रक्षा तत्परता का नमूना या रक्षा तत्परता की पड़ताल
Vice Adm Raman Puri, PVSM, AVSM, VSM, Distinguished Fellow, VIF

राष्ट्र छोटा हो या बड़ा, उसे टकराव और अनिश्चितताओं से भरे इस संसार में रक्षा की अपनी जरूरतों का ध्यान रखना ही पड़ता है। भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है और इसका दुनिया के पांच सबसे ताकतवर देशों में शुमार होना तय है, इसलिए उसके पास रक्षा का मजबूत ढांचा होना ही चाहिए। रक्षा प्रणालियां खरीदने के लिए हर वर्ष बजट में देश के राजस्व का बड़े हिस्से की घोषणा की जाती है। हमारे सशस्त्र बल देश में रक्षा के ढांचे को लगातार चलाते रहने के लिए और उसका आधुनिकीकरण करने के लिए इस धन का उपयोग करने की योजनाएं बनाते हैं। अहम सवाल यह है, “क्या इसमें निवेश करते समय हम सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध निर्णय कर रहे हैं?” इससे जुड़े हुए सवाल हैं, “ये फैसले करने के लिए हम जो तरीके अपना रहे हैं, वे कितने वैज्ञानिक हैं? हमारे रक्षा ढांचे की प्रभावशीलता में जो इजाफा करना है, क्या हम उसकी मात्रा जान सकते हैं? आज के समय को परिभाषित करने वाली सूचना प्रौद्योगिकी की इस मामले में क्या भूमिका है?”

ऊपर दिए गए सवाल का जवाब देने का एक संभावित तरीका हमारी रक्षा संबंधी तैयारी या मुस्तैदी का नमूना तैयार करना है। इसकी शुरुआत करने के लिए अपने चारों ओर मौजूद हर संभव जोखिम को पहचानें और उसे तोलें। इसका एक उदाहरण तिब्बत स्वायत्ताशासी क्षेत्र में विवादित सीमा के किनारे तथा समुद्री क्षेत्र में सेना तैयार करने में लगने वाली क्षमता, सामर्थ्य और समय के संदर्भ में चीन का खतरा है। हमारी सभी संपदाओं और सभी प्रकार के खतरों का ‘कार्तीय उत्पाद’ (कार्टीशियन प्रोडक्ट) संभावित खतरों को हमारे सामने ला देता है। पहले और महत्वपूर्ण चरण में सूचना प्रौद्योगिकी की फायदा उठाते हुए इन खतरों को कंप्यूटर में देखा जाना चाहिए। समय के आयाम को उसमें जोड़ते हुए खतरों का नमूना इस तरह तैयार करना चाहिए कि संपदाओं पर अलग-अलग समयकाल में निशाना लगाया जा सके। इस चरण को और बाकी नमूने को अपने दिमाग में संभालने के दिन बीत चुके। खतरों से मिलने वाला रक्षा संबंधी तैयारी का नमूना ऐसा होना चाहिए कि उसकी गणना हो सके यानी हम उस नमूने की प्रतिकृति कंप्यूटर में तैयार कर सकें और हमारे सवालों का जवाब मिल सके।

संभावित खतरों की गणना करने के बाद अगला चरण है उन रक्षा प्रणालियों की पहचान करना, जो उन खतरों का प्रभावी रूप से मुकाबला कर सकती हैं। रक्षा प्रणाली सेंसर, संचार संपर्क, निर्णय लेने में मदद करने वाले उपकरण और हथियार से मिलकर बनी हो सकती है। प्रत्येक खतरे का मुकाबला करने और उसे समाप्त करने के लिए एक या अधिक रक्षा प्रणालियों की पहचान की जानी चाहिए।

