कश्मीर में टकराव की स्थिति टालने के लिए शांति का विचार समझना जरूरी
Brig Narender Kumar
कश्मीर में शांति का विरोधाभास

जर्मनी के चांसलर विली ब्रांट ने कहा था, “शांति ही सब कुछ नहीं है, लेकिन शांति के बगैर कुछ भी नहीं है।”1 कश्मीर वैसी ही स्थिति से गुजर रहा है, जहां शांति नहीं होने के कारण सामाजिक मूल्य गुम हो गए हैं और बच्चों पर माता-पिता का नियंत्रण खत्म हो गया है। शिक्षण संस्थाएं और धार्मिक स्थल कट्टरपंथ के केंद्र बन चुके हैं, जिससे राज्य के नागरिकों में नाखुशी बढ़ती जा रही है। आग में घी झोंकने का काम प्रशासनिक संस्थाएं कर रही हैं, जो शांति बहाली के काम में अप्रासंगिक और अप्रभावी होती जा रही हैं।

मौजूदा माहौल में कश्मीरियत की जगह असहिष्णुता ने ले ली है और सामंजस्य तथा मेल-मिलाप की गुंजाइश कम हो गई है। आतंकवाद, नशे की तस्करी और पत्थरबाजी भी जीवन शैली बन चुकी है। कश्मीर में कुछ युवा खुलेआम कहते हैं कि पत्थरबाजी इस पीढ़ी की रोजी-रोटी है, जिससे उन्हें आर्थिक फायदा होता है। विडंबना है कि यह बात जिहादी तकरीरों के एकदम अनुकूल है। 15वीं शताब्दी के समाजशास्त्री डेसिडेरियस इरेस्मस अडाजियो ने कहा था, “नुकसान करने वाली शांति भी युद्ध से बेहतर होती है।” शांति और विकास एक दूसरे पर निर्भर हैं और शांति के बगैर टिकाऊ विकास तथा टिकाऊ विकास के बगैर शांति नहीं हो सकती।2 यदि राज्य शांति बहाल नहीं कर सकता तो उसकी भूमिका हाशिये पर पहुंच जाती है क्योंकि शांति के जरिये विकास और आर्थिक सशक्तीकरण के बीच निर्भरता खत्म हो जाती है।

ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनका कहना है कि कश्मीर में टकराव सामाजिक-राजनीतिक किस्म का है और सुरक्षा बलों के जरिये इसे सुलझाने का सरकार का प्रयास निरर्थक रणनीति भर है। लेकिन आज यह टकराव सामाजिक-राजनीतिक दायरे से बाहर जा चुका है और अब मामला सीधा नहीं रह गया है। यह एक जंग है, जो कट्टरपंथी विचारधारा, सीमा पार से आतंकवाद, असंतुष्ट युवा, धारणाओं की लड़ाई और विविध राजनीतिक स्वरों के बल पर चल रही है, जिसमें इस बात पर आम सहमति ही नहीं है कि आखिर में स्थिति क्या होगी। इस संघर्ष को जारी रखने के पीछे विचार यह है कि इसे कभी खत्म नहीं होने दिया जाए और भारत को हमेशा चोट पहुंचाई जाए। हसीब द्राबू को लगता है कि 1990 के दशक में जो घटनाएं हुईं, उनमें से अधिकतर “जातीय-राष्ट्रीय आंदोलन” का हिस्सा थीं, लेकिन वर्तमान समस्या की जड़ बिल्कुल अलग है। वह कहते हैं, “आज का टकराव लगभग अराजकता भरा है।3 कश्मीर में पसरे अराजकता भरे माहौल ने जनता तथा राज्य के बीच सामाजिक संबंध को लगभग खत्म कर दिया है। इसके कारण हैं: सामाजिक मूल्यों का क्षरण; कट्टरपंथ और मौजूदा युवा पीढ़ी के ऊपर से माता-पिता का नियंत्रण खत्म होना।”

शांति स्थापित करने और टकराव की स्थिति बदलने की रणनीति को नागरिक समाज का समर्थन चाहिए। यदि सरकार की रणनीति नाकाम हो जाती है तो भी समाज का मजबूत दबाव असंतुष्ट युवाओं और स्वरों पर भारी पड़ सकता है। पूर्वोत्तर में नगा मदर्स ऑर्गनाइजेशन ने विद्रोहियों पर शांति वार्ता में हिस्सा लेने का दबाव बनाया है। नगालैंड में जब भी समाज में हिंसा दोबारा भड़कने का डर हुआ तो ‘फोरम ऑफ रिकंसिलिएशन’ ने शांति बहाली का काम किया है। लेकिन कश्मीर में ऐसा कोई मजबूत संगठन नहीं है, जो सभी पक्षों को बातचीत के लिए इकट्ठा कर सके। जिन्होंने शांति के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश की, उन्हें आतंकवादी संगठनों ने चुप करा दिया। कश्मीर में शांति तभी लौटेगी, जब नागरिक समाज और स्वतंत्र विशेषज्ञों के बीच करीबी सहयोग होगा।4 लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है क्योंकि ऐसा कोई संगठन नहीं है, जो सभी पक्षों को बातचीत के लिए तैयार कर सके। इस विरोधाभासी स्थिति से बाहर निकलने का कोई उपाय यदि नहीं दिख रहा तो उसका बुनियादी कारण है शांति निर्माण के विचार की समझ नहीं होना।

