2022 में संभावित भू-राजनीतिक रुझान
Arvind Gupta, Director, VIF

हमें नए वर्ष 2022 में दुनिया की महान शक्तियों के बीच घमासानी प्रतिद्वंद्विता और इसके चलते भू-राजनीतिक क्षेत्र में तनाव में भारी इजाफा होने की उम्मीद ही करनी चाहिए। अगर बीता वर्ष 2021 से कोई भी छोड़ा है तो उसका यही मतलब है कि विश्व चुनौतियों को हल करने के लिए एक विश्वसनीय तंत्र और प्रभावी सहयोग के अभाव में दुनिया के अशांत बने रहने की संभावना ही प्रबल दिखाई पड़ती है। जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो हथियारों की दौड़ और तेज हो सकती है, खासकर बाहरी अंतरिक्ष में। इसका एक संकेत है,रूस द्वारा एक हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल और एंटी-सैटेलाइट (एएसएटी) का परीक्षण किया जाना, जिससे कि एक हजार से अधिक मलबा बिखर गया है। निकट भविष्य में हाइब्रिड युद्ध एवं साइबर हमले के भी और तेज होने की संभावना दिखाई देती है।

वैचारिक संघर्ष भी नए वर्ष में तेज होने की संभावना है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने लोकतांत्रिक देशों का एक शिखर सम्मेलन बुलाया था, जिसका विषय-"लोकतंत्र को मजबूत करना और अधिनायकवाद से दुनिया का बचाव करना" था। बाइडेन अनुसार, यह हमारे समय की केंद्रीय चुनौती है। रूस, चीन, ईरान और कई अन्य देशों बाइडेन के इस प्रयास को उसी रूप में नहीं लिया। वे अमेरिकी आधिपत्य को ही आज की दुनिया में सबसे अधिक अस्थिर करने वाला कारक मानते हैं।

महान शक्तियों की जारी यह प्रतिद्वंद्विता तनावग्रस्त बहुपक्षवाद, अनिश्चित आर्थिक सुधार, उग्र महामारी, जलवायु परिवर्तन के खतरों के गहराने एवं ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता की पृष्ठभूमि में खेल करेगी।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आगामी 20वीं पार्टी कांग्रेस में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस की अपनी दौड़ में, शी ने सेना और अर्थव्यवस्था पर पार्टी के नियंत्रण को कड़ा कर दिया है, देश में स्वतंत्रता और स्वाधीनता को घटा दिया है, पार्टी में शुद्धिकरण किया है और चीन को अमेरिका के नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था के समक्ष एक प्रमुख चुनौती के रूप में सन्नद्ध कर दिया है।

हालांकि चीनी अर्थव्यवस्था भी तेज हवाओं का सामना कर रही है। उसकी 'सह-समृद्धि' और 'दोहरी परिसंचरण' अर्थव्यवस्था के नारों में सिमटी नई आर्थिक नीतियों ने विदेशी निवेशकों के मन में संदेह पैदा कर दिया है। रियल एस्टेट सेक्टर खराब कर्ज के बोझ से बुरी तरह दबा ही हुआ है। वहां निजी क्षेत्र की प्रतिष्ठित कंपनियों को पार्टी के पंजे के नीचे ला दिया गया है। जाहिर है कि ये रुझान चीनी अर्थव्यवस्था पर अपना असर डालेंगे।

इस प्रसंग में, कोई भी सुधी व्यक्ति 2022 में आक्रामक राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर चीन के और मुखर होने की उम्मीद करेगा। चीन का यह तेवर ताइवान पर और दबाव बढ़ाएगा। हांगकांग में लोकतंत्र की अनुमति-स्वीकृति देने वाली ‘एक राष्ट्र दो व्यवस्थाएं’ समाप्त हो गई हैं। शिनजियांग में चीनी दमन बढ़ता ही जा रहा है। चीन में आधुनिक तकनीकों द्वारा लागू की गई अभूतपूर्व निगरानी शुरू कर दी गई है। इन सबसे चीन और भी निरंकुश हो जाएगा।

