मोदी का दूसरा कार्यकाल: ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पर अमल
Dr Sreeradha Datta, Centre Head & Senior Fellow, Neighbourhood Studies, VIF

भारत के आम चुनावों पर अन्य लोगों के साथ ही पड़ोसियों का भी भरपूर ध्यान रहा। कई को चुनावी कवायद के इतने बड़े स्तर से अचरज तो हुआ, लेकिन उनका ज्यादा ध्यान इस बात पर लगा था कि भारत के साथ उनके द्विपक्षीय संबंधों पर चुनाव का क्या असर होगा। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की जबरदस्त जीत पर जब पड़ोसी देशों से बधाई संदेश आए तो पता चला कि भारत के साथ काम करने में उनकी कितनी रुचि है और इस देश से उन्हें कितनी ज्यादा उम्मीद है।

ये संदेश सामान्य बधाई संदेशों तक सीमित नहीं थे और प्रत्येक नेता ने भारत के साथ घनिष्ठता से काम करने की इच्छा जाहिर की। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में मनोनीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘शांति, प्रगति और संपन्नता के लिए काम करते’ देखने की इच्छा जताई, जो शायद सभी की भावनाओं को व्यक्त कर रही थी। जिस तरह भारत की जनता ने वृद्धि और प्रगति के वे बड़े लक्ष्य हासिल करने का मौका राजग सरकार को देने का फैसला किया, जिनकी बात मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में की थी, उसी प्रकार पड़ोसी भी पहले की कई योजनाओं तथा परियोजनाओं के लागू होने और फल मिलने की उम्मीद लगा रहे हैं। साथ ही उन्हें नए मौके मिलने की उम्मीद भी है।

विजयी राजग गठबंधन के नेता के तौर पर मोदी की वापसी कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे पहला और प्रमुख कारण यह है कि इससे उन कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं को मजबूती मिलेगी, जो पिछली सरकार के कार्यकाल में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ यानी पड़ोसी प्रथम नीति के तहत शुरू किए गए थे और पूरे नहीं हो सके थे। दूसरा कारण, अगले पांच वर्ष व्यापक क्षेत्रीय लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश तथा अनुकूल माहौल प्रदान करेंगे। भारत में पुराने ढर्रे से उलट मोदी एक क्षेत्रीय मंच तथा बिम्सटेक के क्षेत्रीय संगठनों के जरिये पड़ोसियों से जुड़ने के लिए उत्सुक हैं। इसलिए उप क्षेत्रीय व्यवस्थाओं एवं क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्थाओं पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि उन्हें अधिक मजबूत बनाया जा सके और लोगों को विकास, शांति एवं संपन्नता के साझे लक्ष्यों का लाभ दिया जा सके।

तीसरा कारण, पिछले पांच वर्षों के दौरान पड़ोस में द्विपक्षीय रिश्तों का लेखाजोखा मिला जुला रहा है, लेकिन कुछ मामलों में दूसरों की अपेक्षा अधिक सफलता मिली है। इसीलिए पड़ोसियों के साथ काम करने का भारत का प्रयास केवल द्विपक्षीय संबंध मजबूत करने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि द्विपक्षीय रिश्ते पटरी से नहीं उतरें। प्रत्येक देश की राजनीतिक अनिश्चितताएं अक्सर द्विपक्षीय संबंधों पर भारी पड़ती हैं और क्षेत्रीय नेतृत्व के साथ दिल्ली की बातचीत पर प्रायः उस देश के तनाव एवं अनिश्चितताओं की मार पड़ी है। वास्तव में माले में भारत का अनुभाव इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिसे सौभाग्य से वापस पटरी पर लौटा लिया गया। विभिन्न विकास परियोजनाओं और साझे एजेंडा के जरिये द्विपक्षीय संबंध बनाए रखने पर अधिक जोर होगा।

इसी से एक बात यह भी निकलती है कि पड़ोसियों के साथ संपर्क बढ़़ने और मोदी की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति जारी रहने से क्षेत्र के नेताओं को अधिक क्षेत्रीय एकीकरण के जरिये अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने का अनुकूल वातावरण मिलेगा तथा क्षेत्र से बाहर की ताकतों जैसे चीन के साथ बातचीत करने की उन्हें अधिक गुंजाइश मिल जाएगी। हालांकि पूरा पड़ोसी क्षेत्र भारत तथा चीन के साथ नजदीकी से काम कर रहा है, लेकिन श्रीलंका और मालदीव का अनुभव बताता है कि चीन के बरअक्स कर्ज के डर अपना असर दिखा चुके हैं। हालांकि यह बात भी है कि बुनियादी ढांचा विकास की जरूरत देखते हुए अधिकतर पड़ोसियों के पास सीमित विकल्प ही हैं। अपनी विशाल अर्थव्यवस्था के कारण भारत उनमें से प्रत्येक को अधिक अनुकूल समझौते करने की पूरी गुंजाइश देने की स्थिति में होगा। भारत अभी इस पर काम कर रहा है, लेकिन पड़ोसियों की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी कुछ करने को रह गया है।

