इमरान खान की यात्रा के बाद अमेरिका-पाकिस्तान संबंध
Husain Haqqani

मीडिया की गहमागहमी और घर में मिली सराहना को किनारे रख दें तो इमरान खान की अमेरिका यात्रा से पाकिस्तान की बुनियादी चुनौतियां बिल्कुल नहीं बदली हैं; उसका ख़ज़ाना ख़स्ता ही है और अर्थव्यवस्था अब भी ठहरी हुई है, देश अब तक संयुक्त राष्ट्र फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे सूची में है और समाज पर सेना का दबदबा - और उसकी वजह से आई कमज़ोरी - बदस्तूर कायम है।

इमरान खान यह मानकर खुश हो सकते हैं कि ट्रंप के साथ उनकी मुलाकात अच्छी रही बल्कि पाकिस्तानी खुशखबरी का जिस बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे, उसे देखते हुए बहुत अच्छी रही। खान तालियों और इन दावों के बीच घर लौटे कि वह अलग-थलग पड़े पाकिस्तान को मुख्यधारा में वापस लाने, अफगानिस्तान में शांति प्रयासों में केंद्रीय भूमिका सुनिश्चित करने और कश्मीर के मसले पर ट्रंप की दिलचस्पी जगाने में कामयाब रहे। व्हाइट हाउस में मुलाकात अच्छी रही, लेकिन इस बात की संभावना न के बराबर है कि अमेरिका अपनी मुट्ठी खोलकर जल्द ही पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देना शुरू कर देगा। खान की यात्रा खोखली ही थी। हां, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख का आतंकवाद के खिलाफ सहयोग के वायदे के साथ व्हाइट हाउस पहुंचना प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था।

अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान ने तालिबान को संघर्ष विराम के लिए और काबुल सरकार के साथ बातचीत के लिए राजी करने की पेशकश रखी, जिसे पूरा करना आसान नहीं है। इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) कहता रहा है कि तालिबान के साथ उसके रिश्ते हैं, लेकिन उन पर उसका नियंत्रण नहीं है। अगर वह तालिबान को अमेरिका की मर्जी के हिसाब से चलने के लिए राजी कर लेता है तो तालिबान पर नियंत्रण नहीं होने का उसका दावा हवा में उड़ जाएगा। यदि तालिबान लंबे अरसे तक राजी नहीं होते हैं तो ट्रंप की टीम का रुख बदल सकता है।

इसमें कोई शक नहीं कि इमरान को बैठक का न्योता देकर ट्रंप 1 जनवरी, 2018 को नए साल पर किए ट्वीट से बहुत आगे बढ़ चुके हैं। उस समय उन्होंने कहा था, “अमेरिका ने बेवकूफी करते हुए पिछले 15 साल में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर से ज्यादा की मदद दे दी है और बदले में उसने हमारे नेताओं को मूर्ख मानते हुए हमें झूठ और धोखे के अलावा कुछ नहीं दिया है। हम अफगानिस्तान में जिन आतंकवादियों के पीछे पड़े हैं, उन्हें उसने सुरक्षित पनाह दे दखी है। अब ऐसा नहीं चलेगा!”

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने पाकिस्तान को हुए फायदे गिनाते हुए कहा। “हम अलग-थलग पड़े थे, अब हमें बुलाया गया है।” पाकिस्तान के लिए यह न्योता ही “दोनों पक्षों के बीच रिश्तों की अहमियत का सबूत है।” इस बैठक में अमेरिका की दिलचस्पी इतनी ही थी कि अफगानिस्तान में तालिबान के साथ समझौता करने में पाकिस्तान के आईएसआई की मदद मिले। लेकिन पाकिस्तान तालिबान के साथ अमेरिका की सीधी बातचीत तो करा सकता है मगर यदि तालिबान संघर्ष विराम के लिए तैयार नहीं हुए और अफगान सरकार के साथ बातचीत से इनकार कर दिया तो वह तालिबान को पनाह देना बंद करेगा, इसकी संभावना कम ही है। ट्रंप अमेरिका की जीत चाहते हैं, लेकिन कथित अफगान शांति वार्ता आखिर में तालिबान की जीत का ही रास्ता लग रही है।

