संवाद – भारत और जापान ने साझे मूल्यों पर दिखाया एक जैसा रुख
Arvind Gupta, Director, VIF

अक्टूबऱ 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक जापान यात्रा ने भारत-जापान विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी को और भी मजबूत किया है। दोनों देश अपनी प्राचीन संस्कृतियों में मौजूद साझे मूल्यों की बुनियाद पर संबंध बना रहे हैं। 29 अक्टूबर 2018 के दृष्टिपत्र में इतिहास तथा साझे मूल्यों को द्विपक्षीय संबंधों को गति प्रदान करने वाले तत्व कहा गया है। दृष्टिपत्र के पहले अनुच्छेद में कहा गया है, “...दोनों प्रधानमंत्रियों ने संवाद वार्ता की श्रृंखला में एकस्वर से यह बात स्पष्ट की है कि भारत एवं जापान के बीच दीर्घकाल से चले आ रहे शैक्षिक, आध्यात्मिक संपर्क एवं विद्वानों के संवाद के जरिये साझा किए गए स्वतंत्रता, मानवता, लोकतंत्र, सहिष्णुता तथा अहिंसा के सार्वभौमिक मूल्य भारत-जापान द्विपक्षीय संबंधों की बुनियाद ही नहीं हैं बल्कि वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र तथा संपूर्ण विश्व के लाभ के लिए एक साथ काम करने के इन दोनों देशों के सिद्धांत के परिचायक भी हैं।”1

यह पहला मौका नहीं है, जब भारत-जापान संयुक्त बयान में संवाद का जिक्र हुआ है। 2015 में संयुक्त बयान के अनुच्छेद 33 में “एशिया में अहिंसा तथा लोकतंत्र की परंपराओं के सकारात्मक प्रभाव पर” एशिया का भविष्य तैयार करने की आवश्यकता के संदर्भ में संवाद संगोष्ठियों का उल्लेख किया गया था। भारत-जापान संवाद सम्मेलनों का उल्लेख 2017 के संयुक्त बयान के अनुच्छेद 46 में भी किया गया और कहा गया, “एशिया में अहिंसा, सहिष्णुता तथा लोकतंत्र की परंपरा के सकारात्मक प्रभाव को बढ़ाने के उद्देश्य से दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगस्त, 2017 में म्यांमार के यांगून में संपन्न संवाद-2 सम्मेलन का स्वागत किया और 2018 में अगला सम्मेलन कराने की बात कही।” दोनों बयानों को साथ पढें तो अहिंसा, लोकतंत्र और सहिष्णुता के मूल्यों को एशियाई मूल्य बताया गया है, जिनकी समसामयिक प्रासंगिकता है।

संवाद वार्ता श्रृंखला का उल्लेख भारत-जापान संबंधों पर नजर रखने वालों को कौतूहल में डाल सकता है। संवाद सम्मेलन का क्या महत्व है? संयुक्त बयान में संवाद का जिक्र क्यों हुआ है? 2018 के बयान में संवाद को प्रमुख स्थान क्यों दिया गया?

दोनों प्रधानमंत्री संस्कृति और सभ्यता में गहरी रुचि रखते हैं। जब प्रधानमंत्री 2014 में जापान गए थे तो दोनों प्रधानमंत्रियों ने एशियाई सभ्यताओं तथा उनके मूल्यों के महत्व को प्रकाश में लाने के इरादे से संवाद वार्ता आरंभ की थी। प्रधानमंत्री आबे ने कहा था कि संवाद श्रृंखला की दुनिया में कहीं भी और इतिहास में किसी भी अन्य काल से तुलना नहीं हो सकती।2

पहले सम्मेलन संवाद-1 का आयोजन 2015 में नई दिल्ली में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन तथा बौद्ध मत के सबसे पावन स्थल बोध गया में हुआ था। सम्मेलन का विषय था “टकराव टालना तथा पर्यावरण बोध”। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन का उद्घाटन किया और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मुख्य वक्तव्य दिया। ‘बोध गया घोषणापत्र’ के नाम से एक घोषणापत्र को मंजूरी प्रदान की गई, जिसमें कहा गया, “हिंदू-बौद्ध सभ्यता पर दुनिया को भाई बंधुओं का नाश करने वाले टकराव से बचाने के लिए हिंदू एवं बौद्ध धर्मों के साझा दार्शनिक सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए टकराव रोकने तथा पर्यावरण के प्रति बोध जगाने हेतु कार्य करने का विशेष दायित्व है।”3 इसमें “पाली में धम्म तथा संस्कृत में धर्म के प्राचीन विचार के आधार पर विविधता को समझने तथा उसकी सराहना करने के लिए नए उदाहरण” की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।4