घर में दमन और पड़ोसियों के प्रति चीन के आक्रामक व्यवहार पर इस वर्ष कुछ प्रतिक्रिया होने की संभावना है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) की विफलताओं के बावजूद, चीन विदेशों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इसे जारी रख सकता है। उसके सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रमों में भी तेजी आएगी क्योंकि चीन अगले दो से तीन दशकों में नंबर वन के रूप में उभरने के अपने लक्ष्य का पीछा कर रहा है।

अमेरिका-चीन संबंध वैश्विक भू-राजनीति के एक प्रमुख चालक के रूप में उभर रहे हैं। यद्यपि दोनों परस्पर विरोधी हैं, पर वे आर्थिक रूप से एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और कम से कम सत्तर के दशक से उनके आपसी सामंजस्य का एक लंबा इतिहास रहा है। डिकूपिंग सीधे या पूरी तरह से संभव नहीं है। अहम मुद्दा यह है कि दोनों देश तनाव से बचने के लिए किस हद तक मिल कर काम कर सकते हैं और परस्पर सहयोग कर सकते हैं। ताइवान के एक फ्लैशपॉइंट के रूप में उभरने की संभावना है, जो वैश्विक अस्थिरता का बड़ा कारण बन सकता है। इनमें दुर्घटनाओं और गलतफहमियों के कारण तनाव बढ़ सकता है, और वह संघर्ष का रूप भी ले सकता है।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र प्रतियोगिता के एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया को मिला कर क्वाड के उद्भव और अब औकस (ऑस्ट्रेलिया, यूएस और यूके) ने इस क्षेत्र में सुरक्षा परिदृश्य को महत्त्वपूर्ण रूप से बदल दिया है। चीन को इन दोनों संस्थाओं पर गहरा शक है। पर उसे एक नई वास्तविकता के साथ तालमेल बिठाना होगा। हालांकि इस बात सबसे अधिक संभावना है कि चीन अपने रुख को सख्त बनाएगा और क्षेत्रीय देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल करने की कोशिश करेगा।

इंडो-पैसिफिक में कई फ्लैशप्वाइंट मौजूद हैं-दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर, ताइवान, पहली और दूसरी द्वीप श्रृंखला। समुद्री स्थानों का सैन्यीकरण किया जा रहा है। उच्च स्तरीय नौसैनिक अभ्यास आम होते जा रहे हैं। चीन और आसियान के बीच आचार संहिता बनाने की अंतिम समय सीमा 2022 के चूकने की संभावना है। आसियान अपनी केंद्रीयता को लेकर चिंतित है, क्योंकि चीनी-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। आसियान के कई देश इन दो दिग्गजों-चीन और अमेरिका-के साथ आर्थिक रूप से अपने जुड़ावों के बीच प्रतिस्पर्धा के प्रबंधन और सुरक्षा का दबाव महसूस कर रहे हैं।

चीन के उदय के कारण जापान की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई हैं। उसके आजू-बाजू में शत्रुतापूर्ण चीन, उग्र उत्तर कोरिया और अडिग रूस है। इनसे अपनी सुरक्षा के लिए जापान अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर है। जापान में अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने की भावना बढ़ रही है। इसने अपना रक्षा बजट बढ़ा दिया है। जापान के आसपास के समुद्र में रूस और चीन संयुक्त अभ्यास कर रहे हैं। इससे जापान पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। जापान को इस बिगड़ते सुरक्षा माहौल से निपटने का तरीका खोजना होगा।

पश्चिम कई समस्याओं का सामना कर रहा है, जिन्होंने उनकी प्रणाली की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। पश्चिमी लोकतंत्र अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं; वैश्विक शासन के संस्थान, जिन्हें बनाने में पश्चिम ने मदद की, वे वैश्विक मुद्दों को हल करने में विफल हो रहे हैं। उनकी आय असमानता बढ़ी है। पश्चिमी देशों ने कोविड संकट के दौरान स्वार्थी व्यवहार किया। इसलिए जब वे किसी दूसरे देशों की आलोचना करते हैं तो वे श्रेष्ठता की भावना से नहीं बोल पाते।

