दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप में पखवाड़े की हलचल
Mayuri Mukherjee, Consultant, VIF
बांग्लादेश: न्यायिक प्रक्रिया के बगैर हत्याओं में न्याय नहीं

हत्या के एक आरोपी की जुलाई में पुलिस मुठभेड़ में मौत होने के बाद बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि इस तरह की “न्यायिक प्रक्रिया के इतर हत्याएं” उसे मंजूर नहीं हैं। न्यायाधीशों ने कहा, “हमें न्यायिक प्रक्रिया के बगैर की गई हत्याएं पसंद नहीं हैं। हो सकता है कि उस समय कानून प्रवर्तन के पास खुद को बचाने के लिए इसके अलावा कोई और चारा नहीं रह गया हो। लेकिन पुलिस समेत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को इस बारे में और भी सावधान रहना चाहिए। कानून द्वारा दिए गए अधिकार सुनिश्चित किए जाएं।”

न्यायाधीशों के विचारों को प्रतिध्वनित करते हुए ढाका जजेस कोर्ट में वकील अयमान आर खान ने डेली स्टार में लिखा, “न्याय प्रक्रिया के बगैर हत्याओं को रोकना अच्छे प्रशासन के लिए जरूरी है। यदि लोगों को सभी न्यायिक प्रक्रियाओं से वंचित रखा गया और ‘गोलीबारी’ तथा ‘मुठभेड़’ में मारा गया तो न्यायव्यवस्था पर लोगों की निर्भरता और भरोसा कभी बहाल नहीं हो सकेगा।” पत्रकार सैयद बदरुल अहसान एक अलग पक्ष सामने लाए। ढाका ट्रिब्यून में लिखते हुए उन्होंने कहा कि दिनदहाड़े हत्या करने वाले के मरने पर कई लोगों ने खुशी जताई थी, लेकिन उन्होंने इस सवाल को नजरअंदाज कर दिया कि “अपराध को संरक्षण देने वाले कितने लोग उस समय चैन की लंबी सांस लेते हैं, जब उनके द्वारा प्रशिक्षित किए गए और किसी की हत्या के लिए भेजे गए अपराधी उनका नाम लेने से पहले ही खामोश करा दिए जाते हैं।”

पाकिस्तानः फिर फैला दिया खैरात का कटोरा

पाकिस्तान की दरकती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 3 जुलाई को तीन साल के लिए 6 अरब डॉलर का कर्ज मंजूर कर दिया। द डॉन ने अपने संपादकीय में कहा कि पाकिस्तान को 13वीं बार ऐसा वित्तीय पैकेज मिल रहा है। हरेक पैकेज में एक जैसी दो शर्तें होती हैं, (“वृहद आर्थिक तालमेल और उसके बाद ढांचागत सुधार”) और हरेक पैकेज का नतीजा एक जैसा ही निकला है (“सरकार रकम लेती है, किफायत और ‘मांग में कमी’ के नाम पर जनता को बड़े कष्ट देती है, उसके बाद आधे-अधूरे क्रियान्वयन के जरिये ढांचागत सुधार के अपने वायदे से मुकर जाती है”)। संपादकीय में कहा गया कि “पाकिस्तान का ”ज्यादातर वक्त रकम जुटाने की कोशिशों में ही बीता है और अब हम एक बार फिर रकम जुटाने की तैयारी कर रहे हैं।”

उसी अखबार में लिखते हुए संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मुनीर अकरम ने अधिक सकारात्मक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद को जो कुछ दिया जा रहा थ, उससे बेहतर सौदा उसने हासिल किया है और उन्होंने उम्मीद जताई कि “आईएमएफ के कार्यक्रम से पाकिस्तान की व्यवस्थागत आर्थिक चुनौतियों का दीर्घकालिक समाधान शुरू होगा, जिनमें ढांचागत सुधार, बेहतर आर्थिक प्रशासन और भारी देसी एवं विदेशी निवेश भी शामिल हैं।” द नेशन ने भी ऐसा ही रुख अपनाते हुए अपने संपादकीय में कहा, “आगे का रास्ता कठिन है और जनता के लिए मुश्किलों से भरा है, लेकिन यदि सरकार किफायत यानी मितव्ययिता, सतत विकास के साथ आगे बढ़ती है और कर का दायरा बढ़ाने पर समझौता नहीं करती है तो हमें खैरात का कटोरा फिर कभी नहीं फैलाना पड़ेगा।”