संवाद 1 के साथ ही उच्च स्तर की वार्ता आरंभ हुईं, जो 2015 से 2018 तक आयोजित की गईं। अग्रणी विद्वानों, धार्मिक नेताओं, शिक्षकों, कार्यकर्ताओं, मीडियाकर्मियों तथा राजनीतिक व्यक्तियों ने टकराव से बचने तथा पर्यावरण बोध पर विचारों का आदान-प्रदान किया। पहले सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रतिभागियों को संबंधित किया और प्रधानमंत्री आबे ने संदेश भेजा। विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवि शंकर ने सम्मेलन में आशीर्वचन दिए। श्रीलंका की पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका भंडारनायके सम्मेलन में रहीं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में बुद्ध की प्रशंसा करते हुए कहा, “गौतम द्वारा दिखाए गए विचार मार्ग को अपनाए बगैर 21वीं सदी एशिया कीसदी नहीं हो सकती।” उन्होंने ऐसे संवाद की महत्ता पर भी जोर दिया, जिससे “क्रोध अथवा दंड” उत्पन्न नहीं होता।

प्रधानमंत्री मोदी ने दर्शन तथा विचाराधारा के बीच महत्वपूर्ण भेद भी बतायाः

“दर्शन का सार कहता है कि वह बंद विचार नहीं है, लेकिन विचारधारा बंद होती है। इसलिए दर्शन संवाद का अवसर ही नहीं देता बल्कि उसमें संवाद के जरिये सत्य की सतत खोज भी की जाती है... विचारधारा संवाद के द्वार बंद कर देती हैं और उनमें हिंसा की प्रवृत्ति होती है, जबकि दर्शन संवाद के जरिये टकराव टालने का प्रयास करता है। इस दृष्टि से हिंदू तथा बौद्ध धर्म केवल आस्था के मत नहीं हैं बल्कि दर्शन अधिक हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि समस्याओं का समाधान संवाद में होता है... शक्ति विचारों की दृढ़ता तथा प्रभावी संवाद के जरिये आनी चाहिए।”5

प्रधानमंत्री आबे ने “भविष्य के लिए ज्ञान प्राप्त करने हेतु इतिहास की शिक्षाओं” पर विचार किया। उन्होंने कहा कि जापान में बौद्ध मत को “विधि शासन” माना गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि “स्वतंत्रता, लोकतंत्र, मूलभूत मानवाधिकारों के प्रति सम्मान एवं विवादों का शांतिपूर्ण समाधान हिंदू धर्म एवं बौद्ध धर्म में साझा विचार हैं। ये सार्वभौमिक मूल्य हैं, जो एशियाई धर्मों तथा दर्शन में समाहित हैं एवं हमारी वैचारिक बुनियाद में समाए हुए हैं। एशिया की एक और विशेषता हमें भूलनी नहीं चाहिए और वह है सहिष्णुता की भावना, जो विविधता का सम्मान करती है।”6 आबे ने यह भी कहा कि “बौद्ध धर्म एवं हिंदू धर्म करुणा का पाठ पढ़ाते हैं, कनफ्यूशियसवाद उदारता सिखाता है और इस्लाम भाईचारे की बात कहता है।” उन्होंने विवेकानंद को उद्धृत करते हुए कहा कि “विविधता कमजोरी नहीं है, यह रचनात्मकता का स्रोत है” और “आध्यात्मिक ऊंचाई तक पहुंचने के एक से अधिक मार्ग हैं।”7

संवाद सम्मेलन श्रृंखला की विशेषता है टकराव रहित तथा पारस्परिक समझ को बढ़ाने के उद्देश्य वाले संवाद की भावना। दोनों नेताओं ने समसामयिक समस्याएं सुलझाने के लिए हिंदू एवं बौद्ध धर्मों के मूल्यों पर जोर दिया। आबे का विचार था कि ‘लोकतंत्र’ तथा ‘विधि के शासन’ के पाश्चात्य मूल्य हिंदू-बौद्ध दर्शनों में सदैव से रहे हैं। मोदी ने कहा कि हिंदू धर्म तथा बौद्ध धर्म को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “बुद्ध के अवतार के बाद हिंदू धर्म बौद्ध-हिंदू धर्म तथा हिंदू-बौद्ध धर्म बन गया। वे आज अभिन्न रूप से मिले हुए हैं।”8