बाइडेन ने यूरोप के साथ संबंध सुधारने की मांग की है, लेकिन समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। चीन पर दोनों पक्षों के विचार नहीं मिलते हैं। चीन यूरोप के साथ अपनी मजबूत आर्थिक और तकनीकी साझेदारी के बावजूद उस पर संदेह करता है। चीनी मूल्य प्रणाली लोकतंत्र और मानवाधिकारों के यूरोपीय मूल्यों के विपरीत है। चीन के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा का यूरोपीय फार्मूला अभी तक आजमाया नहीं गया है। कुछ यूरोपीय देश भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जो चीन के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। 2022 में, यूरोपीय संघ को अपनी चीन नीति में और अधिक स्पष्टता लाना होगा। लेकिन, यह रूस और यूक्रेन संकट से विचलित हो रहा है।

रूस के प्रति पश्चिमी शत्रुता बढ़ रही है। यह रूस को चीन के करीब धकेल रहा है। यूक्रेन पर एक रूसी आक्रमण की आशंका प्रबल हो गई है। अगर स्थिति को बेहतर तरीके से नहीं संभाला गया तो यूक्रेन यूरोप में एक फ्लैशपाइंट बन सकता है। इस संदर्भ में मिन्स्क समझौते बेकार हो गए हैं। रूस और नाटो अपने तनावों को प्रबंधित करने के लिए संवाद के कुछ चैनल खोल सकते हैं। उनको खोलना भी चाहिए। इसलिए भी कि यूक्रेन की स्थिति पर बाइडेन और पुतिन के बीच साल के अंत में टेलीफोन पर हुई बातचीत ने दोनों पक्षों के बीच की चौड़ी खाई को और उजागर करने का काम किया है। उधर, यूरोप में बिजली के दाम आसमान छू रहे हैं। इससे यूरोपीय उपभोक्ता बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। यूरोपीय संघ-रूस संबंधों में ऊर्जा एक प्रमुख कारक बन जाएगी। यूरोप भले ही रूसी गैस पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश करे लेकिन उसके लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा।

रूस यूक्रेन में नाटो के विस्तार एवं यूक्रेन तथा रूस के पड़ोस में हथियारों की तैनाती के खिलाफ पश्चिमी अनुदान मांग रहा है। पश्चिमी देश रूस पर गहरा संदेह करते हैं, इसलिए इन गारंटियों को मिलने की उम्मीद नहीं है। यूक्रेन को नाटो में खींचा जाना रूस को कभी नहीं भाएगा। रूस पश्चिम से सुरक्षा गारंटी की अपनी मांग में चीन से राजनयिक समर्थन की मांग कर रहा है।

पश्चिम एशिया पिछले कुछ वर्षों से एक साथ राजनीतिक एवं आर्थिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है। फिर भी, 2022 में कुछ प्रमुख मुद्दों के जारी रहने की संभावना है। ये मुद्दे हैं-जेसीपीओए, सीरियाई संघर्ष और यमन में युद्ध। लेबनान में अस्थिरता है। इब्राहीम समझौता एक गेम-चेंजर है क्योंकि इज़राइल और खाड़ी देशों के बीच संबंध बढ़ रहे हैं। यूएई और सऊदी अरब दोनों अपनी नीतियों को बदलना जारी रखे हुए हैं।

ईरानी अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों के दौर से गुजर रही है। फिर भी, ईरानियों के परमाणु प्रश्न पर महत्त्वपूर्ण समझौता करने की संभावना नहीं है। पश्चिमी दबाव का मुकाबला करने के लिए ईरान चीन और रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है। यह चलन जारी रहेगा। प्रमुख मुद्दों पर खाड़ी देशों और ईरान के बीच जमी बर्फ के पिघलने का कोई संकेत नहीं है; इजराइल के साथ उनकी दुश्मनी जारी रहने की संभावना है। तुर्की की अर्थव्यवस्था गंभीर तनाव में है, लेकिन इसने उसे इस क्षेत्र में एक सक्रिय पैन-इस्लामिक भूमिका निभाने से नहीं रोका है। तुर्की की क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाओं ने कई देशों को परेशान किया।

