dr) V K Saxena (Retd), PVSM,AVSM,VSM, Distinguished Fellow, VIF

गत वर्ष 28 दिसंबर को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने सुपरसॉनिक इंटरसेप्टर मिसाइल (जिसे एडवांस्ड एयर डिफेंस या एएमडी मिसाइल के नाम से भी जाना जाता है) का सफल परीक्षण किया जिसने 15 किलोमीटर तक की कम ऊंचाई के अपने लक्षित निशाने को एकदम सही तरीके से भेदा। इस परीक्षण से न केवल इंटरसेप्टर की क्षमताएं पुष्ट हो गईं, बल्कि इसने कुछ विशेष किस्म की उच्च तकनीक के सफल परीक्षण पर भी मुहर लगाई। विशेषकर इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (आईएनएस) पर आधारित फाइबर ऑप्टिक जाइरो (एफओजी), बेहतरीन गुणवत्ता वाले गाइडेंस एंड एक्युटेशन सिस्टम्स एंड क्रिटिकल रेडियो फ्रीक्वेंसी (आरएफ) जैसी तकनीकों की भी परख हो गई। यह आलेख इस परीक्षण के परिप्रेक्ष्य में व्यापक तंत्र पर प्रकाश डालने के साथ ही इस पर भी प्रकाश डालने का प्रयास करता है कि स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (बीएमडी) क्षमता देश के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि है।

सिस्टम का वृहद विश्लेषण

पाकिस्तान (80 से 300 किलोमीटर) और चीन (1,770 से 12,900 किलोमीटर से अधिक क्षमता वाली) की ओर से सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए 2000-2001 में स्वदेशी बीएमडी सिस्टम विकसित करने का निर्णय किया गया। ‘प्रोग्राम एडी (एयर डिफेंस)’ नाम के तहत इस सिस्टम को डीआरडीओ द्वारा दो चरणों में विकसित किया जाना था। पहले चरण में 2,000 किलोमीटर के दायरे में आने वाली मिसाइल के खतरे की काट में बीएमडी शील्ड तैयार की जानी थी और दूसरे चरण में 2,000 से 5,000 किलोमीटर के दायरे में आने वाली मिसाइल के खतरे से निपटने की क्षमताएं विकसित की जानी थीं। सिस्टम को बनाने के लिए लक्ष्य तय किया गया कि ऐसी इंटरसेप्टर विकसित की जाएं जो वायुमंडल के भीतर और बाहर दोनों क्षेत्रों में बराबर प्रभावी हों। इसमें पहले चरण को पूरा करने की समय सीमा 2012 और दूसरे चरण के लिए 2016 तय की गई। जहां वर्ष 2017 भी बीतने के कगार पर ही था तभी 2016 के लिए लक्षित की गईं क्षमताएं साकार हो उठीं। इंटरसेप्शन की रणनीति में एक सामान्य वायु रक्षा सक्रियता प्रक्रिया का पालन किया गया। इस प्रक्रिया में लांग रेंज ट्रैकिंग रडार (एलआरटीआर) द्वारा 500 से 1,000 किलोमीटर के दायरे में आने वाली मिसाइल का पता लगा लिया जाता है।

एक बार खतरे को भांप कर और सक्रियता के लिए प्राथमिकता तय करने के बाद इसके मानकों और प्रेडिक्टेड पॉइंट ऑफ इंपैक्ट (अनुमानित लक्ष्य, पीपीआई) के आधार यह मल्टी फंक्शनल रडार (एमएफआर) के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार किया गया है। खतरे की लगातार जानकारियां जुटाते हुए उस पर नजर रखने के साथ ही एमएफआर एक सुरक्षित और अभेद्य टार्गेट अप-लिंक ट्रांसमीटर (टीयूटी) और टार्गेट अपलिंक रिसीवर (टीयूआर) के माध्यम से लक्ष्य से जुड़ी जानकारियां भेजता रहता है। और सही अवसर आने पर इंटरसेप्टर लॉन्चर से अलग होकर टीयूटी-टीयूआर लिंक पर निशाने लगाने के लिए निर्देशित होता है। अंतिम क्षणों में लक्ष्य का सही निर्धारण होता है और इसे निर्देशित करने वाला उसे सही जगह पर केंद्रित करता है। इसके सभी एलीमेंट्स को अतिरिक्त संचार कड़ियों के माध्यम से एक दूसरे से जोड़ा जाता है। चूंकि पहले और दूसरे चरण में पूरा ध्यान अंतः और बाह्य-वायुमंडल पर केंद्रित था तो इंटरसेप्टर को उसके अनुसार ही डिजाइन किया गया है। पहले चरण में पृथ्वी एयर डिफेंस (पीएडी) ऐसा एक्सो-एटमॉस्फेरिक इंटरसेप्शन है जिसकी क्षमता 50 से 80 किलोमीटर ऊंचाई के दायरे में है जबकि एडवास्ड एयर डिफेंस (एएडी) का आशय एंडो-एटस्मॉस्फेरिक क्षेत्र में 30 किलोमीटर की ऊंचाई से है। पीएडी द्विस्तरीय लिक्विड फ्यूल्ड (तरल ईंधन) इंटरसेप्टर है। पृथ्वी डेवलपमेंट व्हीकल (पीडीवी) इसके भविष्य का प्रतिरूप है जिसमें तरल ईंधन प्रणोदक (संचालक शक्ति) का स्थान ठोस ईंधन वाली व्यवस्था ले लेगी। दूसरे चरण में एडी-1 और एडी-2 नाम के दो इंटरसेप्टर होने थे। दूसरे चरण के सिस्टम से यही अपेक्षा थी कि इससे अमेरिका में तैनात थाड किस्म की मिसाइलों जैसी क्षमता हासिल हो जाएगी। ऐसी मिसाइलें 200 किलोमीटर ऊंचाई पर भी लक्ष्य को रोक (इंटरसेप्ट) सकती हैं तो 1,000 किलोमीटर ऊंचाई तक अपने लक्ष्य का पता लगा सकती है। पहले और दूसरे चरण में हथियार और इसकी प्रणाली का पूरी तरह परीक्षण हो चुका है और यह तैनाती और संचालन की प्रक्रिया में है।