जम्मू-कश्मीर राज्य बार-बार संघर्ष उभरने का खमियाजा भुगतता आया है। अतीत में हिंसा को कम कर संभालने लायक सीमा में लाया गया, लेकिन किसी न किसी वजह से टकराव दोबारा उभर आया। इससे पता चलता है कि राज्य और समाज टकराव को बढ़ने से टालने की क्षमता गंवा चुके हैं तथा इसे झेलने का अब कोई उपाय नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति में राज्य को सुनिश्चित करना होगा कि विरोधी ताकतों को अस्थिरता फैलाने का कोई मौका नहीं दिया जाए।

यह समझने की जरूरत है कि शांति बहाली और टकराव के समाधान के उद्देश्य से आरंभ सभी गतिवधियों को राजनीतिक और सामाजिक हस्तक्षेप के माध्यम गढ़ने होंगे। पहले से सोचे गए तरीके अक्सर आगे चलकर नाकाम साबित होते हैं।5 संघर्ष की स्थिति में सफल परिवर्तन सुरक्षा, सांस्कृतिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में होता है; यह राष्ट्रीय धारणा तथा पारस्परिक धारणाओं में बदलाव लाता है और समाज तथा राज्य के बीच संबंध भी बदलते हैं। इन मुद्दों के लिए शांति स्थापना तथा शांति निर्माण के विचार को व्यापक तरीके से समझने की जरूरत है। ऐसी पहल अलग-थलग तरीके से शुरू नहीं की जा सकतीं। वे सरकार की पहलों का ही हिस्सा होती हैं। लेकिन कश्मीर नीति में संघर्ष के समाधान के लिए सुरक्षा बलों का उपयोग किया गया है और यह वाकई में अच्छा विचार नहीं है। यह संघर्ष समाप्त करने और शांति बहाल करने के विचार के बुनियादी तत्वों को ही नकारता है।

कश्मीर में शांति के विचार की समझ

कश्मीर में कई आयामों और पक्षों वाला जो संघर्ष है, उसमें शांति बहाली का विचार उग्रवाद या दंगों की स्थिति में शांति बहाली से अलग है। यह बेहद बारीक और गंभीर प्रक्रिया है, जिसे नीति निर्माताओं और राजनीतिक नेतृत्व को समझना चाहिए। 1996 के बाद से जब सुरक्षा बल बार-बार कश्मीर में स्थिरता की स्थिति बहाल कर चुके हैं तो शांति बार-बार भंग क्यों हुई है? इसका कारण यह है कि वह ‘थोपी हुई शांति’ थी, जो आम तौर पर अस्थायी ही होती है। थोपी हुई शांति का मतलब हिंसा को दबाना होता है, हिंसा समाप्त करना नहीं। अस्थायी शांति का अधिक से अधिक लाभ उठाने और उस दौरान हिंसा भड़कने से रोकने के लिए राज्य तथा नागरिकों के बीच सामाजिक संबंध बहाल कर अनुकूल स्थितियां तैयार करनी होंगी।

साथ ही शांति निर्माण की क्षमता तैयार करने के लिए राजनीतिक सहभागिता तथा आर्थिक विकास भी शुरू करना होगा। जब कोई राज्य टकराव की स्थिति से बाहर जाए और वहां पर्याप्त शांति हो जाए तो इसका मतलब है कि सभी संस्थाओं ने काम करना शुरू कर दिया है और तब स्थायी शांति बहाल करने के लिए राजनीतिक पहल आरंभ होनी चाहिए। अस्थायी और पर्याप्त शांति के चरणों में किसी तरह का प्रयोग नहीं होना चाहिए क्योंकि ऐसे में टकराव फिर उभरने की संभावना होती है। 2008, 2010, 2014 और 2016 में टकराव फिर उभरा क्योंकि अमरनाथ भूमि विवाद, माचिल फर्जी मुठभेड़ और अनुच्छेद 370 तथा 35ए जैसे भावनात्मक मुद्दे उछाले जाने का बहाना था।