दक्षिण एशिया में, श्रीलंका भारी ऋणों से उत्पन्न होने वाली आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है। श्रीलंका के लिए इससे बचने का कोई आसान रास्ता नहीं है। वहां के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सरकार को चीन और भारत के बीच अपने संबंधों को संतुलित करने के कार्य का सामना करना पड़ रहा है। संकट के समय सरकार मदद के लिए भारत की ओर देख सकती है।

बांग्लादेश आर्थिक रूप से अच्छा कर रहा है लेकिन दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यापक हमलों ने अल्पसंख्यकों की दुर्दशा को एक बार फिर उजागर किया है।

नेपाल ने बीते वर्ष के दौरान काफी राजनीतिक अनिश्चितताएं देखी है। ओली ने भारत विरोधी राष्ट्रवादी ताकतों को बाहर कर दिया था जिन्होंने भारत के साथ संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला था। राहत की बात है कि देउबा सरकार के आने से भारत के साथ नेपाल के संबंध स्थिर हुए हैं।

म्यांमार में सेना का दमन बढ़ा है। देश में चीन का काफी प्रभाव है। पूर्वोत्तर में हमलों के मद्देनजर भारतीय विदेश सचिव की म्यांमार यात्रा ने देश के साथ अपने संबंधों के प्रबंधन में भारत के सामने आने वाली जटिल चुनौतियों को उजागर किया है।

तालिबान अफगानिस्तान में अपने शासन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि अभी तक किसी भी देश ने अफगानिस्तान की तालिबानी हुकूमत को मान्यता नहीं दी है, लेकिन चीन, पाकिस्तान, कतर और तुर्की समेत कई देश तालिबान शासन को सामान्य बनाने में मदद कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र भी अफगानिस्तान में मानवीय संकट से निपटने के लिए तालिबानी सरकार को 6 अरब डॉलर की सहायता दी है। अमेरिका अफगानिस्तान को मानवीय सहायता देने पर भी विचार कर रहा है। हालांकि तालिबान का मूल स्वरूप नहीं बदला है, लेकिन वे पूरी लगन से अपने राजनयिक कार्ड खेल रहे हैं। आने वाले वर्ष में तालिबान के अधिक मुख्यधारा में आने की उम्मीद की जा सकती है।

निकट भविष्य में पाकिस्तान के और अधिक अस्थिर होने की ही संभावना जताई जा रही है। कर्ज में डूबी इसकी अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर दबाव में है। महंगाई दहाई अंक में फैली हुई है और रुपया कमजोर बना ही हुआ है। पाकिस्तान को बाहरी फंड की सख्त जरूरत है। यह FATF की ग्रे लिस्ट में बना हुआ है। सेना के साथ प्रधानमंत्री इमरान खान के संबंधों में खटास आ गई है। धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें फिर से बढ़ रही हैं। तहरिक-ए-तालिबान (टीटीपी) एक बार पाकिस्तानी शासन के खिलाफ सिर उठा रहा है। उनकी सरकार साल भर चलेगी या नहीं, यह सवाल बना हुआ है। चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजनाएं जारी रहेंगी लेकिन उनमें से कई की संख्या पहले से ही कम हो रही है। पाकिस्तान में चीन का प्रभाव बढ़ेगा, भले ही उसे जमीन से कुछ प्रतिक्रिया का सामना करना पड़े। वर्ष 2022 पाकिस्तान के लिए मुश्किल हो सकता है।

भारत

इन भू-राजनीतिक प्रवृत्तियों का भारत की सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत को महान शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता पर बातचीत करने के लिए अपना रास्ता खोजना होगा, जिस पर उसका बहुत कम अख्तियार है।