नेपालः पर्यटन को बढ़ावा या फिजूलखर्ची

इस साल का इंटरनेशनल इंडियन फिल्म एकेडमी (आइफा) फिल्म समारोह काठमांडू में आयोजित होने की घोषणा के बमुश्किल 15 दिन के भीतर ही नेपाल सरकार इस पर होने वाले भारीभरकम खर्च के विरोध को देखते हुए अपने फैसले से पलट गई। काठमांडू पोस्ट ने अपने संपादकीय में लिखाः “नेपाल के लिए 1 अरब रुपये की रकम बहुत काम आ सकती है, खास धन की कमी से जूझ रहे शिक्षा जैसे अहम क्षेत्र के लिए। विजिट नेपाल 2020 के लिए पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बेहद अहम लक्ष्य के लिए भी सरकार हमारे नेताओं को बॉलीवुड सितारों के साथ तस्वीरें खिंचाने का मौका देने के बजाय अच्छी साबित हो चुकी रणनीतियों के जरिये इस रकम का बेहतर उपयोग कर सकती है।” अखबार ने यह भी कहा कि पर्यटकों को आकर्षित करने के इसी लक्ष्य के सथ 2010 में जब श्रीलंका ने आइफा अवार्ड की मेजबानी की थी तो उसे निराशा ही हाथ लगी थी; समारोह से “दीर्घकालिक फायदे शायद ही मिले, सितारों के जरिये प्रचार का वायदा पूरा करने में भी उसे नाकामी हाथ लगी और शुरू से ही यह कार्यक्रम विवादों से घिरा रहा।”

लेकिन उसी अखबार में नेपाली अनुवादक दिनेश कफले ने दलील दी कि इस विरोध को “भारत विरोधी या बॉलीवुड विरोधी भावना” बताने की सरकार के कुछ मंत्रियों की कोशिशें “अंतरराष्ट्रीय चूक” है। उन्होंने यह भी कहा कि अवार्ड को “नेपाल की संप्रभुता और आजादी पर हमला” बताने का संसदीय समिति का दावा “अजीब” है; और यह विरोध आइफा के खिलाफ नहीं बल्कि “हमारी अपनी सरकार के खिलाफ है, जो मोटे तौर पर विदेशियों के लिए हो रहे उस निजी मनोरंजन कार्यक्रम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के मकसद से पुरजोर कोशिश कर रही है, जिससे नेपाल को शायद ही कुछ हासिल होना है।” कफले लिखते हैं, “सहज बुद्धि कहती है कि पहले हम पर्यटन का मजबूत बुनियादी ढांचा बनाएं और उसके बाद हम दुनिया को यह बताने के लिए बॉलीवुड मनोरंजन शो का सहारा ले सकते हैं कि नेपाल पर्यटन का कितना शानदार ठिकाना है।”

श्रीलंकाः मृत्यु दंड पर बहस

श्री लंका के सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी घोषित किए गए चार नशे के व्यापारियों की सजा-ए-मौत पर 5 जुलाई को रोक लगा दी क्योंकि मृत्युदंड के विरोध में कई याचिकाएं दाखिल कर दी गई थीं। श्रीलंका ने चार दशकों से किसी को मौत की सजा नहीं दी है, लेकिन पिछले महीने राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने चार दोषियों को फांसी देने के आदेश पर दस्तखत कर दिए। इससे देश में विरोध शुरू हो गया और विदेश में तीखी आलोचना होने लगी।

संडे ऑब्जर्वर ने अपने संपादकीय में कहा कि यह मसला राष्ट्रपति का “निजी धर्मयुद्ध” बन गया है, लेकिन “स्वस्थ चर्चा करने में कोई नुकसान नहीं है” और एकतरफा कार्रवाई करने के बजाय “सार्वजनिक बहस को मृत्युदंड फिर लागू करने के औचित्य को समझने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।” डेली फाइनेंशियल टाइम्स के लिए लिखते हुए डॉ. निहाल जयविक्रमा ने कहा कि यदि श्रीलंका फांसी पर 43 साल से लगी रोक हटाता है तो “यूरोपीय संघ से मिल रही रियायतें बंद हो जाएंगी” और “दंड नीति में अस्थिरता के कारण” कोलंबो के प्रत्यर्पण के अनुरोध भी ठुकराए जा सकते हैं। उन्होंने यह दलील भी दी कि चूंकि “अपराध होने से रोकने का सबसे प्रभावी तरीका यह धारणा है कि अपराध का पता चल ही जाएगा”, इसलिए सरकार का ध्यान “सक्षम पुलिस प्रणाली, प्रभावी अभियोजन और जल्द सुनवाई पर होना चाहिए।”

द आईलैंड में असगर हुसैन ने भी यही कहते हुए लिखा कि “पेशेवर, सक्षम और स्वतंत्र आपराधिक न्याय व्यवस्था फांसी के तख्ते से ज्यादा अच्छा काम करती है” और मृत्युदंड “घृणा तथा हिंसा झेल चुके देश में क्रूरता और भी बढ़ाने” का काम ही करेगा।

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>


Translated by Shiwanand Dwivedi

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