सामरिक मंच की सफलता का ढांचा: अरिहंत से मिले सबक
Vice Adm Raman Puri, PVSM, AVSM, VSM, Distinguished Fellow, VIF
कार्यक्रम

आईएनएस अरिहंत शिप सबमर्सिबल बैलिस्टिक न्यूक्लियर (एसएसबीएन) ने हाल ही में अपनी पहली ‘निवारण गश्त’ यानी डिटरंस पैट्रोल पूरी की, जिस पर प्रधानमंत्री ने उसकी सराहना की। यह जहाज टिकाऊ परमाणु प्रक्षेपण विकल्प तलाशने के तीन दशकों के प्रयासों का नतीजा है। इसकी जड़ें 1971 के युद्ध में हैं, जिसमें साबित हुआ कि पनडुब्बियां अपनी रक्षा क्षमता से बहुत आगे जाकर शत्रुओं को रोकने में बहुत कारगर रहती हैं।

1974 के शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षणों के बाद राजनीतिक नेतृत्व ने व्यवहार्यता अध्ययनों को ही झंडी दिखा दी। इसके लिए भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) के परमाणु वैज्ञानिक, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के हथियार तथा सिस्टम इंजीनियरिंग विशेषज्ञ और नौसेना तथा उसके जहाज डिजाइन करने वाले साथ आए और उस लाभदायक साझेदारी की नींव पड़ी, जिसकी परिणति इस सफल कार्यक्रम के रूप में हुई। मजबूत कार्यक्रम प्रबंधन संगठन और सरकार के शीर्ष स्तर पर लगातार मिलते समर्थन (चाहे सरकार किसी की भी हो, मंजूरी मिली हो और बजट कितना भी सीमित हो) के कारण यह कार्यक्रम लंबे अरसे तक गोपनीय तरीके से चलता रहा। जब गोपनीयता का पर्दा उठा तो कार्यक्रम पूरा होने वाला था। जो देश ‘पहले इस्तेमाल नहीं करने’ की परमाणु नीति का संकल्प लेकर चलता है, वहां इससे जल्दी क्या हो सकता था।

क्या सही रहा

इस कार्यक्रम में कुछ बातें अच्छी रहीं, जैसेः-

  • शीर्ष नेतृत्व का समर्थन, जिसके कारण धन लगातार मिलता रहा;
  • रक्षा संबंधी विभागों तथा उनकी इकाइयों, परमाणु ऊर्जा, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र को एक साथ लाकर मजबूत त्रिस्तरीय कार्यक्रम प्रबंधन संगठन तैयार करना, जिसके कारण संसाधनों को एक साथ लाना आसान रहा और अनपेक्षित कटुता के बगैर सभी परिणाम पर केंद्रित रहे;
  • मीडिया की बेजा नजर और दबाव से बचाने वाली गोपनीयता, बीच के पड़ाव और सच कहा जाए तो धन का अटकना;
  • निस्संदेह इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि सरकारी गोपनीयता, भविष्य की कारोबारी संभावना स्पष्ट नहीं होने तथा तकनीकी जोखिम होने के बावजूद निजी क्षेत्र की ढेर सारी बड़ी कंपनियों को पूरी लगन के साथ इसमें सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया गया
स्वदेशी तंत्र

कार्यक्रम मानक खरीद नियमावली से न के बराबर हटा और अपना लक्ष्य हासिल कर लिया। इसमें काफी हद तक सफलता इसलिए भी मिली क्योंकि यह बेहद गोपनीय परियोजना थी और वित्तीय एवं अन्य आवश्यक मामलों को उच्च स्तर पर ही संभाला गया।

कार्यक्रम में आपूर्तिकर्ताओं यानी वेंडरों को परखने तथा उनका समूह तैयार करने में काफी प्रयास किए लगे। जब किसी बोली लगाने वाले को ठेका देने के लिए चुन लिया जाता था तो कार्यक्रम की टीम उसके साथ ‘खरीदार-आपूर्तिकर्ता/वेंडर’ वाले नहीं बल्कि ‘विकास में साझेदार’ वाले रिश्ते बनाती थी। विकास में साझेदार को कार्यक्रम की आंतरिक विशेषज्ञता, दस्तावेज, सांगठनिक जानकारी के भंडार, परीक्षण एवं एकीकरण बुनियादी ढांचे का लाभ हासिल करने का भरोसा हो सकता था। वास्तव में इस कार्यक्रम ने अपने विकास एवं निर्माण साझेदारों की सफलता के लिए काफी निवेश किया क्योंकि किसी भी साझेदार की नाकामी से कार्यक्रम को ही झटका लगता। दुर्भाग्य से कई पारंपरिक कार्यक्रमों में यह पहलू नदारद रहा क्योंकि वहां खरीदार और वेंडर के रिश्ते बनाए गए थे। डीआरडीओ में भी ऐसा ही हुआ।

