चीन की धमकी को भारत के करारे जवाब पर सवाल करना राष्ट्र विरोधी
Amb Satish Chandra, Vice Chairman, VIF

इस बार का भारत-चीन टकराव 1962 की लड़ाई के बाद से सबसे गंभीर टकराव है। यह विवाद सैकड़ों किलोमीटर लंबी सीमा पर है, जिसमें कई विवादित क्षेत्र शामिल हैं। इस विवाद में दोनों देशों के बीच झड़प होती रही हैं, जिनमें कई सैनिक हताहत हुए हैं और भारी सैन्य जमावड़ा हो गया है। दोनों पक्षों के सैन्य कमांडरों के बीच तीन चरण की बातचीत और राजनयिक संवाद के बाद भी वास्तव में इलाके से सेना कम नहीं की गई है। इस हिसाब से यह संकट जल्द नहीं सुलझने वाला और भारत को लंबे समय तक इसका सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि विवाद की जड़ चीन की दबदबा कायम करने की फितरत है, जिस कारण अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने का भारत का संकल्प उसे खटकता है।

सरकार के शुरुआती कदम भरोसा जगाते हैं। प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री के 17 जून के नपे-तुले बयान इशारा करते हैं कि भारत चीन के सामने झुकेगा नहीं बल्कि अपने रुख पर अड़ा रहेगा और जरूरत पड़ी तो उसके दुस्साहस का करारा जवाब देने के लिए भी वह तैयार है। यह बात 3 जुलाई को लद्दाख में जवानों के सामने प्रधानमंत्री के जोशीले भाषण से और भी स्पष्ट हो गई। यह भी साफ है कि चीन को सरकार का जवाब कई आयाम लिए होगा और उसमें सैन्य, राजनयिक तथा वाणिज्यिक रास्ते अपनाए जाएंगे। सेना के पहलू की बात करें तो वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अधिक सैन्य तैनाती और हथियारों की कमी दूर करने के उपाय दिख ही गए हैं। राजनयिक मोर्चे पर दोस्ताना देशों को चीन की आक्रामक कार्रवाइयों की जानकारी लगातार दी गई है, समान विचार वाले देशों के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत होने जा रहे हैं और हॉन्गकॉन्ग, सिनकियांग, तिब्बत, दक्षिण चीन सागर आदि में चीन के दमनकारी कृत्यों पर चुप्पी का सिलसिला भी अब खत्म हो सकता है। आर्थिक मोर्चे पर चीन के साथ रिश्ते खत्म करने का बहुप्रतीक्षित अभियान अब जोर पकड़ता दिख रहा है क्योंकि दूरसंचार से लेकर सड़क निर्माण और बिजली से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक विभिन्न क्षेत्रों में चीन को भारतीय बाजार से बाहर किया जा रहा है।

अस्तित्व के इस संकट के समय भारत को एकजुट रहना चाहिए। 19 जून को प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में अधिकतर विपक्षी पार्टियों ने एकमत से सरकार के रुख का समर्थन किया। बेशक कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आदतन प्रधानमंत्री की बुराई जारी रखी, लेकिन उनकी अहमियत ही खत्म हो रही है और उनकी बातों को तवज्जो देने की कोई जरूरत नहीं।

मगर यह बात तकलीफ देती है कि जिस समय चीन पूरी बेशर्मी के साथ हमारी सीमाओं पर जोर दिखा रहा है, उस समय कुछ भारतीय बुद्धिजीवी आलोचना में जुटे हैं और सरकार का समर्थन करने के बजाय उसके करारे जवाब में खामियां ढूंढ रहे हैं। हालांकि रचनात्मक आलोचना से किसी को एतराज नहीं है मगर यह तो कहा ही जा सकता है कि इस तरह की आलोचना स्थिति सामान्य होने के बाद भी की जा सकती है। लेकिन जब आलोचना किसी बड़े खतरे के खिलाफ राष्ट्र के संकल्प को कम करने की कोशिश करे तो इसे पराजयवाद या राष्ट्र विरोधी कहना ही सही होगा।

