यक्ष प्रश्नः क्या चीन अपने कर्ज का प्रबंधन कर सकता है?
Prerna Gandhi, Associate Fellow, VIF

“कोई आदमी जो केवल आदमियों को ही प्रबंधित कर सकता है वह केवल चीजों को ही नियंत्रण में रख सकता है, लेकिन जो व्यक्ति धन प्रबंधन कर सकता है वह किसी को भी काबू में रख सकता है”- विल दुरंत

अंतरराष्ट्रीय तंत्र में चीन की लगातार बढ़ती भूमिका और मजबूती के पीछे उसकी आर्थिक ताकत का ही हाथ है। हालांकि उसकी अप्रत्याशित तेज आर्थिक वृद्धि ने उसे बहुत खास स्थिति में पहुंचा दिया है जहां निवेश और ऋण के दम पर होने वाली वृद्धि अपनी सीमा पर पहुंच गई है जिसमें उसके दीर्घावधिक ऋण चक्र में तेजी के दौर पर महज पच्चीस से कम वर्षों में विराम लगने के संकेत मिले हैं। फिर भी हमारे सवाल से जुड़ी तमाम विडंबनाएं स्वयं इसी तथ्य में दृष्टिगत होती हैं कि एक देश जो अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 260 प्रतिशत से अधिक के ऋण बोझ तले दबा है, वह देश दुनिया में बुनियादी ढांचे से जुड़ी सबसे बड़ी परियोजना (बिल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई) को सिरे चढ़ाने में लगा हुआ है। अर्थशास्त्री और चीनी नीति निर्माता व्यापक रूप से सहमत हैं और स्वीकारते हैं कि चीनी अर्थव्यवस्था की सेहत खराब है और वह जोखिम से जूझ रही है। हालांकि इस पर राय बंटी हुई हैं कि यह जोखिम कैसे असर दिखाएगा। यहां तक कि इस सवाल का कोई हां या न में निश्चित जवाब भी नहीं है कि चीन अपने ऋण की समस्या से कैसे निपटेगा। हालांकि इसमें से तमाम जवाब ही यह तय करेंगे कि वे चीन की महाशक्ति बनने की आकांक्षा को बढ़ाएंगे या इसकी संभावनाएं घटाएंगे।

चीनी ऋण की पृष्ठभूमि

चीन पर ऋण के बोझ में बढ़ोतरी 2008 के वित्तीय संकट के बाद शुरू हुई जिसके बाद से चीन के जीडीपी के अनुपात में ऋण का स्तर हर साल 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ता गया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमान के अनुसार वर्ष 2016 तक यह अनुपात बढ़कर जीडीपी के 260 प्रतिशत के बराबर हो गया। अर्थशास्त्र में ‘70 के सिद्धांत’ का उपयोग करें तो इसका यही अर्थ निकलता है कि 2008 से 2015 के बीच ऋण एक तरह से दोगुना हो गया। चीन की राज्य परिषद ने 9 नवंबर, 2008 को 4 ट्रिलियन रेनमिनपी (लगभग 586 अरब डॉलर) के प्रोत्साहन पैकेज का ऐलान किया। इनमें से अधिकांश प्रोत्साहन गैरजरूरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के साथ ही घरेलू स्तर पर ऋण देने के लिए दिए गए ताकि चीनी अर्थव्यवस्था वैश्विक मंदी से महफूज रहे जिसके तहत स्थानीय निकाय सरकारों और सार्वजनिक क्षेत्र के स्वामित्व वाले उपक्रमों (एसओई) को प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई गई।

इस बीच चीन ने तमाम पड़ाव पार किए। वर्ष 2010 में डॉलर मूल्यांकन के आधार पर वह जापान को पछाड़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया, 2013 में दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारी बना और वर्ष 2014 में क्रय शक्ति भारिता (पीपीपी) के आधार पर अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।

