"नए युग" में चीन का गहन रूपांतरण
Lt Gen (Dr) Rakesh Sharma (Retd.), Distinguished Fellow, VIF

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने 22 सितंबर 2021 को एक हैरतअंगेज वक्तव्य दिया, जिसके मुताबिक "...गलवान की घटना इसलिए हुई क्योंकि भारत ने पूर्व में किए गए सभी हस्ताक्षरित समझौतों और संधियों का उल्लंघन किया। उसने चीनी क्षेत्र का अतिक्रमण किया, और अवैध तरीके सीमा रेखा को पार किया।” चीन के इस आरोप का भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बेहद सटीक जवाब दिया कि 2020 में की गई चीन की सारी खुराफातें जानबूझकर, सुनियोजित, एवं पूर्वनियोजित थी। अक्साई चिन में सेना के दो डिवीजनों को लामबंद करना और उन्हें वहां तैनात रखना, पूर्वी लद्दाख में कई स्थलों पर घुसपैठ करना और पूर्व की यथास्थिति में लौटने से इनकार करना शामिल था। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) इसी तरह 1962 में भी आक्रामक थी, जिस युद्ध को चीन ने "चीन-भारत सीमा पर आत्मरक्षा में किया गया जवाबी हमला" करार दिया था। इस तरह के टकरावपूर्ण रवैये और आक्रामकता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में, चीन आज भारत को ही सभी समझौतों का उल्लंघन करने का दोष मंढ रहा है। उल्टा चोर कोतवाल को डांटे! चीन में जो कुछ भी होता है या उसकी तरफ से जो कुछ भी कहा जाता है, वह अचानक, तात्कालिक या बिना सोचे-समझे नहीं होता है! चीनी प्रवक्ता ने यह बयान उस समय दिया था, जब वाशिंगटन डीसी में क्वाड शिखर सम्मेलन हो रहा था। इससे चीन की गंभीर चिंता और सरोकार झलकती है।

चीनी विशेषताओं वाला समाजवाद बीती सदी के आठवें दशक से ही उसकी नीतियों की एक पहचान रहा है, जिसने अपने देश में पूंजीवादी व्यवस्था की शुरुआत की थी। तब देंग शियाओपिंग ने जो कहा था, वह आज भी बहुत प्रसिद्ध है, "...इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बिल्ली काली है या सफेद, जब तक कि वह चूहों को पकड़ती है।"

हालांकि, यह कहना यहां प्रासंगिक है कि अक्टूबर 2017 में पार्टी की 19वीं कांग्रेस के सफल आयोजन के बाद से चीन में गहरा बदलाव देखा जा रहा है। इस आयोजन में ही चीन की चली आ रही नीति को इस नए युग में 'चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद' में बदलने की घोषणा की गई थी। यह 'नया युग' और“19वीं सीपीसी राष्ट्रीय कांग्रेस की भावना' का विचार क्या था"? इसने चीनी विशेषताओं के साथ समाजवाद के पालन और उसके विकास, मार्क्सवादी-लेनिनवादी दृष्टिकोण और तरीकों के नवीनीकरण का आह्वान किया। चीन में आर्थिक विकास और सामाजिक विकास, समाजवादी संस्कृति के पुनरुद्धार, विकास और सामान्य समृद्धि की नई अवधारणाओं, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और राष्ट्रवाद को मजबूत करने के गहन प्रयासों के बीच संतुलन बनाने पर गहरा जोर दिया गया है। इसलिए चीन में हो रहे इन परिवर्तनों पर इस नजरिए से विचार करने की आवश्यकता है कि वे भारत पर किस तरह के प्रभाव डालेंगे?