ऐसी खराब आलोचना का उदाहरण एक नामी शिक्षाविद के बयान में मिलता है, जहां उन्होंने कहा कि भारत को चीन के साथ अपने मतभेद केवल राजनयिक तरीके से सुलझाने चाहिए और सैन्य विकल्प या आर्थिक मजबूती का फायदा उठाने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। ऐसे ही एक शख्स की दलील है कि भारत और चीन के मुकाबले में चीन का पलड़ा भारी है, इसलिए भारत को विवाद बढ़ाना नहीं चाहिए और चीन की इज्जत कर तथा उसकी बात मानकर शांति कायम करनी चाहिए।

ऊपर दी गई दलीलें एकदम गलत हैं क्योंकि भारत नहीं चीन तनाव बढ़ा रहा है। चीन तो हमारा पड़ोसी बनने के बाद से ही ऐसा कर रहा है और आक्रामक रवैया अपनाकर हमारी हजारों किलोमीटर जमीन पर अवैध कब्जा जमाए बैठा है। असल में चीन के साथ लगी सीमाओं पर यह दुखद स्थिति विवाद के समाधान के लिए कूटनीति के अलावा कोई विकल्प नहीं अपनाने की हमारी आदत का ही नतीजा है। हमारी उसी नाकामी के कारण अब जरूरी है कि भारत चीन के सामने खड़ा हो और उसे भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण से रोकने के लिए हरमुमकिन विकल्प का इस्तेमाल करे। जहां तक चीन की बात मानने का सवाल है तो शायद ही किसी देश ने भारत की तरह उसकी बात मानी हो। भारत ने तो उसे तिब्बत पर कब्जा तक करने दिया, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसकी स्थायी सदस्यता का समर्थन किया, वन चाइना की नीति मान ली और उसके साथ भारी व्यापार असंतुलन को आज तक चलने दिया। सबसे बढ़कर भारत ने चीन के प्रमुख हितों का पूरा ध्यान रखा है और किसी भी तरह उसके साथ रिश्ते बनाए रखने की कोशिश की है, जबकि उसने तमाम मसलों पर बेशर्मी के साथ हमारा विरोध किया है मसलन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हमारी स्थायी सदस्यता में रोड़े अटकाए हैं, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में हमारी सदस्यता अटकाई है, पाकिस्तान को परमाणु हथियार समेत तमाम अस्त्र दिए हैं, सुरक्षा परिषद में कश्मीर का मसला उठाता रहा है, आतंकवाद से जुड़े मसलों पर पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है चाहे मसूद अजहर का मामला हो या फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स हो और हमारे पड़ोसियों को वह लगातार हमारे खिलाफ भड़काता भी रहता है। अफसोस की बात है कि चीन की इज्जत की फिक्र तो की गई मगर किसी ने भी भारत का सम्मान बचाने की बात नहीं की!!

इसी तरह एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की राय है कि भारत को “सच में गुटनिरपेक्ष” रहना चाहिए और “बड़े चीन विरोधी गठबंधन” के साथ नहीं जाना चाहिए क्योंकि चीन इसे भड़कावा मानता है। दिलचस्प है कि वह पूरी तरह भूल गए हैं कि खुद जवाहरलाल नेहरू ने 1962 के युद्ध में पश्चिम से हथियारों की भीख मांगी थी, जो गुटनिरपेक्षता की हमारी नीति के खिलाफ था। उन्हें यह भी याद नहीं कि भारत-अमेरिका परमाणु समझौता तब हुआ था, जब वह खुद सुरक्षा सलाहकार के पद पर थे और इससे चीन नाराज हुआ था तथा गुटनिरपेक्षता की हमारी नीतियों को करारा झटका लगा था। उनका यह भी कहना है कि भारत-चीन टकराव हमारे खुफिया आकलन की नाकामी का परिणाम है। उनका खुफिया नाकामी के आरोप लगाना कुछ ज्यादा ही हो गया क्योंकि नवंबर 2008 में जब भारत की सुरक्षा में सेंध लगाते हुए सबसे बड़े हमलों में से एक को मुंबई में अंजाम दिया गया था, उस समय देश की सुरक्षा की कमान उन्हीं के हाथों में थी। अंत में सरकार के साथ इतने लंबे अरसे तक काम करने के कारण उनसे उम्मीद रही होगी कि उन्हें खुफिया चुस्ती या सुस्ती जैसे मसले इस संकट के सुलझन के बाद सही वक्त पर उठाने की समझ है।