इस कवायद से ऐसा नक्शा तैयार होना चाहिए, जिसमें एक ओर खतरे हों और दूसरी ओर रक्षा का खाका हो। गणित की भाषा में यह नक्शा अनेकानेक संबंधों वाला खाका होगा यानी किसी भी एक खतरे को एक से अधिक रक्षा प्रणालियों से स्वतंत्र रूप से निपटा जा सकेगा। इसी प्रकार कोई एक रक्षा प्रणाली एक से अधिक खतरों से निपट सकेगी। इस काम की जटिलता को संभालने के लिए नक्शा बनाने का काम दो चरणों में किया जा सकता है। पहले चरण में केवल स्थान को ध्यान में रखा जा सकता है। दूसरे चरण में समय के संदर्भ में खतरों के विन्यास की व्यापक पड़ताल की जा सकती है। किसी खतरे के खिलाफ किसी रक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता का अनुमान लगाना महत्वपूर्ण पूरक चरण है। इन अनुमानों को रक्षा संबंधी तत्परता के नमूने का अभिन्न अंग माना जाना चाहिए। रक्षा प्रणालियों बनाम खतरों का नक्शा तैयार करने के बाद थल, जल, नभ में रक्षा प्रणालियों की तैनाती और उनके विन्यास के बारे में फैसला करना अंतिम चरण होता है। ये फैसले दूसरे, तीसरे या उनसे भी अधिक हमलोंको ध्यान में रखकर लेने होते हैं।

हमें अपनी रक्षा प्रणालियों की सामर्थ्य की पूरी जानकारी होनी चाहिए, लेकिन कितनी संख्या में उनकी जरूरत है, यह खतरे का परिमाण जानने के बाद ही पता चल सकता है। खतरा कितना बड़ा है, यह पता लगाने के लिए अपने विरोधी की क्षमता और आयुध भंडार का अनुमान लगाना जरूरी है। उदाहरण के लिए तैनात की जा रही एसबीएम, रेडार से बच निकलने वाले जे-20 विमानों, क्रूज मिसाइलों और आईएसआर सेंसरों जैसी प्रणालियों का सामर्थ्य बिल्कुल सटीक रूप से पता होना चाहिए। इस चुनौतीपूर्ण काम को मीडिया रिपोर्टों, विरोधी के दावों, विचार समूहों की रिपोर्टों, हमारे खुफिया विभाग की रिपोर्टों के वैज्ञानिक विशलेषण के जरिये किया जाना चाहिए और निर्णय में सहायता करने वाली प्रभावी प्रणाली के जरिये अनुमान लगाने चाहिए। इन अनुमानों में और खतरों का परिमाण तय करने में कमीबेशी की कुछ गुंजाइश हमेशा रखी जा सकती है। जब हमारे विरोधी की क्षमताओं का अंतिम अनुमान तैयार हो जाए तो वास्तविक रक्षा प्रणालियों और खतरों का मिलान किया जा सकता है तथा उसमें सुरक्षित निकलने वाले की सफलता की संभावना को युद्धक कलन गणित से मापा जा सकता है।

रक्षा संबंधी मुस्तैदी का नमूना जब गणना लायक बन जाता है तो युद्ध के लिए नेटवर्क केंद्रित तरीके के विचार को आजमाया जा सकता है। खतरे को सही तरीके से भांपने के लिए मशीनी बुद्धि का इस्तेमालकर रक्षा प्रणालियों के नेटवर्क को बढ़ाया जा सकता है। हथियारों के जरिये खतरों पर निशाना लगाने का कम और भी सटीकता के साथ किया जा सकता है। अतिरिक्त फायदा यह होगा कि हमारी मौजूदा प्रणालियों की क्षमता तय करने के लिए भावी खरीदों के लिए जीएसक्यूआर का फैसला हम कर सकेंगे। विरोधी की रक्षा के कमजोर बिंदु पहचाने जा सकते हैं और दूरगामी प्रभाव डालने के लिए उन पर निशाना लगाया जा सकता है। मशीनी बुद्धिमत्ता और मानवीय कमांडरों के तालमेल से ये उद्देश्य पूरे किए जा सकते हैं। रक्षा संबंधी मुस्तैदी का गणना योग्य मॉडल हमारे कमांडरों को कंप्यूटर पर युद्ध का खेल खेलने लायक बना देता है। मनुष्य और मशीनों के बीच युद्ध संबंधी गेम नई रणनीतियों और तरीकों से परिचित कराते हैं, जिनके बारे में अभी तक कोई जानता ही नहीं। इससे यह भी साबित होता है कि कंप्यूटर वाकई में सोचने वाली मशीनें हैं। तब हमें समय में मौजूद प्रौद्योगिकी का पूरा फायदा उठा पाते।