चीन 2020 से ही भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। भारत के प्रति चीन की शत्रुता सीमाओं पर प्रकट होती रहेगी। सैन्य और राजनीतिक स्तर की वार्ता जारी रहने के बावजूद सीमाओं पर तनाव जारी रहने की संभावना है। नए घर्षण बिंदु उभर सकते हैं। चीन ने सीमा की पूरी लंबाई के साथ कई शोकेस गांव बनाए हैं। इसने भूटान और नेपाल के क्षेत्र में भी अतिक्रमण किया है। ये सारे चिंताजनक रुझान ही हैं।

चीन क्वाड में भारत की भागीदारी और पश्चिमी देशों के साथ उसके बढ़ते सुरक्षा संबंधों के प्रति संवेदनशील है। यह भारत को पश्चिम से दूर करना चाहेगा लेकिन भारत के साथ इसकी विश्वसनीयता बहुत कम है। क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीतिक-सैन्य प्रवृत्तियों की पृष्ठभूमि में भारत-चीन तनाव के सामने आने की संभावना है।

पाकिस्तान भारत से गहरा दुश्मनी रखता है। यह कश्मीर में आतंकवाद और कट्टरपंथ का समर्थन करके भारत को अस्थिर करने के अपने प्रयासों के साथ जारी है। हाल ही में, इसने पाकिस्तान, कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों में स्थित कट्टरपंथी खालिस्तानी तत्वों को फिर से सक्रिय करना शुरू कर दिया है।

अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी, आतंकवाद और कट्टरपंथ को उसके बढ़ावा देने के कारण भारत के लिए गंभीर समस्या है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान और चीनी प्रभाव भारतीय प्रभाव की कीमत पर होगा। अफगानिस्तान में भारत की पहुंच समाप्त हो गई है। भारत ने अफगानिस्तान पर विशेष रूप से मध्य एशिया और रूस के साथ विभिन्न क्षेत्रीय वार्ताओं में शामिल होकर स्थिति से निपटने का प्रयास किया है। भारत को अफगानिस्तान से निकलने वाले नशीले पदार्थों और उसके खतरे से सावधान रहना होगा।

भारत के पड़ोस में चीन की पैठ भारत के लिए गहरी चिंता का विषय है। भारत ने हाल के दिनों में कुछ सफलता के साथ पड़ोसी देशों से जुड़ने के लिए कई कदम उठाए हैं। पड़ोसियों से संपर्क बेहतर हुआ है। हालांकि पड़ोसी देश चीन-भारत प्रतियोगिता को लेकर सतर्क हैं। भारत को परिमाण के कई अनुक्रमों द्वारा क्षेत्रीय जुड़ाव और सहयोग में सुधार के लिए एक रास्ता खोजने की आवश्यकता होगी।

भारत के लिए एक ओर पश्चिम और दूसरी ओर रूस-चीन के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखना कठिन कार्य होगा। स्पेक्ट्रम के विपरीत छोर पर 2022 में विभिन्न देशों के साथ बहु-संबद्धता के इस दृष्टिकोण के जारी रहने की संभावना है।

2022 में भारत को महामारी को नेविगेट करना होगा, हरित ऊर्जा में ऊर्जा संक्रमण का प्रबंधन करना होगा, नई तकनीकों को आत्मसात करना होगा, अपने सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण करना होगा और महामारी के बाद अपनी आर्थिक ताकत हासिल करनी होगी।

भारत के पास कई अवसर हैं,जिनका वह लाभ उठा सकता है। इसकी अर्थव्यवस्था सुधार की राह पर है, इसकी कूटनीतिक भागीदारी और गहरी हुई है, जबकि दुनिया में काफी अशांति का अनुभव होने की संभावना है। 2022 में भारत के पास खुद को एक लाभप्रद स्थिति में स्थापित करने के अवसर हैं। लेकिन इसके लिए निरंतर आर्थिक सुधार, सक्रिय राजनयिक जुड़ाव बनाने और घर में सामाजिक स्थिरता लाने की आवश्यकता होगी।


Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)
Image Source: https://www.outlookindia.com/outlookmoney/resizer.php?src=https://www.outlookindia.com/outlookmoney/public/uploads/article/gallery/5c7624d66ee4e625081f59935bc711e1.jpg&w=650

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