चीनी वित्तीय तंत्र में कुप्रबंधन की झलत तभी मिलनी शुरू हो गई जब उसके सबसे बड़े बैंक (या यूं कहें कि दुनिया के सबसे बड़े बैंक) इंडस्ट्रियल एंड कॉमर्शियल बैंक ऑफ चाइना (आईसीबीसी) अंतिम क्षणों में 50 करोड़ डॉलर के माध्यम से डिफॉल्ट होने से बाल-बाल बचा।

बेसल प्रावधानों के दौर में (पूंजी जोखिम, बाजार जोखिम और परिचालन जोखिम के दौर में स्वैच्छिक अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नियमन) चीनी बैंकों के अपेक्षाकृत कम गैर-निष्पादित ऋणों या एनएलपी (1.7 प्रतिशत) और भारी ऋण लेकर बैठी कंपनियों की उसे चुकाने की कमजोर क्षमता में अंतर तमाम प्रश्न खड़े करता है। आकार और जटिलताओं के आधार पर चीनी वित्तीय तंत्र में बहुत ही तेज वृद्धि हुई है जो दुनिया के सबसे बड़े तंत्रों में से एक बन गया है जहां वित्तीय परिसंपत्तियां जीडीपी के लगभग 470 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई हैं। यहां तक कि बैंकिंग क्षेत्र के मुकाबले परिसंपत्ति प्रबंधन और बीमा कंपनियों जैसे गैर-बैंक वित्तीय संस्थानों (एनबीएफआई) ने कहीं अधिक तेजी से वृद्धि की है। जहां जमा ब्याज दरें अभी भी नियंत्रित हैं तो बेहतर प्रतिफल की चाह में बचतकर्ताओं को संतुष्ट करने के लिए बैंकों ने अपने ऋण दायरे से बाहर निकलकर नई परिसंपत्तियों के लिहाज से रणनीतियां बनाईं (ट्रस्ट लोन, संपदा प्रबंधन उत्पाद-डब्लूएमपी) जबकि कुछ जोखिम को साथ रखते हुए नए ऋण देने के लिए भी पूंजीगत गुंजाइश बनाई।

इस प्रकार देखें तो कुल बैंक ऋणों में बुनियादी ढांचा, निर्माण और रियल एस्टेट क्षेत्रों की हिस्सेदारी घटी है, लेकिन ऐसा लगता है कि दूसरे अन्य माध्यमों से वित्त उपलब्ध कराकर इसे समायोजित किया गया है। इस प्रक्रिया ने वृद्धि के पुराने मॉडल को नया विस्तार दिया है जो उत्पादकता वृद्धि में कमी का कारण बन रहा है और इससे कॉर्पोरेट ऋणों का अंबार एवं जोखिम ही बढ़ा है।

संतुलन की कवायद

चीन में पहले से ही डिलेवरजिंग यानी बहीखाते में देनदारियों की हिस्सेदारी के सापेक्षिक अनुपात को घटाने की कवायद चल रही है। चीन के पास मुख्य रूप से चार विकल्प हैं- ऋण पुनर्गठन, मुद्रा अवमूल्यन, आर्थिक वृद्धि या स्पष्ट रूप से डिफॉल्ट। पुनर्पूंजीकरण या पुनर्वित्तीयन के माध्यम से ऋण पुनर्गठन के मोर्चे पर कुछ प्रगति जरूर हुई है लेकिन भीमकाय आकार के ऋण (30 ट्रिलियन डॉलर) पर अंकुश लगाने में इसकी प्रभावोत्पादकता संदिग्ध ही मानी जा रही है। इसके लिए चीनी पेंशन फंड से 30 प्रतिशत कोष को इसके लिए आवंटित करने जैसे कई कदमों का ऐलान भी हुआ।
वर्ष 2015 में बीजिंग ने चीन के पब्लिक इक्विटी बाजार (शेयर बाजार) की ओर कूच करने का प्रयास किया। इस योजना का मकसद ऋण के बोझ से जूझ रही कंपनियों के लिए एक उपयोगी एवं गतिशील इक्विटी बाजार तैयार करना था ताकि वे आरंभिक सार्वजनिक निर्गमों (आईपीओ) के माध्यम से पूंजी हासिल कर सकें। हालांकि चीनी सरकार को जून, 2015 में शेयर बाजार में जबरदस्त गिरावट की चुनौती से जूझना पड़ा जो सिलसिला आठ महीनों में ही जाकर थमा। सभी आईपीओ निलंबित कर दिए गए और नियमन कुछ और सख्त किया गया। इसमें यह तथ्य जानने की जरूरत है कि नए खुले ब्रोकरेज खातों में से 67 प्रतिशत उन लोगों ने खोले थे जिनकी शिक्षा हाईस्कूल से भी कम थी और उनके माध्यम से मार्जिन पर बहुत बड़ी राशि के साथ खरीदारी की गई थी। हालांकि नुकसान आबादी के छोटे से तबके (लगभग 8.8 प्रतिशत) तक ही सीमित रहा।