घरेलू राजनीतिक विशेषताओं के साथ, सीसीपी अपने सभी विपक्षियों या असंतुष्टों को भ्रष्टाचार की छतरी के नीचे शुद्धिकरण करने और कथित अपराधियों को निर्दयता से दंडित करने वाले नेतृत्व की तरफ बढ़ रही है। शुद्धिकरण के इस संदर्भ में किंग राजवंश के बारह कुलीनों जिन्हें उच्च पदस्थ 'आयरन हैट प्रिंसेस' के समान माना जाता था, को भी शामिल किया जा सकता है, जिन्होंने व्यक्तिगत लालच और हितों के चलते राजनीतिक सुधार का विरोध किया था। 2012 से लेकर 2019 के बीच 7 जनरल, 19 लेफ्टिनेंट जनरल और 55 मेजर जनरल के खिलाफ जांच की गई और उन्हें दंडित किया गया था। इस साल की शुरुआत में, सीसीपी ने लंबे समय से अपेक्षित अपने नेताओं के भ्रष्टाचार से शुद्धिकरण के अभियान की शुरुआत की घोषणा की थी, जिसमें भ्रष्टचारी एवं पार्टी व उसके नेता शी जिनपिंग के प्रति कम वफादार लोगों के खिलाफ "चाकू के ब्लेड को भीतर की ओर मोड़ना" शामिल होगा। इसमें पदानुक्रम और सीसीपी के प्रति निष्ठाहीनता हमेशा से कोई माफी नहीं थी; यह अब एक दूसरे ही उच्च स्तर पर पहुंच गयी है।

जैसा कि हम वर्तमान की ओर रुख करते हैं तो 'विकास की नई अवधारणा', 'दोहरी परिसंचरित अर्थव्यवस्था' और 'सामान्य समृद्धि' में एक सघन समाजवाद की तरफ जाता हुआ बदलाव साफ-साफ दिखाई देता है, जैसा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 17 अगस्त 2021 को सीसीपी की वित्तीय और आर्थिक मामलों की समिति को संबोधित करते हुए कहा था। इनका एक उप-पाठ्य, जो घरेलू अर्थव्यवस्था और कचौड़ी के समान वितरण की तरफ उन्मुख है। वर्तमान में समाजवाद और मार्क्सवाद पर यह बढ़ा हुआ जोर घरेलू आबादी को लक्षित करने तथा उसके बीच समान आय वितरण की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप के लिए है।

इस मुहिम को अब अलीबाबा, टेनसेंट और दीदी जैसे प्रौद्योगिकी कॉरपोरेशन के खिलाफ की गई कड़ी कार्रवाइयों और गहन नियामक उपायों से आसानी से जोड़ा जा सकता है। माना जाता है कि फरवरी 2021 के बाद से प्रौद्योगिकी शेयरों में $1 ट्रिलियन का नुकसान हुआ है। एवरग्रांडे रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन पर $300 अरबों का कर्ज है, ऐसा लगता है, कि इसे घरेलू या विश्व स्तर पर होने वाले असर से बेपरवाह होने दिया जा रहा है। ऐसा मालूम होता है कि चीनी सरकार निजी क्षेत्र का दम घोंट देने की इजाजत दे रही है, जबकि ये वही क्षेत्र है, जिसने इसके सकल घरेलू उत्पाद में 60 फीसदी का योगदान दिया है! यह स्पष्ट है कि चीनी नेतृत्व, बड़े पैमाने पर राज्य नियंत्रित मीडिया के माध्यम से, सार्वजनिक रूप से प्रसारित करने की अनुमति दे रहा है, क्योंकि इस तरह की सूचनाओं से चीनी कुलीन वर्गों का पतन होता है और सामाजिक समानता को बल मिलता है। इसलिए ही जब 12 सितम्बर 2021 को एवरग्रांडे शेनझेन बिल्डिंग के बाहर दंगा पुलिस की तैनाती की गई थी तो उसका नजारा देखने पर जनता पर कोई रोक नहीं लगाई गई थी। सरकार चाहती थी कि यह कार्रवाई होते हुए जनता खुद देखे! आम जनता के प्रति समाजवादी-विश्वास व्यक्त करने के लिए नियमनों को कड़ा किया गया है और ऐसा करते हुए विदेशी पूंजी को जरूरी नहीं माना गया है। चीन के पूंजीपतियों, जिन्होंने राष्ट्र को विभिन्न क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत ऊंचे मकाम पर पहुंचाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, वे इस 'नए युग' में चीनी सरकार को मान्य नहीं हैं, उन्हें सीसीपी के पदानुक्रम या समाजवाद और समानता की बड़ी अवधारणा को चुनौती देने वाला माना जाता है!

