श्रीलंका: राजनीतिक और सुरक्षा संरचना की मरम्मत की जरूरत
PM Heblikar

कोलम्बो के ईस्टर संडे चर्च में (21 अप्रैल 2019) और श्रीलंका के अन्य हिस्सों में बम विस्फोटों की घटनाओं ने देश की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति और राजनीतिक अंकगणित को एकदम से बदल दिया है। इस्लामिक राज्य इराक और सीरिया (आइएसआइएस) ने घटना की जिम्मेदारी लेते हुए अपनी रणनीति में बदलाव को भी जाहिर किया है। पिछले दशक में श्रीलंका के नागरिकों पर यह सबसे घातक हमला था। इसका मुख्य लक्ष्य श्रीलंका में रहने वाले अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय और उसके प्रतीकों को निशाना बनाना था। यह संकेत था कि ईसाई समुदाय अब वैसा बगलगीर नहीं रहा बल्कि यह तो आइएसआइएस के वैिक जेहाद के नये प्रारूप (फाम्रेट) का मुख्य निशाना था।

इसी प्रकार, बम विस्फोट की घटना ने भारत और इसके पड़ोसी देशों, खास कर आसियान को मौजूदा समय और आगे भी आइएसआइएस के खिलाफ पहरेदारी में ढिलाई के स्पष्ट खतरे के बारे में एक कठोर चेतावनी-संदेश दे दिया है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश एक व्यापक क्षेत्रीय गठबंधन खड़ा करने की जरूरत को लेकर है। इस गठबंधन में खुफिया सूचनाओं, अनुभवों और उस स्तर की विशेषज्ञता के परस्पर आदान-प्रदान को शामिल किया जाए, जो हिंसा के किसी भी रूप और आकार का समय रहते पता लगाने, उसको रोकने और उसका विध्वंस करने में सक्षम हो सके। स्वाभाविक ही, इसे नागरिक समाज एवं सोशल मीडिया में राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और हमले से बचने के लिए जनता की निगाहों से अलग एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिये पूरा किया जाना है।

श्रीलंका के राष्ट्रीय भागीदारों के लिए दो जुड़वां प्रत्ययों पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। पहला, श्रीलंका के लिए यह कडुवा सच्चाई है कि उसको जितनी जल्दी संभव हो, अपने घर यानी आंतरिक विधि-व्यवस्था को दुरुस्त करने तथा सामान्य जीवन फिर से पटरी पर लाने के लिए वैसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, उसे अपने विरुद्ध खतरा बने हुए शत्रु ताकतों से निबटने के लिए 2019 में एक राजनीतिक कैलेंडर के साथ आना होगा। दूसरे, श्रीलंका की अर्थव्यवस्था विगत की छाया है, जिसने अक्टूबर 2018 के निष्फल संवैधानिक गर्भपात ‘कूप’ के बाद से पांच महीनों में दूसरी बार जबर्दस्त झटके की शिकार हुई है। इसने देश को कई हफ्तों तक पंगु बनाये रखा, जिसके चलते करोड़ों डॉलर के राजस्व के साथ निवेशकों के विास और पर्यटकों की कम आवाजाही से भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसलिए श्रीलंका को अपनी आर्थिक दशा सुधारने के लिए लम्बी दौड़ लगानी है। इस दिशा में उसे भारी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय सहायता चाहिए होगी। इन जुड़वां कारकों का वजन वहन करना देश के मुख्य राजनीतिक दलों की भूमिका पर निर्भर करता है। यह अहम है कि सरकार में और उसके बाहर के साझेदार तुरंत एक लाइन में आएं और बिना किसी भय एवं पक्षपात के अपने आम नागरिकों में तालमेल बैठाएं। इसके अलावा, और कोई विकल्प नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन और निर्णय लेने की क्षमता में पंगुता की सबसे बड़ी वजह राष्ट्रपति मैथिरिपला सिरिसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के बीच पैदा हुआ संघर्ष है। विगत में ऐसी घटनाओं के और भी उदाहरण मिलते हैं। फरवरी 2014 में, तात्कालीन राष्ट्रपति चंद्रिका भंडारनायके कुमारतुंगा ने बिना किसी स्पष्ट कारण के रानिल विक्रमसिंघे की अगुवाई वाली यूनाइटेड नेशनल फ्रंट (यूएनएफ) की साझा सरकार को बर्खास्त कर दिया था और संसदीय चुनाव का आदेश दिया था। अप्रैल, 2004 में हुए इस चुनाव में रानिल हार गए थे। यहां यह स्मरण रखा जा सकता है कि रानिल विक्रमसिंघे लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) से हुए संघर्ष विराम के बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रम में ताकतवर नेता बन कर उभरे थे। बाकी तो इतिहास है।