स्थानीय सरकार के 10 ट्रिलियन रेनमिनपी से अधिक के ऋण को कम ब्याज दर वाले बॉन्ड से भी बदला गया। हालांकि ऋण से ऋण की इस कवायद से ऋणग्रस्त उपक्रम भी अधर में हैं जो अतिरिक्त क्षमता को कायम रखते हुए उत्पादकता को घटा रहे हैं। मूल ऋणदाता एनबीएफआई से नया वित्त जुटाकर परिसंपत्तियों का भार हल्का कर रहे हैं। इस प्रकार भले ही जोखिम को कई धाराओं में बांटा जा रहा हो, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इसकी परिणति ऋण के स्तर को कम करने में निकलेगी। अगर कंपनियों का कायाकल्प होता है और शेयर चढ़ते हैं तो नया ऋण उतर जाएगा। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो अर्थव्यवस्था में और बड़े ऋण का अंबार लग जाएगा। चीनी बैंकों ने जनवरी, 2018 में 2.9 ट्रिलिटन रेनमिनपी (458.3 अरब डॉलर) के रिकॉर्ड ऊंचे ऋण जारी किए हैं। ऐसे में यही लगता है कि चीनी प्राधिकरण बड़ी सतर्कता के साथ आगे बढ़ रहे हैं और अभी भी व्यापक वित्तीय बाजार अस्थिरता से बचने और दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्ववस्था को किसी झटके से बचाए रखने के लिए नकदी सहयोग को जारी रखे हुए हैं। इससे ऋण का ऐसा मकड़जाल बन रहा है जो एक दुष्चक्र में तब्दील हो रहा है जिसमें कमाई या नकदी प्रवाह बढ़ाने या पुराने ऋण की अदायगी में नाकामी ही हाथ लग रही है। एक स्तर पर ऋणदाताओं को वापस भुगतान नहीं होगा और अगर भुगतान हुआ भी तो उन्हें उस मुद्रा में भुगतान हासिल होगा जिसमें उस मुद्रा की क्रय शक्ति का एक हिस्सा ही होगा जिसे उन्होंने शुरुआत में गतिविधियां बढ़ाने के लिए ऋण दिया था।