समाजवादी संस्कृति के पुनरोद्धार के साथ एक नई वृद्धिशील सांस्कृतिक क्रांति भी प्रगति पर अग्रसर है। 'अश्लील सौंदर्यशास्त्र' पर कड़े प्रहार करते हुए, ऐसे शो को प्रतिबंधित कर दिया गया है, जो पुरुषों को स्त्रैण रूप में दिखाते हैं, जो कम नैतिक मूल्यों वाले और अस्वास्थ्यकर सामग्री परोसते हैं। इसी तरह, युवाओं के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय होने और यहां खेल खेलने या वीडियो गेम्स के लिए हफ्ते में तीन घंटे का समय तय कर दिया गया है। शिक्षा पर ध्यान देने के साथ, स्पष्ट रूप से समाज के सांस्कृतिक मूल्यों को नया रूप गढ़ने और असंतोष को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। स्पष्ट रूप से जनसांख्यिकीय चुनौतियों और कम प्रजनन दर के उप-संदर्भ के रूप में विचाराधारा को कठोरता के साथ देश में लागू किया जा रहा
है।

चीन की भू-राजनीतिक महत्त्वकांक्षाएं भौगोलिक सीमाओं के पार जाती हैं। इस सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन और जनमत को ढालने के हिस्से के रूप में, राष्ट्रवाद का सम्मान करना अनिवार्य है। चीन ने दो चीन सागरों, ताइवान और लद्दाख में और दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के खिलाफ विद्रोही, आधिपत्यवादी एवं विस्तारवादी मंसूबों का इजहार किया है, जिन्होंने आंतरिक स्तर पर एक जुनून पैदा किया है। समय के साथ, चीन ने दक्षिण चीन सागर में सैन्य शक्ति संतुलन को बदलने के लिए बहुत सोच-विचार कर एक जोखिम उठाया है। फिर भी, अमेरिका और संबद्ध देशों की सेनाएं चीन के घोषित विशेष आर्थिक क्षेत्रों (ईईजेड) में धड़ल्ले से नौवहन जारी रखती हैं और दक्षिण चीन सागर में चीन के गलत दावों को मान्यता नहीं दे रही हैं। यह गतिविधियां चीन के अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र के भीतर तमाम सैन्य गतिविधियों पर नियंत्रण करने का भरसक प्रयास के बावजूद हो रही हैं। ताइवान के क्षेत्र और सेनकाकू द्वीप समूह में चीन के बार-बार घुसपैठ करने से सैन्य टकराव का खतरा बढ़ गया है। एक ओर, चीन के अमेरिका के साथ संबंधों में गिरावट आई है, व्यापार में व्यवधान जारी है और दूसरी तरफ कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर भी चीन पर दोषारोपण किया गया है।

भू-राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण उद्यम के तहत, बीआरआइ के अंतर्गत चीन के विशाल बुनियादी ढांचे के निवेश को वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए व्यापार और विकास में लाने का लक्ष्य रखा गया था। इस चीनी-वित्त पोषित बुनियादी ढांचे के विकास की कड़ी लागत और राजनीतिक प्रभाव ने प्राप्तकर्ता देशों को कर्ज के बोझ से दबा दिया है। जाहिर तौर पर कई परियोजनाओं की लागत आसमान छू गई है, निविदा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी है और तिस पर परियोजनाओं में चीनी निगमों/फर्मों, प्रबंधकों, पर्यवेक्षकों और श्रमिकों के अनिवार्य उपयोग की शर्ते के चलते कई देशों में आंतरिक विरोध उठ खड़ा हुआ है, वहां तीखी राजनीतिक झड़पें हुईं हैं और इन सबके चलते अनुबंध तक रद्द करना पड़ा है। चीन का बड़ी संख्या में देशों के साथ व्यापक कारोबारी संबंध हैं, हालांकि पाकिस्तान एक निकटस्थ ग्राहक-राज्य के रूप में है, लेकिन उसके साथ चीन का कोई व्यापक गठबंधन नहीं है। इसके अलावा, चीन में उइगरों, मंगोलों (इनर मंगोलिया में) और तिब्बतियों, और हांगकांग में दमन और मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, ये मसले चीन में सदा केंद्रीय स्तर पर बने रहते हैं।

