रोहिंग्या संकट – भारत द्वारा चतुराई भरी कूटनीति की आवश्यकता
Ashok Sajjanhar

प्रस्तावना

पिछले कुछ हफ्तों में रोहिंग्या संकट एकाएक अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चेतना और अंतरात्मा पर छा गया है। म्यांमार के पड़ोसियों विशेषकर बांग्लादेश और भारत पर इसका प्रभाव दूर बसे देशों की तुलना में बहुत अधिक रहा है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

रोहिंग्या समुदाय म्यांमार के पश्चिमी तटवर्ती रखाइन प्रांत के भारतीय आर्य लोग हैं, जो किसी देश के नागरिक ही नहीं हैं। हालिया संकट से पूर्व म्यांमार में करीब 10 लाख रोहिंग्या रह रहे थे। उनमें से अधिकतर मुसलमान हैं और कुछ हिंदू हैं। 2013 में संयुक्त राष्ट्र ने रोहिंग्या को सर्वाधिक सताए गए अल्पसंख्यक करार दिया था, लेकिन उन्हें जातीय अल्पसंख्यक नहीं माना गया है। उन्हें 1982 के बर्मा के नागरिकता अधिनियम के तहत नागरिकता देने से इनकार कर दिया गया। ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक “1982 के कानून ने रोहिंग्या को राष्ट्रीयता मिलने की संभावना लगभग खत्म ही कर दी। रोहिंग्याओं का इतिहास 8वीं सदी से आरंभ हो जाता है फिर भी बर्मा का कानून जातीय अल्पसंख्यक को राष्ट्रीय जाति के रूप में मान्यता नहीं देता।”

रोहिंग्याओं को घूमने की स्वतंत्रता, सरकारी शिक्षा और प्रशासनिक सेवा की नौकरियों से वंचित रखा गया है। रोहिंग्याओं का कहना है कि वे लंबे समय से म्यांमार में रहते आए हैं और उनके समुदाय में औपनिवेशिक काल से पहले के और औपनिवेशिक काल के दौरान बसाए गए लोग शामिल हैं। म्यांमार सरकार “रोहिंग्या” शब्द को ही स्वीकार नहीं करती और उन्हें “बंगाली” कहना पसंद करती है। रोहिंग्या अभियान दल विशेषकर अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गनाइजेशन “म्यांमार के भीतर स्वनिर्णय” का अधिकार मांगते हैं।

वर्तमान संकट

हफ्तों तक तनाव रहने के बाद 25 अगस्त, 2017 को अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (आरसा) ने कम से कम 25 पुलिस चौकियों पर हमला बोल दिया और म्यांमार के कई सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर दी। सरकार आरसा को आतंकवादी संगठन बुलाती है। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) का कहना है कि आतंकियों को विदेश में प्रशिक्षण मिला है और सऊदी अरब में रहने वाले रोहिंग्या समूह का नेतृत्व करते हैं। उसका दावा है कि आरसा का नेता अता उल्ला है, जो पाकिस्तान में जन्मा है और सऊदी अरब में पला-बढ़ा है। आरसा 2013 से ही लोगों को प्रशिक्षण देती आ रही है, लेकिन उसने पहला हमला अक्टूबर, 2016 में किया था, जब उसके आतंकियों ने नौ पुलिस अधिकारियों को मार दिया। हाल ही में कई क्षेत्रों में झड़पों की खबरें मिलीं, जिनमें से कुछ में रोहिंग्या ग्रामीणों ने सुरक्षा बलों के साथ लड़ाई में आतंकियों का साथ दिया था। सुरक्षा बलों ने कई बार रोहिंग्याओं के गांव जलाए हैं और उनमें रहने वालों पर गोलीबारी की है। कभी-कभी सुरक्षा बलों को सशस्त्र बौद्ध नागरिकों का साथ भी मिलता है। खबरें हैं कि बौद्ध समुदायों पर भी हमले हुए और उनके कुछ सदस्यों की हत्या कर दी गई।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार रोहिंग्याओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन “मानवता के विरुद्ध अपराध” कहला सकता है। संयुक्त राष्ट्र और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों द्वारा की जा रही भर्त्सना का म्यांमार सरकार जमकर खंडन करती आई है। कथित रूप से संघर्ष के फोटो और वीडियो व्यापक रूप से फैलाए गए हैं। उनमें से अधिकतर वीभत्स और भड़काऊ हैं और कई फर्जी बताए गए हैं।