ऋण को आंतरिक स्तर पर समायोजित करने के लिए मुद्रा अवमूल्यन का विकल्प ही दीर्घ अवधि में कारगर नजर आता है, लेकिन यह भी बहुत मुश्किलों के फेर में फंसा हुआ है। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स और मूडीज की इन्वेस्टर्स सर्विस ने चीन के सॉवरिन ऋण की रेटिंग घटाई है जिससे चीन के लिए विदेशी मुद्रा में ऋण लेना और महंगा हो जाएगा। अगर इसमें अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी को भी जोड़ लें तो 1.4 ट्रिलियन डॉलर के बाहरी ऋण के भुगतान का चीन पर और ज्यादा बोझ बढ़ जाएगा। इसके अलावा 15 से 20 प्रतिशत से अधिक का अवमूल्यन ही ऋण में कटौती करने में प्रभावी होगा, लेकिन चीनी मुद्रा में अवमूल्यन पूंजी पलायन की समस्या को और बढ़ाएगा। फिर लगातार धमकियों के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने चीन को ‘करेंसी मेनिपुलेटर’ नहीं घोषित किया है। मुश्किल होते रिश्तों और वित्तीय बाजार के शॉर्ट टर्म झटकों को झेलने की अक्षमता से इस विकल्प को किनारे ही रखा जा सकता है। इस प्रकार चीन अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीदारी जारी रखेगा, यानी अमेरिकी सरकार तक पैसा पहुंचाएगा, क्योंकि अमेरिका के साथ उसका 375 अरब डॉलर का भारी-भरकम व्यापार अधिशेष है। ऐसे में चीन भले ही अपने अधिकांश विदेशी व्यापार को अपनी मुद्रा में करने के लिए प्रयास कर रहा हो, लेकिन इनसे कमाई का एक बड़ा हिस्सा डॉलर के रूप में ही आ रहा है। अपने फेडरल डेब्ट में अमेरिकी लोगों का आंतरिक तौर पर जहां दो तिहाई हिस्सा है, वहीं चीन की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत है। ऐसे में चीन द्वारा अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री से अमेरिका पर कयामत का कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा।

ऋण के माध्यम से और अधिक आर्थिक वृद्धि हासिल करने के लिए कोशिशें बेहतर सूरत में चीन के लिए अतिरेक क्षमताओं का निर्माण करेंगी तो बदतर हालात में उसके लिए मंदी का सबब बनेंगी। विकसित देशों की तुलना में चीन में अभी भी उपभोग का स्तर कम बना हुआ है। हालांकि अगर बीआरआई के लिहाज से देखें तो चीन ने वृद्धि के लिए नए रास्ते तलाशे हैं। पूंजी, श्रम और तकनीक आधारित उद्योग होने के नाते चीन और अन्य देशों में बुनियादी ढांचे का विकास चीन की मौजूदा मुश्किलों का हल निकालने का सबसे बेहतर मंच है। हालांकि बीआरआई के तहत तमाम बड़ी परियोजनाएं सफेद हाथी की तरह हैं जो तार्किक तौर पर कहीं नहीं टिकतीं जैसे चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी)। साथ ही अगर उनसे अपेक्षित राजस्व हासिल नहीं होता तो बीआरआई के तहत दिए गए ऋण खराब परिसंपत्तियों में बदलकर पहले से ही बोझ तले दबे चीनी वित्तीय तंत्र की मुश्किलें और बढ़ाएंगे।

जहां तक आखिरी विकल्प का सवाल है तो चीन ने दीवालिया नियमों को पुनर्परिभाषित करते हुए डिफॉल्ट की संभावनाएं तलाश करनी भी शुरू कर दी हैं। वर्ष 2017 के पहले सात महीनों में चीनी अदालतों में 4,700 से अधिक दीवालिया मामलों पर सुनवाई हुई। बीजिंग ने ‘जोम्बी फर्म्स’ यानी नुकसान में चल रही ऐसी इकाइयों के खिलाफ अभियान छेड़ा है तो सरकारी अनुषंगियों या सॉफ्ट लोन की मदद से ही चल पा रही हैं। पुनगर्ठन और विलय, अतिरेक क्षमताओं में कमी और कामगारों के पुनर्आवंटन के माध्यम से एसओई के कायाकल्प वाले सुधार किए जा रहे हैं। अनुमान है कि इन एसओई की देनदारी चीनी जीडीपी के 115 प्रतिशत के बराबर पहुंच गई है। 2012 से 2017 के बीच सरकार ने केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले समूहों के विलय का सिलसिला शुरू किया जिसके तहत सरकारी असेट सुरविजन एंड एडमिनिस्ट्रेशन कमीशन (एसएएसएसी) के नियंत्रण में आने वाली इकाइयों की संख्या 117 से घटाकर 98 कर दी गई।