मोदी पद ग्रहण करने के बाद इसी महीने अपनी पहली विदेश यात्रा पर माले जाने वाले हैं। हाल में राष्ट्रपति सोलिह की कमान में मालदीव का कायाकल्प पड़ोस में भारत की सबसे अहम जीत में से एक है। सोलिह का ‘शानदार चुनावी विजय’ का संदेश बताता है कि द्विपक्षीय रिश्ते फिर सामान्य हो गए हैं और इससे हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षित माहौल का भरोसा भी मिलता है। सामरिक हितों के अलावा भारत और मालदीव के सहयोग में पर्यटन, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और लोगों के बीच रिश्तों समेत कई मुद्दे शामिल हैं तथा इस दौरे से आपसी सहयोग के ढांचे पर प्रतिबद्धता फिर दोहराई जाएगी।

भारत के लिए हिमालय में दो पड़ोसियों नेपाल और भूटान का बहुत महत्व है और दोनों के ही प्रधानमंत्रियों ने भारत के साथ घनिष्ठता के साथ काम करने में अपनी दिलचस्पी जताई है। अतीत में भारत और नेपाल के द्विपक्षीय संबंधों को मुश्किल भरे दौर का सामना करना पड़ा था और पिछले कार्यकाल में मोदी की चार नेपाल यात्राओं के दौरान उम्मीद के मुताबिक ओली और मोदी ने अविश्वास के चक्र को तोड़ दिया है। मोदी की वापसी पर काठमांडू में मिश्रित प्रतिक्रिया रही, कुछ ने हिंदू राष्ट्र की वापसी के लिए मोदी के प्रयासों पर आपत्ति जताई है, लेकिन एमिनेंट पर्सन्स ग्रुप की रिपोर्ट के क्रियान्वयन पर चर्चा करने से उनमें फिर भरोसा जगेगा। भूटान को सीमावर्ती दोकलाम इलाके में चीन की घुसपैठ पर संकट से गुजरना पड़ा और इस छोटे से साम्राज्य पर मंडराते इस खतरे को भारत ने कभी अनदेखा नहीं किया है। ऊर्जा व्यापार और पर्यटन सहयोग के बिंदु हैं और भूटान की 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 400 करोड़ रुपये की परिवर्तनकारी व्यापार सहायता सुविधा प्रदान करने का भारत का 2018 का फैसला सकारात्मक संकेत लगता है। फिर भी इस द्विपक्षीय संबंध को आने वाले दिनों में बेहतर तरीकने से बढ़ावा देना होगा।

मोदी की ‘जबरदस्त जीत’ पर श्रीलंका के प्रधानमंत्री की जोशीली प्रतिक्रिया उस देश के सामने हाल ही में आए संकट के मद्देनजर अहम है। भारत भी अचानक हो रहे आतंकी हमलों और उनके प्रभावों को लेकर श्रीलंका जितना ही चिंतित है। हालांकि कोलंबो आंतरिक मतभेदों से उबर गया है, लेकिन सहायता एवं बल के स्रोत के रूप में भारत की पक्षपात रहित भूमिका पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। दोनों के द्विपक्षीय संबंध और भी बेहतर रहे हैं, लेकिन हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को देखते हुए भारत के लिए ये रिश्ते अधिक प्रासंगिक हैं। आतंक और इस्लामी उग्रवाद के तमाशे के अलावा भी दिल्ली और कोलंबो के पास बातचीत करने के लिए बहुत कुछ होगा।
बांग्लादेश हमेशा ही अपने पड़ोसी का समर्थन करता रहा है और आने वाले दिनों में तीन राष्ट्रों की अपनी यात्रा के बीच दिल्ली में रुकने का बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना का फैसला घनिष्ठ द्विपक्षीय संबंधों का प्रमाण है। उस दौरान सुरक्षा बढ़ाने तथा आर्थिक मसलों पर बातचीत तो होगी ही, लेकिन दोनों पड़ोसियों को गति बढ़ाने के तरीके तलाशने होंगे। उम्मीद है कि क्षेत्रीय साझेदारी के मसले पर वे एकमत हो जाएंगे और लंबित मुद्दों का समाधान भी हो जाएगा।