महत्त्वपूर्ण बात यह कि विश्व स्तर पर आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति के रूप में रूप से चीन के निरंतर उदय की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हालांकि, यह तर्क कि"चीन एक पतनशील शक्ति है-और यही समस्या है: संयुक्त राज्य अमेरिका को एक बड़े युद्ध के लिए तैयार होने की आवश्यकता है, इसलिए नहीं कि उसके प्रतिद्वंद्वी का अभ्युदय हो रहा है, बल्कि इसके विपरीत (उसका पतन हो रहा) है" (फॉरेन पॉलिसी 24 सितंबर 2021), बाध्यकारी है और यह गंभीरता से विचार करने योग्य है। यदि चीन बहुत जल्दी शिखर पर पहुंच जाता है, और अपने राष्ट्रीय कायाकल्प के सुप्रचारित महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों को तय समयसीमा (2027, 2035 और 2047) तक पाने में असमर्थ रहता है, तो वहां आंतरिक और बाहरी तनाव उत्पन्न होगा, जिनके परिणाम अप्रत्याशित होंगे।

इस वास्तविक राजनीति को ध्यान में रखते हुए, भारत में बयानबाजी, भावावेश और भावुकतावाद को त्यागने की जरूरत है। इस संदर्भ में तीन महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य विचार हैं:

  • पहला, भारत-अमेरिका संबंधों में स्पष्ट गर्मजोशी, जिस तरह से क्वाड ने खुद को गढ़ा है, और इसकी धुरी एवं इसके दायरे में दक्षिण-पूर्व एशिया के राष्ट्रों को लाए जाने के प्रस्ताव को लेकर चीन गंभीर रूप से चिंतित है। चीन के साथ भारत के संबंध या क्वाड का हिस्सा होना भारत-अमेरिका संबंधों का कार्य-व्यापार नहीं है। भारत स्पष्ट रूप से अपने राष्ट्रीय हितों और उद्देश्यों के अनुसरण में सामरिक स्वायत्तता बरकरार रखता है, जैसे रूस या फ्रांस के साथ ब्रिक्स या एससीओ जैसे संगठनों के हिस्से के रूप में, या चीन के साथ जारी व्यापार और आर्थिक संवाद जारी रखे हुए है।
  • पूर्वी लद्दाख में वर्ष 2020 में घुसपैठ के लिए चीन ने भारत पर नया दोषारोपण किया, जिसके कारण गलवान घाटी में 15 जून 2020 को गंभीर घटना हुई, उसे अवश्य ही चीन के स्थायी रूप से लड़ाकू रवैये के रूप में लिया जाना चाहिए। गलवान घाटी की घटना सामरिक मुद्दा था, लेकिन यह कोई छोटी घटना नहीं थी, वास्तव में इसके सामरिक और वैश्विक प्रभाव थे। भारत-चीन सीमा विवादित है, और दोनों देशों के रिश्ते के अन्य पहलुओं के साथ आगे बढ़ने के लिए इस सीमा विवाद का समाधान अनिवार्य है। भारत के लिए, क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखना उसकी एक प्रमुख जिम्मेदारी है, और विवाद का औपचारिक समाधान किए बिना अर्थव्यवस्था जैसे संबंधों पर प्रगति समस्याग्रस्त रहेगी। चीन द्वारा सीमा के मसले को एक क्षेत्रीय मुद्दे के रूप में रखने की बजाए राष्ट्रीय संप्रभुता का मुद्दा बनाना दरअसल उसका राष्ट्रवाद की दिशा में बढ़ने का एक प्रयास है। भारत दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला एक बड़ा देश है, उत्तर में हिमालय, लंबी समुद्री सीमा और सक्षम, आधुनिक सेना। इसलिए, चीनी की समग्र ताकत के बारे में गलत आकलन या चेतावनी उसके लक्ष्य पाने की दिशा में बाधक ही हैं।
  • भारत राष्ट्रीय मुद्दों और अपने लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है, और किसी भी रूप में युद्ध को पसंद नहीं करता है, क्योंकि इसके दोनों देशों, और दक्षिण एशियाई के साथ ही इसके वैश्विक स्तर पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव होंगे। फिर भी, वह यह ऐसी घटनाओं से निपटने की तैयारी जारी रखना चाहिए। भारत को अपने भूभाग या समुद्री क्षेत्र या तकनीकी सीमाओं के साथ छेड़छाड़ की किसी भी विरोधी की कोशिश का मुकाबला करना चाहिए।