कुछ अहम परियोजनाओं के लिए कार्यक्रम ने अनुबंध की सख्त शर्तों को नजरअंदाज भी कर दिया और यदि कम समय में बेहतर नतीजे मिल रहे थे तो दायरे तथा धनराशि को बढ़ाने में संकोच नहीं किया। कार्यक्रम का नेतृत्व करने वालों ने शैक्षिक एवं अनुसंधान संबंधों के जरिये राष्ट्रीय प्रतिष्ठा वाले संस्थानों का पूरा इस्तेमाल किया। उनके विकास साझेदारों को भी जरूरत पड़ने पर इन संस्थानों का इस्तेमाल करने की इजाजत थी और इसके लिए उनके प्रस्तावों को देरी के बगैर मंजूरी दी जा रही थी।

मानव संसाधन नीतियां

चूंकि शीर्ष संगठन में नौसेना के अधिकारी थे, इसलिए डीआरडीओ के अधीन काम करने के बावजूद पर्याप्त नौसेना अधिकारियों की भर्ती आराम से हो गई। कार्यक्रम में उनकी तकनीकी महारत और पेशेवर दक्षता का एकदम सकारात्मक तरीके से इस्तेमाल किया गया। ‘उपयोगकर्ताओं की सहभागिता कम होने’ की शिकायत करने वाले विभिन्न रक्षा एवं अनुसंधान संगठनों के लिए यह आदर्श उदाहरण हो सकता है। इतना ही नहीं, यह सुनिश्चित किया गया कि कार्यक्रम में शामिल लोग लंबे समय तक इससे जुड़े रहें।

मंजूरी की प्रणाली

एकीकृत निर्दिष्ट प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम यानी आईजीएमडीपी के साथ चलने वाले इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ यह रहा कि इसे किसी तरह की स्पर्द्धा सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि इसमें आयात के द्वारा खरीद का विकल्प ही नहीं था और न ही किसी विदेशी कंपनी को कार्यक्रम में दखल डालने दिया जसा सकता था। दूसरी बात यह थी कि अपनी तरह का पहला कार्यक्रम होने के कारण नाकामियों को ढका जा सकता था और हरेक पड़ाव पर आगे बढ़ने या नहीं बढ़ने जैसे फैसलों का सामना भी उसे नहीं करना पड़ा। तीसरी बात, मंजूरियों की व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया कि लगभग हर बार स्वदेशी तरीके को ही पहला और इकलौता विकल्प माना जाए। टीम में पहल करने की भावना कूट-कूटकर भरी थी और उद्योग के साझेदारों (निजी तथा सरकारी क्षेत्र दोनों से), शिक्षा जगत के सलाहकारों तथा विदेशी सहयोगियों (आरंभ में कुछ विदेशी थे) को इसने उत्साह से भर दिया।

देश को यह स्पष्ट पता होना चाहिए कि यदि किफायती व्यवस्थाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी हो और औद्योगिक तंत्र तैयार करना हो तो स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास के जरिये ‘मेक इन इंडिया’ जरूरी शर्त होगी और हमारी पूरी खरीद नीतियों, प्रक्रियाओं एवं तरीकों को बदलने के लिए सफल परियोजनाओं से सीखे गए सबक अपनाने होंगे। अनुसंधान एवं विकास से युक्त ऐसे औद्योगिक तंत्र के आर्थिक फायदे स्वयं ही नजर आएंगे क्योंकि रक्षा तकनीक का कई क्षेत्रों में दोहरा इस्तेमाल होता है।


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: https://nationalinterest.org/sites/default/files/styles/desktop__1486_x_614/public/main_images/indian_sub.jpg?itok=JM65603f

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