एक अन्य शिक्षाविद का तर्क है कि चीन के साथ भारत के सामरिक संबंध दक्षिण एशिया के साथ शुरू होने चाहिए, भारत को दक्षेस में नई जान फूंकने के लिए मेहनत करनी चाहिए और भारत में इस्लामोफोबिया तथा सरकार की “दोषपूर्ण” आर्थिक दृष्टि इसकी राह में रोड़ा बन रही है। इस तर्क में कई झोल हैं। सबसे पहले, दक्षिण एशिया चीन के साथ हमारे रिश्तों में बहुत कम अहमियत रखता है और इसके प्रति भारत की नीतियों से भारत-चीन संबंधों पर असर नहीं पड़ सकता क्योंकि उनकी अपनी अलग प्रकृति है। दूसरी बात, सीमित संभावना होने के बाद भी भारत ने हद से भी आगे जाकर अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ करीबी संबंध बनाए हैं और उसके लिए उनकी वित्तीय, सैन्य, तकनीकी तथा वाणिज्यिक मदद की है एवं कोई भी संकट आने पर सबसे पहले उनके साथ खड़ा हुआ है। समय-समय पर उसने क्षेत्रीय या सामरिक रियायतें देने में भी हिचक नहीं दिखाई है, जिनका इस्तेमाल कम ही किया गया है। अफसोस है कि भारत के इस सकारात्मक रुख को न तो पर्याप्त सराहना मिली है और न ही पर्याप्त प्रतिक्रिया। यही वजह है कि दक्षेस आगे नहीं बढ़ पाया और भारत में उसमें कुछ कर भी नहीं सकता।

तीसरी बात, यह झूठ है कि भारत की पहचान इस्लामोफोबिया से होती है। इसके उलट भारत में मुसलमानों को अन्य धर्मों के लोगों के बराबर माना जाता है और उनकी स्थिति कई इस्लामिक देशों में रहने वाले मुसलमानों से बहुत बेहतर है। अंत में, आत्मनिर्भरता के आह्वान के कारण सरकार की आर्थिक दृष्टि को “पेचीदा” या गलत करार देना सीधे-सीधे बदमाशी है। सही समझ वाली सभी सरकारें अधिक से अधिक स्थानीय विनिर्माण चाहती हैं और यह कहना सरासर बेवकूफी है कि भारत सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे धार्मिक एकीकरण को नुकसान पहुंचेगा।

भारत-चीन टकराव भारत के इतिहास में बड़ा मोड़ है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत का रसूख इसी बात पर निर्भर करेगा कि इस संकट से वह कैसे निपटता है। बहुत कुछ दांव पर लगा है। चीन को सफलतापूर्वक धकेलने से संकेत मिलेगा कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर भारत बड़ा खिलाड़ी बन गया है। ऐसा नहीं हो पाया तो उसे छोटी सी हस्ती माना जाएगा, जो सबके रहमोकरम पर रहता है। ऐसी सूरत में यह जरूरी है कि हरेक भारतीय चीन को भारत के खिलाफ दबदबे वाली अपनी नीतियां आजमाने से रोकने के चौतरफा प्रयासों में सरकार के साथ एकजुट होेकर खड़ा रहे। इन प्रयासों से देश पर भारी बोझ तो पड़ेगा, इसीलिए हरेक भारतीय को अपने हिस्से का योगदान करना होगा। दो देशों की इच्छाशक्तियों का टकराव लंबा खिंच सकता है। अतीत की तरह आम आदमी को हर जरूरी बलिदान करना होगा। मगर उम्मीद की जाए कि बैठे-बैठे मुंह चलाने वाले हमारे बुद्धिजीवी भी ऐसा ही करेंगे और संकट के इस समय में ओछी हरकतें करने तथा सरकार की बेजा आलोचना करने से बाज आएंगे। इस समय देश को एकजुट होने की जरूरत है और इससे चीन के खिलाफ हमारे जवाब को निर्णायक ऊर्जा मिलेगी तथा भारत को सफलता मिलेगी।


Translated by Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)Image Source: https://timesofindia.indiatimes.com/thumb/msid-74943308,width-1200,height-900,resizemode-4/.jpg

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