रक्षा संबंधी मुस्तैदी के गणना योग्य नमूने के साथ युद्ध अभियान की योजना अधिक वैज्ञानिक पूर्वानुमान के साथ बनाई जा सकती है। हमारी युद्ध प्रणाली और बलों के पैमाने उनके कार्य संबंधी तथा तकनीकी आंकड़ों के हिसाब से तय किए जा सकते हैं। उनकी गतिशीलता और दूसरे विन्यास के अनुसार उनकी जरूरतों तथा व्यावहारिकता की पड़ताल की जा सकती है और उसका खाका खींचा जा सकता है। इस कदम से अभियान की योजना बनाने की कवायद में किसी समय और स्थान में विरोधियों की सेनाओं समेत सभी सेनाओं की हलचल का पता लगाया जा सकता है। चीन के ही उदाहरण को आगे बढ़ाएं तो यह देखते हुए कि आक्रमण का कोई सार्थक विकल्प अपनाने के लिए उसे तिब्बत के बाहर से सेना तैयार करनी होगी, नमूने में हवाई ठिकानों तथा काम में लाए जाने वाले संसाधनों, विन्यासों के प्रकार, उन्हें कब और कहां तैयार करना है, सेंसरों, संचार आदि की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए तैयारी की व्याख्या होनी चाहिए। संभावित सामूहिक गतिविधियों के जरिये युद्ध की स्थितियों की बदलती हुई मांगों के हिसाब से स्वयं को ढालते हुए हमारी सेनाओं के लिए अधिक फायदेमंद स्थितियों का फैसला चुटकियों में किया जा सकता है तथा विरोधी को अधिक प्रभावी और प्रभुत्वशाली जवाब सोचा और दिया जा सकता है। अपनी और विरोधी सेनाओं के संख्या बल को किसी भी समय नापा जा सकता है तथा कमांडर उन्हीं अनुमानों के मुताबिक अपनी कार्रवाई में बदलाव ला सकते हैं। युद्ध के व्याकरण के हिसाब से सेना की स्थिति को उन घटकों में शुमार किया जा सकता है, जिनका विभिन्न छोटे-बड़े अभियानों में कमांडर अपनी जानकारी के अनुरूप प्रयोग कर सकते हैं और जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से मशीनी बुद्धिमत्ता ऐसे अभियान की योजना बहुत अच्छे ढंग से बना सकती है और ऊपर बताए गए तरीके से उसे अंजाम भी दे सकती है।

रक्षा तत्परता या मुस्तैदी का नमूना तैयार करने या उसकी पड़ताल करने में बुनियादी रक्षा प्रणालियां ही प्रमुख तत्व हैं। उनकी प्रभावशीलता उनकी मारक क्षमता और भारतीय परिस्थितियों और माहौल में काम करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करती है। उनकी लंबे समय तक बने रहने की क्षमता, पुर्जों की उपलब्धता, लाइसेंस की शर्तें और किफायत भी उतनी ही अहम हैं। आजकल रक्षा प्रणालियों में सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी घटकों की बढ़ती हिस्सेदारी ने नई और शानदार क्षमताएं प्रदान की हैं, लेकिन कुछ ऐसी खामियां भी पैदा हो गई हैं, जिनका फायदा साइबर जगत में उठाया जा सकता है। इसके अलावा यदि प्रणालियां देश के बाहर से मंगाई जा रही हैं तो उनकी विश्वसनीयता की परख भी गंभीर मसला है। इसीलिए उनकी विशेषताओं को ऊपर बताए गए कारकों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने के बाद ही तैयार करना चाहिए। बाजार में पहले से मौजूद प्रणालियां संभवतः उन कारकों के अनुरूप नहीं होंगी, इसीलिए रक्षा प्रणाली की खरीद के तहत देश में ही विनिर्माण के प्रयास भी करने पड़ सकते हैं और वैश्विक बाजार से अपनी जरूरतों के अनुसार तैयार की गई प्रणालियां भी खरीदनी पड़ सकती हैं। फौरी जरूरतों को सीधे खरीद के जरिये पूरा किया जा सकता है, लेकिन बेहतर मुस्तैदी और तैयारी के लिए दीर्घकालिक रणनीति ‘मेक इन इंडिया’ पर आधारित होनी चाहिए और उसमें ‘स्वदेश में डिजाइन तथा विकास एवं विनिर्माण’ के रास्ते का अधिकाधिक इस्तेमाल होना चाहिए और प्रणाली की विशिष्टताओं को समुचित पड़ताल तथा विश्लेषण के बाद ही तैयार किया जाना चाहिए।


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Published Date: 4th October 2016
(Disclaimer: The views and opinions expressed in this article are those of the author and do not necessarily reflect the official policy or position of the Vivekananda International Foundation)

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