इसके साथ ही बीजिंग ने ‘मिश्रित स्वामित्व’ की ओर भी कदम बढ़ाए हैं जिसमें निजी क्षेत्र के कुछ उपक्रमों और विदेशी कंपनियों को भी एसओई में हिस्सेदारी लेने की अनुमति दी जा रही है। वर्ष 2016 के अंत तक 68.9 प्रतिशत केंद्रीय एसओई और उनकी अनुषंगी कंपनियों ने मिश्रित स्वामित्व की राह अपनाई। फरवरी, 2018 में चीनी सरकार ने अनबांग इंश्योरेंस ग्रुप कंपनी लिमिटेड को नियंत्रण में ले लिया, क्योंकि उसके चेयरमैन वू शाओहुई आर्थिक अपराध में लिप्त पाए गए। इस कंपनी के पास न्यूयॉर्क के मशहूर वाल्डोफ एस्टोरिया होटल जैसी मूल्यवान संपत्तियां हैं। चाइना इंश्योरेंस रेगुलेटरी कमीशन या सीआईआरसी के अनुसार बीमा कानून के अनुच्छेद 144 और 145 के तहत अनबांग के एक साल के नियंत्रण की अवधि को बढ़ाकर दो साल कर दिया गया। वहीं विमानन से लेकर होटल कारोबार तक में सक्रिय चीनी समूह एचएनए ग्रुप ने ऋणदाताओं को सूचित किया है कि ऋण चुकाने और नकदी संकट से निपटने के लिए वह 2018 की पहली छमाही में 100 अरब रेनमिनपी (16 अरब डॉलर) की परिसंपत्तियां बेचेगी।

आर्थिक पुनर्गठन

ऋण पुनर्गठन के साथ ही हम चीन में आर्थिक पुनर्गठन को भी आकार लेता देख रहे हैं। आज चीन के जीडीपी में उद्योग यानी विनिर्माण (40.2 प्रतिशत) की तुलना में सेवाओं (50.2 प्रतिशत) की हिस्सेदारी अधिक हो गई है। वर्ष 2011 के बाद से रोजगार प्रदान करने में सेवा क्षेत्र ने विनिर्माण को पछाड़ दिया है जहां कुल रोजगारों में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी सेवा क्षेत्र की है। वर्ष 2015 में राज्य परिषद द्वारा घोषित ‘मेड इन चाइना 2025(एमआईसी 2025)’ रणनीति का ऐलान किया गया जिसका मकसद आर्थिक प्रतिस्पर्धा वाले उद्योगों में वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी गतिशीलता को भुनाने के लिए चीनी राज्य की शक्ति का लाभ उठाने की बात है। वर्ष 2016 से 2020 की अवधि में बीजिंग द्वारा दी जा रही 300 अरब युआन की वित्तीय सहायता चीन के विनिर्माण नवाचार में भविष्य के विकास और आर्थिक पुनर्गठन में सामाजिक भरोसे को बढ़ाने का स्पष्ट संकेत देती है। एमआईसी 2025 रणनीति में दस प्रमुख रणनीतिक उद्योगों को लक्षित किया गया है-

1. अगली पीढ़ी की सूचना प्रौद्योगिकी
2. हाई-एंड न्युमेरिकल कंट्रोल मशीनरी एंड रोबोटिक्स
3. एयरोस्पेस एवं विमानन उपकरण
4. मेरिटाइम इंजीनियरिंग उपकरण और उच्त स्तरीय पोत निर्माण
5. अत्याधुनिक रेल उपकरण
6. एनर्जी सेविंग एंड न्यू एनर्जी व्हीकल
7. बिजली उकरण
8. न्यू मैटेरियल्स
9. बायोमेडिसिन एंड हाई परफॉर्मेंस मेडिकल डिवाइस
10. कृषि मशीनरी एवं उपकरण I

चीन अब घरेलू नवाचारों का गढ़ बन गया है। वर्ष 2016 में विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के समक्ष चीनी पेटेंटों के आवेदन का आंकड़ा 45 प्रतिशत बढ़कर 43,000 के स्तर पर पहुंच गया जो जापान और अमेरिका के बाद किसी देश की सबसे बड़ी छलांग है। अगर चीन की यह रफ्तार ऐसे ही कायम रही तो वह इन दोनों देशों को भी पीछे छोड़ देगा।