नगालैंड में भी यह कहना मुश्किल है कि शांति टिकी रहेगी या नहीं। वहां अब भी पर्याप्त शांति भर है क्योंकि सशस्त्र गुट अब भी मौजूद हैं और किसी भी कारण से वहां टकराव फिर उत्पन्न हो सकता है। नगालैंड में अच्छी बात यही है कि सामाजिक संगठनों का जनता के ऊपर अच्छा खासा नियंत्रण और प्रभाव है तथा अक्सर उसी के कारण टकराव दोबारा उभर नहीं पाता, जिससे सरकार और असंतुष्ट गुटों के बीच बातचीत जारी रहती है। स्थायी शांति अंतिम चरण है, जब टकराव खत्म हो जाता है और शिकायतें दूर कर दी जाती हैं। लेकिन स्थायी शांति के शुरुआती दौर में भी प्रयोग करने से बचना चाहिए। ऐसा कोई मुद्दा नहीं उठाना चाहिए, जिससे शांति की प्रक्रिया में बाधा पड़ सकती हो। जम्मू-कश्मीर इस समय अनुच्छेद 370 या 35ए पर बहस के लिए तैयार नहीं है और इससे सुरक्षा बलों की अब तक की कमाई हुई बढ़त खत्म हो जाएगी। राजनीतिक नेतृत्व और नीति निर्माताओं को प्रशासन में आमूल-चूल परिवर्तन करने से पहले या लंबे समय से चली आ रही यथास्थिति को बदले का प्रयास करने से पहले इन तीनों चरणों को समझ लेना चाहिए।

कश्मीर जैसे जटिल संघर्ष में जिन गतिविधियों और शांति प्रक्रिया का सुझाव दिया गया है, वे नीचे चित्र में दिखाई गई हैं:

निष्कर्ष

रॉनल्ड रीगन ने कहा था, “टकराव नहीं होने का मतलब शांति नहीं है; टकराव को शांतिपूर्ण तरीकों से संभालने की क्षमता ही शांति है।” सशस्त्र तरीकों या बातचीत के जरिये सशस्त्र संघर्ष खत्म होने के बाद भी हिंसक टकरावों की विरासत बरकरार रह जाती हैं। महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थाओं का कमजोर होना, कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारे में भ्रष्टाचार और हथियारों तथा अपराध का प्रसार जारी रहना ऐसी ही विरासतों में शामिल हैं।

कुल मिलाकर संघर्षों के समाज पर ऐसे नकारात्मक प्रभाव होते हैं, जो लंबे समय तक बने रहते हैं।6 शांति बहाली और संघर्ष की समाप्ति में नागरिक समाज को भी बतौर पक्ष शामिल करना जरूरी है।7 राजनीतिक नेतृत्व और नीति निर्माताओं को शांति का विचार समझने की और संघर्ष को दोबारा उभरने से रोकने के उपाय तैयार करने की जरूरत है।

संदर्भः
  1. फेडरल गवर्नमेंट ऑफ जर्मनी, गाइडलाइंस ऑन प्रिवेंटिंग क्राइसेस, रिजॉल्विंग कनफ्लिक्ट, बिल्डिंग पीस, सितंबर 2017, पृष्ठ 10
  2. यूएन क्रॉनिकल, “द लेगसीज ऑफ आर्म्ड कनफ्लिक्ट ऑन लास्टिंग पीस एंड डेवलपमेंट इन लैटिन अमेरिका”, अप्रैल 2016
  3. राज चेंगप्पा, “व्हाट वेंट रॉन्ग इन कश्मीर एंड हाउ टु फिक्स इट”, इंडिया टुडे, 12 सितंबर 2016
  4. एडलगार्ड बुलमान, हंस-जोआशिम गीजमान, मारियस मुलर-हेनिग, मिर्को शैडेवाल्ड और आंद्रियास वितकोव्स्की, “कॉर्नरस्टोन्स ऑफ अ स्ट्रैटेजी फॉर पीस बिल्डिंग एंड कनफ्लिक्ट ट्रांसफॉर्मेशन”, अप्रैल 2013, पृष्ठ 19; https://library.fes.de/pdf-files/iez/09848-20140724.pdf, 21 दिसंबर 2018 को देखा गया
  5. उपरोक्त
  6. यूएन क्रॉनिकल, “द लेगसीज ऑफ आर्म्ड कनफ्लिक्ट ऑन लास्टिंग पीस एंड डेवलपमेंट इन लैटिन अमेरिका”, अप्रैल 2016
  7. एडलगार्ड बुलमान, हंस-जोआशिम गीजमान, मारियस मुलर-हेनिग, मिर्को शैडेवाल्ड और आंद्रियास वितकोव्स्की, “कॉर्नरस्टोन्स ऑफ अ स्ट्रैटेजी फॉर पीस बिल्डिंग एंड कनफ्लिक्ट ट्रांसफॉर्मेशन”, अप्रैल 2013, पृष्ठ 19; https://library.fes.de/pdf-files/iez/09848-20140724.pdf, 21 दिसंबर 2018 को देखा गया

Translated by Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
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