अगर पाकिस्तान किसी तरह अफगानिस्तान के बारे में अमेरिका के अरमान पूरे कर भी देता है तो अंत में उसे मायूसी मिलने की ही संभावना है। अफगानिस्तान की शांति वार्ता ने पाकिस्तान को कुछ समय के लिए तो फायदा दे दिया है। लीेकिन जब अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकल जाएगा तो ट्रंप के लिए पाकिस्तान की अहमियत खत्म हो जाएगी।

ट्रंप कारोबारी की तरह सोचते हैं विचारक और विद्वान की तरह नहीं। उनके लिए अर्थशास्त्र मायने रखता है। वस्तु एवं सेवा में भारत के साथ पिछले साल अमेरिका का 182 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय व्याार 6.6 अरब डॉलर ही था तो भारत वाले आंकड़े के सामने कतरा भर ही था। अफगान शांति वार्ता में आगे बढ़ने के लिए इमरान खान और जनरल बाजवा की खुशामद करना अलग बात है। इस बात की संभावना नहीं है कि भारत के विशाल बाजार को देखने के बाद भी ट्रंप दक्षिण एशिया में अपनी प्राथमिकताएं बदलेंगे।

पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान से अमेरिकी बातचीत में मदद के बदले अमेरिका भारत के ऊपर कश्मीर मसले पर नए सिरे से बातचीत का दबाव डाले। मगर यह अमेरिका की हैसियत से ऊपर की बात है। कश्मीर पर अमेरिकी मध्यस्थता के बारे में ट्रंप की टिप्पणी के घंटे भर के भीतर ही भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत अपने इस रुख से नहीं टलेगा कि भारत-पाकिस्तान समस्या का समाधान द्विपक्षीय तरीके से ही होगा। अमेरिकी विदेश विभाग उसके बाद से मध्यस्थता पर अपनी टिप्पणी से पीछे हट चुका है और उसने भारत तथा पाकिस्तान को आपस में बातचीत करने देने की अमेरिकी नीति दोहराई है। अमेरिका भारत से पाकिस्तान के साथ वार्ता बहाल करने के लिए कह सकता है, लेकिन भारत तब तक इससे इनकार कर सकता है, जब तक पाकिस्तान से काम करने वाले जिहादी संगठनों के बारे में उसकी शिकायतें दूर नहीं की जातीं।

व्हाइट हाउस में हालिया बैठक से जिहादी आतंकी संगठनों की मदद करने का पाकिस्तान का रणनीतिक समीकरण बदले के आसार भी नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने 1992 में विदेश मंत्री जेम्स बेकर के जरिये पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक देश घोषित करने की धमकी दी थी, लेकिन पाकिस्तान ने उसे नजरअंदाज कर दिया। 11 सितंबर के बाद अमेरिकी नेताओं के साथ किए वायदे भी पाकिस्तान ने तोड़े। इसीलिए पाकिस्तान की सेना व्हाइट हाउस में एक सफल बैठक की वजह से दुनिया के बारे में अपना नजरिया बदलने नहीं जा रही।

अमेरिका ने अफगानिस्तान में बातचीत के लिए पाकिस्तान की मदद मांगी है, लेकिन एशिया प्रशांत पर और चीन से खतरे पर अपना रणनीतिक ध्यान हटाने के लिए वह तैयार नहीं होगा। चीन के साथ पींगें बढ़ा रहा पाकिस्तान अफगानिस्तान में उपयोगी या प्रासंगिक नहीं रह गया है तो वह अमेरिका के नीति निर्माताओं के लिए भी काम का नहीं रह जाएगा।

(वॉशिंगटन डीसी में हडसन इंस्टी्टयूट में दक्षिण एवं मध्य एशिया के निदेशक हुसैन हक़्क़ानी 2008 से 2011 तक अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत थे। उन्होंने ‘पाकिस्तान बिटवीन मॉस्क एंड मिलिटरी’, ‘इंडिया वर्सस पाकिस्तानः व्हाई काण्ट वी बी फ्रेंड्स’ और ‘रीइमेजिनिंग पाकिस्तान’ पुस्तकें लिखी हैं)

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>


Translated by Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
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