प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि राष्ट्रपति सिरिसेना के साथ उनका तालमेल नहीं है। यह भी बताया था कि अक्टूबर 2018 के बाद दरारें और चौड़ी हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में उनसे चर्चा नहीं की जाती थी। ईस्टर चर्च बम विस्फोट के समय उनके हाथ बंधे हुए थे। बताया जाता है कि उस समय सिरिसेना तिरुपति के दर्शन के बाद सिंगापुर के दौरे पर गए थे। अब यह तो वही बेहतर जानते हैं कि एक कार्यवाहक रक्षा मंत्री को नामजद नहीं करने का कारण क्या है। इसके विपरीत, दिसम्बर 2004 में सुनामी के वक्त, तात्कालीन प्रधानमंत्री महेन्द्र राजपाक्षे ने इसका कार्यभार सम्हाल लिया था, जब राष्ट्रपति भंडारनायके उस समय लंदन में थीं और उन्होंने अपनी जगह किसी को रक्षा और सुरक्षा मामलों का मंत्री नहीं बनाया था। राजपाक्षे ने इस अवसर का उपयोग करते हुए स्वयं ही बचाव और राहत अभियान का तत्काल प्रबंध शुरू किया और उसकी सतत निगरानी करते रहे, जब तक कि भंडारनायके विदेश से लौट कर इन सभी अभियानों का जिम्मा संभाल नहीं लिया।

कोलम्बो के अनेक विश्लेषकों ने स्वीकार किया है कि भारत ने श्रीलंका को सही समय पर खुफिया सूचना देकर महत्ती भूमिका का निर्वाह किया है। सत्ताधारी नेताओं ने भी इसे माना है। किंतु खुफिया सूचनाएं किसी देश या शायद मित्र एजेंसी से हासिल करना एक बात है जबकि उन पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई न कर सकने पर समग्र जांच किये जाने की जरूरत है। यह प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों के लिए अपरिहार्य है कि उन्हें अपने समाज में जो चल रहा है, खास कर अंतर-सामुदायिक विघटन और घृणा के प्रसार के प्रति बेखबर न हों। इसके लिए उन्हें अपनी एजेंसियों पर ही पूर्ण रूप से निर्भर नहीं रहते हुए उनका अपना सियासी एंटिना धरातल पर हो रही घटनाओं पर नजर रखने में और नेतृत्व को उसके मुताबिक अद्यतन करने में रहने में सक्षम था। इसका उपयोग नहीं किया गया। इसके अलावा, यह भी समझना मुहाल है कि क्यों संबद्ध एजेंसियों ने खास कर आसियान क्षेत्र में, पड़ोस के दक्षिण भारतीय राज्यों में और विशेषकर फिलिपींस में आइएसआइएस की कारगुजारियों के बावजूद रडार से अपनी आखें फेर लीं? राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों को संयुक्त रूप से इस आरोप का वहन करें और लोगों एवं संसद के प्रति उत्तरदायी हों।

राष्ट्रपति ने ईस्टर चर्च बम कांड की जांच के लिए एक वरिष्ठ न्यायमूर्ति की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी गठित की है। उम्मीद की जाती है कि कमेटी घटना के सभी पहलुओं की जांच करके अपने सुझाव भी देगी। इस कमेटी को खास तौर पर यह पता करने के जिम्मा दिया गया है कि भारत जैसे मित्र देश से सही समय पर मिली खुफिया जानकारी के बावजूद इस मामले में त्वरित और सक्षम कार्रवाई क्यों नहीं की गई? कमेटी को सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच मौजूदा खाई के बारे में अनिवार्य रूप से पता करना है। साथ ही, मौजूदा बुराइयों को दूर करने के लिए उपाय सुझाना है। इस कमेटी को संवैधानिक व्यवस्थाओं को भी देखने और भविष्य में, खास कर संकट की स्थितियों में, राष्ट्रीय सुरक्षा में विफल न रहने के लिए रास्ता भी दिखाने की आवश्यकता है।