जैसा कि हम देख सकते हैं कि एएडी का मौजूदा लॉन्च इंटरसेप्टर के एंडो-एटमॉस्फेरिक रेंज से जुड़ा है और योजनाबद्ध क्षमताओं में निश्चित रूप से एक मील का पत्थर है। फिर भी इस पड़ाव पर कुछ चुनौतियां का ध्यान रखना होगा जिनके लिए कुछ कदम उठाने होंगे:-

1. सिस्टम के पूरे क्रियान्वयन को डीआरडीओ के मूल प्रारूप से यूजर फॉर्मेट में शीघ्रता से बदला जाए जहां एंड यूजर (रणनीतिक सैन्य कमान या एसएफसी) को डीआरडीओ वैज्ञानिकों के नियंत्रण से बाहर इसकी तैनाती, संचालन, रखरखाव और सिस्टम की सतत निगरानी का अधिकार मिले।
2. परीक्षण प्रक्रिया से बाहर निकलकर अब इसके नियमित उत्पादन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और एसएफसी के बैनर तले तीनों सेनाओं में इसकी चरणबद्ध तैनाती संभव बनाई जाए।
3. एकीकृत कमान नियंत्रण और युद्ध प्रबंधन तंत्र के साथ इसका मेल किया जाए जिसमें एयर डिफेंस के विभिन्न सेंसर्स और शूटर्स और एंटी-मिसाइल तंत्र को एक अभेद्य और सुगम तंत्र में जोड़ा जाए। इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्रणाली को बेहतर से बेहतर निगरानी में दक्ष बनाने के साथ मल्टी-सेंसर फ्युजन के जरिये आने वाले किसी भी खतरे की उचित पड़ताल करने के साथ ही उसके लिए सटीक काट और हथियार चयन के लिहाज से जिम्मेदार बनाया जाए।
4. इन सबके साथ ही कोड्स, अथॉराइजेशन और निर्णय प्रारूपों वाली एक व्यवस्था को पूर्णता का रूप देकर संचालन योग्य बनाया जाए। साथ ही मिसाइल भंडारण, परीक्षण और रखरखाव के लिए भी सहायक अवसंरचना विकसित की जाए।
5. नियमित अभ्यास के जरिये यूजर-साइंटिस्ट इंटर-फेज को प्रोत्साहन दिया जाए।
6. बीएमडी सिस्टम फायर यूनिट्स (एफयूज) के साथ एस-400 एयर डिफेंस और एंटी-मिसाइल सिस्टम के भविष्य में एकीकरण के लिए आधार तैयार किया जाए।
7. उपभोक्ता प्रशिक्षण, भंडार निर्माण और अन्य प्रशासनिक पहलुओं से जुड़ी चुनौतियों का हल निकाला जाए।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि स्वदेशी बीएमडी मिसाइल की पूरी क्षमताओं में सफलता के लिहाज से 28 दिसंबर, 2017 का दिन मील पत्थर माना जाएगा।

(लेखक द्वार व्यक्त किए गए विचारों से वीआईएफ का सहमत होना आवश्यक नहीं है)


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: http://www.aame.in/2017/01/an-agni-6-icbm-class-missile-by-india.html

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