चीन प्रत्यक्ष रूप से राज्य नियंत्रित मीडिया के माध्यम से या प्रचारक पॉप-अप के माध्यम से जानबूझकर गढी गई सूचनाओं के आधार पर जनमत बनाने और सांस्कृतिक परिवर्तन को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। एक अन्य महत्वपूर्ण उप-पाठ यह है कि नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने मार्च 2018 में राष्ट्रपति पद के लिए तय दो-अवधि की सीमा (जो 1990 से लागू थी) को हटाने की अपनी मंजूरी दे दी थी, जो व्यावहारिक रूप से राष्ट्रपति शी जिनपिंग को जीवन भर सत्ता में बने रहने की अनुमति देना है। राष्ट्रपति शी का दो कार्यकाल 2022 में समाप्त होना है। उसी साल के अक्टूबर/नवंबर में होने वाली 20वीं पार्टी कांग्रेस में इसका अनुमोदन कराना होगा, जिसके लिए जनता और सीसीपी की राय सुनिश्चित करनी होगी। यदि रास्ता सही हो तो निकट भविष्य का पूर्वानुमान लगाना और आकलन करना सही हो सकता है, इस आधार पर लगता है कि 20वी पार्टी कांग्रेस राष्ट्रपति शी के कार्यकाल को अगले 10 साल तक बढ़ाने पर अपनी मुहर लगा सकती है।या अन्यथा, अपरिहार्यता साबित करने के लिए एकल प्रयास शुरू किए जा सकते हैं!

संक्षेप में, भारत और चीन दोनों ही परिपक्व एवं प्राचीन सभ्यता की विरासत वाले देश हैं। भारत के लिए जिस तरह शांति और अमन चैन अनिवार्य है, वैसे ही चीन के लिए भी। भारत ने भी अनंत धैर्य और शांति के प्रति अपनी दीर्घकालिक इच्छा दिखाई है। एक सीमा में अनुबंध और सीबीएम कार्य कर सकते हैं; जिसके बाद वे इसके प्रोटोकॉल के दायरे से बाहर अपना रुख ले सकती हैं। चूंकि दोनों ताकतों के बीच परस्पर विश्वास की कमी है, इसलिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोनों तरफ किसी स्थिति में एक जैसी या विपरीत प्रतिक्रिया हो सकती है। घटनाओं का अपना एक जीवन होता है और इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है कि अगली घटनाएं नियंत्रण से बाहर नहीं चली जाएंगी और एक फिर एक अंतर्राष्ट्रीय घटना बन जाएंगी और यहां तक कि उसमें वृद्धि हो जाएगी। इसलिए इसे हर कीमत पर टाला जाना चाहिए, और परिसीमन-डी-एस्केलेशन प्रक्रिया को एक त्वरित आवश्यकता के रूप में आगे बढ़ना चाहिए। सीमा के मुद्दे को आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ते जाने की प्रवृत्ति से ही कई पीढ़ियों का विकास रुक गया है, और यह अच्छा नहीं है! हमें एक शुरुआत करने, सीमा और एलएसी पर बातचीत की प्रक्रिया और तौर-तरीके तय करने, और विश्वास बहाली की कोशिश शुरू करने की जरूरत है। इसका सबसे अच्छा समाधान है कि हम जो कर सकते हैं, उसे करें। ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां बातचीत शुरू हो सकती है। विश्वास को फिर से बनाना होगा, और निश्चित रूप से इसमें बहुत समय और प्रयास लगेगा। हमें अपने लोगों की भलाई के लिए शुरुआत करनी होगी। गति ही विश्वास उत्पन्न करेगी। जैसा कि वॉल्ट डिज़नी कंपनी के बॉब इगर ने एक बार टिप्पणी की थी, "...सबसे जोखिम भरा काम जो हम कर सकते हैं, वह है यथास्थिति बनाए रखना।"

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>


Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)
Image Source: https://cp.cgtn.com/

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