श्रीलंका के पूर्वी प्रांत में कट्टरतावादी ताकतों की गतिविधियों का फैलाव भारी चिंता का विषय है, जो सरकार से खास ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर देता है। जाफना प्रायद्वीप की स्थिति से संवेदनशील पूर्व की तुलना में भिन्न और शांतिपूर्ण है। धनाढ्य मुस्लिम परिवारों की इसमें संलग्नता को भी समझने की जरूरत है। ईस्टर चर्च कांड दो साल पहले बांग्लादेश के ढाका के कैफे में हुए बमकांड के समरूप है। यह समरूपता इतनी स्पष्ट है कि इस पर ध्यान गये बिना नहीं रहता। यह भी स्थापित होता है कि आइएआइएस रणनीतिक कारणों से ऐसे हमले स्थानीय इकाइयों से ही करा रहा है। यह देखते हुए श्रीलंका की एजेंसियां इस मामले में पड़ोसी बांग्लादेश और भारत से भी सम्पर्क कर बेहतर काम कर सकती थीं। भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश अब धारा के कंकड़ नहीं रहे बल्कि वे समान रूप से अंतरराष्ट्रीय आतंक के निशाने पर हैं।

यह खास तौर पर ध्यान देने योग्य है कि विध्वंसात्मक हमले के बावजूद सक्षम प्राधिकरणों की तत्परता के चलते श्रीलंका में कानून-व्यवस्था की स्थिति शांतिपूर्ण बनी हुई है। धार्मिक समूहों के नेताओं की भूमिका प्रशंसनीय रही है। उन्होंने अत्यधिक त संवेगात्मक समुदाय में शांति और सद्भाव लाने के लिए बहुत कुछ किया है। इसे समुदायों के विभिन्न वगरे के बीच बिगड़े संबंधों को सुधारने के लिए अवश्य ही स्थायी निदान बनाना चाहिए। सरकार ने इस दिशा में कदम उठाते हुए पुलिस बल, खुफिया एवं सुरक्षा तंत्र सहित कई बदलाव किये हैं, लेकिन अशांत ईस्टर्न प्रोविन्स में अब भी बहुत कुछ किये जाने की अपेक्षा है। श्रीलंका में अगले साल होने वाला राष्ट्रपति चुनाव इसकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के भविष्य की गतिविधियों की दिशा तय करेगा।

लिट्टे के खिलाफ अभियान में श्रीलंका पुलिस की कार्य-क्षमता के प्रदर्शन का रिकार्ड सवरेत्कृष्ट रहा है और इसके स्पेशल टॉस्क फोर्स की सानी तो दुनिया के कुछ ही देश करते हैं। इसकी सेना अंतिम उपाय है और इसमें कोई संदेह नहीं कि उसका रिकार्ड असंदिग्ध है। तो धार्मिक नेताओं और सुरक्षा बलों द्वारा तैयार की इस सरजमीं पर राजनीतिक वर्ग और नागरिक समुदाय अग्र-सक्रियता से आगे के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

ईस्टर बम कांड के पहले इसको लेकर सटीक खुफिया सूचनाएं मुहैया कराने में भारत की भूमिका के बारे में श्रीलंका के समाज में ढेर सारे शक-शुबहा हैं। कोलंबो के कुछ विश्लेषकों का कहना है कि विगत के अनुभवों को देखते हुए श्रीलंका के सैन्य प्रतिष्ठान में भारत के प्रति विास का संकट है। राजपक्षे के मुताबिक भारत द्वारा श्रीलंका सेना की मदद के लिए अपने आतंक-निरोधक बल, नेशनल सिक्युरिटी गार्ड (एनएसजी) को वहां भेजने की पेशकश को जनता द्वारा ठुकराया जाना, ऐसा ही एक उदाहरण है। यहां दो मसले हैं, जिनको हल किये जाने की आवश्यकता है। पहला, भारत के अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की चुनौतियों से निबटने के अनुभवों और विशेषज्ञताओं को देखते हुए श्रीलंका को उसकी सहायता की आवश्यकता है। श्रीलंका न तो पूरी तरह से राजनीतिक रूप से और न अन्य किसी तरह से इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। इसके अलावा, भारत को भी अपने दक्षिणी राज्यों में समस्याएं पैदा करने वाले तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के लिए श्रीलंका के सहयोग की आवश्यकता है।

दूसरा, श्रीलंका के राजनीतिक प्रतिष्ठान को राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीति को अलग खांचों में रखने की जरूरत होगी और ऐसे मामलों में द्वि-दलीय रुख का विकास महत्त्वपूर्ण होगा। हरेक समय श्रीलंका में संकट रहा है, ऐसे में भारत उसका पहला मददगार रहा है और उसके इस रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। इसको अवश्य ही स्वीकार किया जाना चाहिए और इसको पहचाना जाना चाहिए। भारत को इस दिशा में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका न केवल अपने नजदीकी पड़ोसी देशों बल्कि आसियान जैसे बड़े क्षेत्र में भी निभानी चाहिए।


Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)
Image Source: https://fortunedotcom.files.wordpress.com/2019/04/sri-lanka-bombings-e1555939430806.jpg

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