इस प्रकार संवाद सम्मेलनों की श्रृंखला आरंभ हुई। अब तक दिल्ली (2015), टोक्यो (2016), यांगून (2017) और टोक्यो (2018) में चार सम्मेलन हो चुके हैं। भारत और जापान के अलावा चीन, श्रीलंका, कंबोडिया, वियतनाम, मंगोलिया, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, म्यांमार, भूटान तथा कई अन्य देशों से विद्वानों, धार्मिक नेताओं तथा अन्य व्यक्तियों ने इन सम्मेलनों में हिस्सा लिया है।

“एशिया में साझे मूल्य तथा लोकतंत्र” विषय पर टोक्यो में संपन्न चौथे संवाद सम्मेलन में प्रधानमंत्री आबे ने विदाई भाषण दिया, जिसमें उन्होंने विषय की ओर लौटते हुए कहा कि एशिया में लोकतंत्र पश्चिम से आया विदेशी विचार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में लोकतांत्रिक भावना की साझी विरासत पर जोर दिया और कहा कि हिंदू धर्म तथा बौद्ध धर्म की दार्शनिक और सांस्कृतिक विरासत लोगों के बीच बेहतर समझ बढ़ाने में हमारी मदद करती है। भारत से पहुंचे प्रसिद्ध लेखक श्री एस. गुरुमूर्ति ने लोकतंत्र के एशियाई अनुभव, जो व्यक्ति एवं समाज पर केंद्रित रहता है और लोकतंत्र के पाश्चात्य मॉडल, जो केवल व्यक्तिवाद पर खड़ा है, के बीच भेद बताया।9 कई विद्वानों ने एशियाई सभ्यताओं, एशियाई मूल्यों, आधुनिकीकरण तथा स्वतंत्रता, लोकतंत्र, मानवाधिकारों के विचार पर अपने विचार साझा किए। सभी इस बात पर सहमत थे कि एशियाई सभ्यताएं आज की समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकती हैं।

संवाद सम्मेलनों की श्रृंखला उन विचारों का स्रोत रही है, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री आबे सम्मान देते हैं। भारत और जापान को हिंदू धर्म तथा बौद्ध धर्म से उपजे साझे मूल्यों की साझी भाषा मिल गई है, जो सहिष्णुता एवं संवाद का पाठ पढ़ाती है। संवाद उपयोगी पहल है, जिसे जारी रखना चाहिए और बढ़ाना भी चाहिए। अच्छा होता यदि संयुक्त राष्ट्र संवाद वार्ता श्रृंखला पर ध्यान देता और पारस्प्रिक समझ गहरी करने तथा लोगों के बीच सहिष्णुता, मैत्री एवं सौहार्द बढ़ाने के लिए इसे बढ़ावा देता। सचमुच दोनों प्रधानमंत्रियों की यह अनूठी पहल है।

संदर्भः
  1. 29 अक्टूबर, 2018 का भारत-जापान दृष्टिपत्र http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=184458
  2. टोक्यो में हो रहे चौथे संवाद के लिए प्रधानमंत्री मोदी का संदेश https://www.narendramodi.in/pm-modis-message-for-4th-edition-of-samvad-being-held-in-tokyo-540695
  3. टकराव टालने तथा पर्यावरण बोध पर हिंदू-बौध दर्शन में बौद्ध धर्म के नेताओं का बोध गया घोषणा पत्र, वीआईएफ-विजडम ट्री, 2017, नई दिल्ली, पृष्ठ 359
  4. उपरोक्त, पृष्ठ 360
  5. उपरोक्त, पृष्ठ 27-28
  6. उपरोक्त, पृष्ठ 13-14
  7. उपरोक्त, पृष्ठ 14
  8. उपरोक्त, पृष्ठ 357
  9. संवादः टोक्यो में संपन्न चौथा सम्मेलन – रिपोर्ट https://www.vifindia.org/article/2018/july/samvad-the-fourth-symposium-held-in-tokyo-a-report

Translated by Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: https://cdn.narendramodi.in/cmsuploads/0.59686300_1540780187_1155-pm-travels-with-japan-pm-in-train-5.jpg

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