म्यांमार में सैन्य शासन के दौरान कई वर्ष तक घर में ही नजरबंद रहीं देश की वास्तविक नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता डॉ आंग सान सू ची की इस मसले पर आलोचना बढ़ती जा रही है। उन्होंने दावा किया है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ रही खबरों ने “झूठ का पहाड़” खड़ा कर दिया है। वह इस बात पर अड़ी हुई हैं कि आतंकवादियों के हितों को बढ़ावा देने वाली झूठी खबरों की वजह से तनाव बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव कह चुके हैं कि लाखों रोहिंग्याओं को घर छोड़कर विदेश भागने के लिए मजबूर करने वाले सैन्य हमले को रोकने का सू ची के पास “आखिरी मौका” है।

भारत की दुविधा

इससे भारत के सामने कठिन स्थिति आ गई है। ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद चीन से लौटते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 से 7 सितंबर, 2017 के बीच जब म्यांमार का दौरा किया था तो उन्होंने आंग सान सू ची के नेतृत्व की खुले दिल से सराहना की थी और म्यांमार के सुरक्षा बलों पर हो रहे आतंकी हमलों के खिलाफ पूरा समर्थन व्यक्त किया था। जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय दबाव झेल रही सू ची ने भी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र से मिले स्पष्ट समर्थन के लिए पूरा आभार व्यक्त किया था।

भारत विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा, स्थिरता एवं संपन्नता के लिहाज से म्यांमार बहुत महत्वपूर्ण है। म्यांमार भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को अन्य आसियान देशों से जोड़ने वाला दरवाजा है। भारत के व्यापारिक तथा संपर्क संबंधी कार्यक्रमों में वह महत्वपूर्ण साझेदार है। पूर्वोत्तर भारत से म्यांमार होते हुए थाईलैंड और उसके पार तक जाने वाले त्रिपक्षीय राजमार्ग और कालादान मल्टीमोडल पारगमन परिवहन परियोजना समेत कई प्रमुख संपर्क परियोजनाएं क्रियान्वयन के आगे के चरणों में हैं। म्यांमार के सुरक्षा बल भारत के साथ सक्रिय सहयोग कर रहे हैं ताकि भारतीय उग्रवादी मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड से लगी हुई 1,640 किलोमीटर लंबी सीमा के पार भारतीय नागरिकों एवं सुरक्षा बलों पर आतंकी हमले करने के लिए म्यांमार की धरती का इस्तेमाल नहीं कर पाएं। भारत के एक्ट ईस्ट नीति की सफलता काफी हद तक म्यांमार के साथ फलदायक संबंधों पर टिकी है। म्यांमार में चीन की बढ़ती उपस्थिति तथा फैलता प्रभाव भारत के लिए चिंता का लगातार बढ़ता विषय है। इसके कारण म्यांमार और उसके नेतृत्व से मजबूत संबंध बनाना आवश्यक हो गया है।

साथ ही साथ बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। प्रधानमंत्री मोदी और शेख हसीना के साहसिक नेतृत्व के कारण दोनों देशों के बीच संबंध 1975 के बाद से अपने सर्वश्रेष्ठ दौर में हैं। बांग्लादेश शरणार्थी संकट से सबसे अधिक पीड़ित रहा है। पिछले 2 हफ्तों में वहां 3,70,000 से अधिक शरणार्थियों के पहुंच जाने की खबरें हैं। उन शरणार्थियों को रखने की उसकी क्षमता खत्म हो रही है। इस मामले में शेख हसीना पर विपक्षी पार्टियों विशेषकर पाकिस्तान की ओर झुकाव वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी की ओर से दबाव बढ़ रहा है। बांग्लादेश में चीन की लगातार बढ़ती उपस्थिति भारत के पारंपरिक प्रभुत्व और मैत्रीपूर्ण संबंधों को नुकसान पहुंचा रही है और यह चिंता का विषय है। बांग्लादेश में अगले वर्ष चुनाव होने हैं और यदि शेख हसीना इस मसले का शीघ्र और संतोषजनक हल नहीं निकालती हैं तो उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी। इसी के कारण भारत ने सितंबर को अपने रुख में काफी बदलाव किया और म्यांमार को संयम बरतने की सलाह दी ताकि बांग्लादेश पर असहनीय भौतिक एवं राजनीतिक बोझ न पड़ने पाए। संकट का समाधान निकालने के लिए बांग्लादेश भारत की ओर ताक रहा है ताकि भारत म्यांमार को इस बात के लिए मना ले कि शरणार्थियों को जबरन बाहर नहीं निकाला जाए और जो भाग गए हैं, उन्हें वापस ले लिया जाए। बांग्लादेश को इस आपदा से निपटने के लिए हरसंभव भौतिक, कूटनीतिक एवं नैतिक समर्थन की आवश्यकता है। अपने “इंसानियत” कार्यक्रम के अंतर्गत भारत ने 7,000 टन राहत सामग्री देने का वायदा किया है, जिसमें खाने का सामान, दवाएं, तंबू आदि शामिल हैं। शरणार्थियों की मदद के लिए यह सामान लेकर विमान रोजाना ढाका जा रहे हैं।