हालांकि पड़ोसियों के साथ द्विपक्षीय रिश्ते बढ़ाने में संवाद और बातचीत की अहम भूमिका रहेगी, लेकिन पाकिस्तान के मामले में आगे बढ़ने से पहले भारत वहीं से संकेत मिलने का इंतजार करेगा। दोनों नेताओं की भेंट अगले महीने बिशकेक में शांघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान हो सकती है, लेकिन द्विपक्षीय वार्ता बहाल करने के लिए पाकिस्तान को अधिक ठोस प्रयास दिखाने होंगे। खासकर पुलवामा हमले के साये तले भारत किसी भी तरह की नरमी के संकेत मुश्किल से ही देगा। मोदी भारत पर किसी भी हमले का उचित जवाब देने में हिचकने वाले नहीं हैं। भारतीय सुरक्षा हितों के साथ जब भी छेड़छाड़ होगी, भारत चुप नहीं बैठेगा।

बिम्सटेक नेताओं और शांघाई सहयोग संगठन के मौजूदा मेजबान किर्गिजिस्तान एवं मॉरीशस के प्रधानमंत्रियों को मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाने का फैसला ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के अनुकूल है और क्षेत्रवाद पर दिए जा रहे जोर के अनुरूप ही है। भारत लगातार पूर्व की ओर देख रहा है और उसे उम्मीद है कि बिम्सटेक इस बार अहम रहेगा। करीब 1.5 अरब की आबादी वाले बिम्सटेक के सात देशों में में दो सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाएं (बांग्लादेश और भारत) हैं, जिनका कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 3.5 लाख करोड़ डॉलर के करीब है। बिम्सटेक के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुखों की मार्च 2017 (नई दिल्ली) और मार्च 2018 (ढाका) में हुई दो बैठकें बताती हैं कि सरकारें क्षेत्र की सुरक्षा की पेचीदा स्थिति को लेकर कितनी चिंतित हैं। बंगाल की खाड़ी को साझा सुरक्षा क्षेत्र मानने का प्रस्ताव 2017 की पहली बैठक में रखा गया था और उस पर लगातार ध्यान दिया जाता रहा। विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन, नई दिल्ली द्वारा ‘क्षेत्रीय सुरक्षा’ पर आयोजित पहले बिम्सटेक विचार संवाद का विषय भी यही था।

इसी प्रकार जीवंत भारतीय समुदाय से लगातार संपर्क का प्रमाण मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण जुगनाथ को न्योते से मिलता है। जगनाथ भारतीय मूल के सबसे अधिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों में शुमार हैं। पड़ोस में हुए घटनाक्रम ने स्पष्ट रूप से बताया है कि क्षेत्र के भीतर तथा बाहर से उठ रहे साझा खतरों से निपटने के लिए सभी को एक साथ आना होगा। सभी सदस्य देश सुरक्षा की प्रधानता और क्षेत्र में शांति स्थापित करने पर सहमत हैं क्योंकि उसके बगैर वृद्धि एवं संपन्नता नहीं आ सकती।

सुरक्षा की चिंता सब पर भारी पड़ती है, लेकिन उसके साथ ही क्षेत्र में भारत का मुख्य ध्यान आर्थिक रिश्ते विकसित कर और प्रगाढ़ कर लंबित द्विपक्षीय मसलों को कम से कम रखने पर होगा। अधिकतर मामलों में दक्षिण एशियाई पड़ोसियों की सरकारों के बीच रिश्ते खासे बेहतर हुए हैं, लेकिन लोगों के बीच संपर्क भी मजबूत करने की जरूरत है। भारत को पड़ोसियों के दिमाग में भारतीय मंशा के प्रति चल रहे डर, संदेह, अविश्वास को दूर करना पड़ेगा। उन्हें स्पष्ट रूप से बताना होगा कि भारत उनके लिए किसी तरह का खतरा नहीं है। उम्मीद है कि विश्वास से भरे मोदी और विकास करता भारत पड़ोसियों को नए कार्यकाल में अधिक संवाद करने का हौसला देंगे। बदलती समयसीमा और लटकती परियोजनाएं भारत की विदेश नीति के लिए अभिशाप की तरह रही हैं और भारत को इससे निपटना होगा।

भारत के अतीत को देखते हुए इसके लिए ज्यादा काम करना पड़ेगा, लेकिन उम्मीद है कि इस बार अतीत के गतिरोध को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। निश्चित रूप से भारत और भारतीय तंत्र में भरोसा एवं विश्वास जगाने का सबसे अच्छा मौका मोदी के पास है।


Translated by Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source:
https://img.theweek.in/content/dam/week/news/india/images/2019/5/27/modi-bimstec-leaders-reuters.jpg

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