भारत के भीतर भी इस मुद्दे पर कई खेमे बंट गए हैं। भारत ने 1951 की संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि पर हस्ताक्षर तो नहीं किए हैं, लेकिन उसने हमेशा ही शरणार्थियों का स्वागत किया है, चाहे वे अफगानिस्तान से हों, बांग्लादेश से हों, म्यांमार से हों, श्रीलंका से हों, तिब्बत से हों या कहीं और से हों। लेकिन इस मामले में गंभीर चिंता इस बात की है कि शरणार्थियों में आरसा के सदस्य भी हो सकते हैं, जिनके अल कायदा, इस्लामिक स्टेट, जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-तैयबा आदि से रिश्ते हैं। बताया गया है कि पाकिस्तान का आईएसआई भी शरणार्थियों के बीच छिपे आतंकी तत्वों को प्रशिक्षण दे रहा है। इससे भारत के सामने सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। इसीलिए उसने भारत की धरती पर आ चुके 40,000 शरणार्थियों को वापस भेजने की अपनी मंशा जाहिर कर दी है। सरकार ने दो शरणार्थियों द्वारा दाखिल याचिका के जवाब में 18 सितंबर को उच्चतम न्यायालय को बताया कि रोंहिंग्या “देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा” हैं और उनके कारण सामाजिक तनाव हो सकता है तथा कानून-व्यवस्था संबंधी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और मेवाड़ में अस्थायी रूप से बसे शरणार्थियों में आतंकी पाए गए हैं। भारत इन शरणार्थियों को आने की इजाजत देकर देश को आतंकी खतरे के सामने नहीं झोंकना चाहता।

मुसलमान होने के कारण इन शरणार्थियों को वापस भेजने के भारत के निर्णय की कुछ देसी विपक्षी पार्टियों तथा नागरिक समूहों ने आलोचना की है। सरकार ने इन आरोपों का मजबूती से खंडन किया है। संयुक्त राष्ट्रमानवाधिकार उच्चायुक्त तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय पक्ष भी भारत को धिक्कार रहे हैं। लेकिन भारत ने दृढ़तापूर्वक अपने रुख को सही बताया है।

आगे की राह

समस्या का समाधान बांग्लादेश या भारत या किसी अन्य देश में नहीं बल्कि म्यांमार में ही है। सू ची की तीखी आलोचना करने से म्यांमार अपना रुख नहीं बदलेगा। म्यांमार को अपनी नीति बदलने के लिए मनाने का इकलौता रास्ता कूटनीति और बातचीत है। मयांमार को यह यकीन दिलाने की जरूरत है कि मामले का समावेशी और शांतिपूर्ण समाधान निकालना स्वयं उसके हित में है। म्यांमार को अपने राजनीतिक एवं आर्थिक विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद की जरूरत है, जो उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का जिम्मेदार सदस्य बनने से मिल जाएगी। भारत को चाहिए कि वह म्यांमार को कोफी अन्नान के नेतृत्व वाले सलाहकार आयोग द्वारा रखाइन प्रांत के बारे में की गई सिफारिशें लागू करने पर गंभीरता से विचार करने के लिए मनाए। म्यांमार के कई इलाकों में अब भी सब कुछ सेना के ही हाथ में है। 25 प्रतिशत संसदीय सीटों और रक्षा, आंतरिक सुरक्षा, सीमा मामलों आदि के मंत्रालयों पर अब भी सेना का ही नियंत्रण है। इसीलिए आंग सान सू ची भी अधिक लचीला रुख नहीं अपना सकतीं।

भारत द्वारा कुशल कूटनीति अपनाए जाने की त्वरित आवश्यकता है। भारत को म्यांमार के साथ मिलकर स्थिति साधनी ही होगी। उसके पास ऐसा करने की क्षमता है। उसे अपने दो बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील पड़ोसियों बांग्लादेश तथा म्यांमार के साथ तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एजेंसियों के साथ अपने रिश्तों की चुनौतियों को एक साथ साधना है। घर पर भी उसे विपक्षी दलों तथा नागरिक समाज के संगठनों की हायतौबा बंद करनी है। आने वाले दिनों में पता चलेगा कि भारत चुनौती का सामना कर पाता है अथवा नहीं। पिछले कई महीनों में और भी मजबूत चुनौतियों का अच्छी तरह से सामना करने की जो क्षमता उसने दिखाई है, उसे देखते हुए उम्मीद है कि भारत विजयी होगा।

(लेखक कजाकस्तान, स्वीडन और लातविया के राजदूत रह चुके हैं और अभी इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल स्टडीज के अध्यक्ष हैं।)


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: http://www.atimes.com/article/asean-dangerously-silent-rohingya-crisis/

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