चीन में 1 अरब डॉलर हैसियत वाली 100 यूनिकॉर्न तो 10 अरब डॉलर हैसियत वाली आठ डेकाकॉर्न निजी कंपनियां हैं। इनमें अलीबाबा की आंट फाइनेंशियल, राइड शेयरिंग दिग्गज दिदि चुक्सिंग, स्मार्टफोन निर्माता शाओमी और टेनसेंट म्यूजिक जैसी कंपनियां शामिल हैं। इन 108 कंपनियों की सम्मिलित हैसियत लगभग 435 अरब डॉलर है जो बेल्जियम की अर्थव्यवस्था के बराबर है।

निष्कर्ष

जहां आमदनी की तुलना में ऋण कहीं तेजी से बढ़ रहा है उस स्थिति में भी चीन अपनी उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास कर रहा है जिसके अभी तक मिले-जुले नतीजे भी हासिल हुए हैं। 1983 में 836 कार्यक्रमों से लेकर एमआईसी 2025 तक के सफर में स्वदेशी नवाचार में चीन ने एक लंबा सफर तय किया है। वर्ष 2016 में चीन का शोध एवं विकास का बजट 1.54 ट्रिलियन युआन (233 अरब डॉलर) रहा जबकि रक्षा के लिए उसने 954 अरब युआन (146.6 अरब डॉलर) का बजट रखा। स्पष्ट है कि रक्षा की तुलना में शोध एवं विकास पर अधिक खर्च करने वाला चीन अपनी तकनीकी पूंजी को और तेजी से बढ़ा रहा है, लेकिन यह भी शायद पूर्ववर्ती वृद्धि दर से कम ही हो।

चूंकि चीन केंद्रीय रूप से नियंत्रित अर्थव्यवस्था है तो उसके पास ऋण के पुनर्गठन की भी वैसी ही क्षमता है जैसी गुंजाइश मौद्रिक नीति को नरम करने की है। चीनी वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 के अंत तक स्थानीय सरकारों का ऋण 15.32 ट्रिलियन रेनमिनपी (लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर) और केंद्र सरकार का ऋण 12.01 ट्रिलिटन रेनमिनपी था। इस तरह कुल सरकारी ऋण जीडीपी के 36.7 प्रतिशत के दायरे में था जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के चिंताजनक स्तर से काफी कम है। ऐसे में अपनी मुद्रा में सरकारी ऋण बढ़ाने की तिकड़म के लिए गुंजाइश है।

फिर भी हमें यह याद रखना चाहिए कि ऋण के इस बुलबुल में केवल खराब ऋणों का ही फैलाव नहीं है। चीन 120 से अधिक देशों और क्षेत्रों का शीर्ष व्यापारिक साझेदार है। ऐसे में उसकी आर्थिक सेहत का संपूर्ण वैश्विव अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना स्वाभाविक है। फिर अगर ऋण किसी के भविष्य से लिया जा रहा है और चीन की महंगी वैश्विक आर्थिक सक्रियता को देखें तो वह वैश्विक भविष्य से उधारी ले रहा है। इसके वित्तीय तंत्र में बढ़ती जटिलताओं को देखते हुए चीनी अर्थव्यवस्था में ऋण पहले ही एक दुष्चक्र बन गया है।

ऋण संकट नई वृद्धि को कुंद कर रहा है जिससे पुराना ऋण चुकाने की क्षमता प्रभावित हो रही है और अधिक ऋण के पुनर्गठन की प्रक्रिया से उसकी अदायगी में भी देरी हो रही है। फिर चीन में युवाओं की घटती आबादी को देखते हुए भविष्य में यह और चिंता बढ़ाएगा। ऐसे में चीन को न केवल अपनी अर्थव्यवस्था के लिए ऋण समस्या को सुलझाना होगा, बल्कि भविष्य की अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भी यह सुनिश्चित करना होगा।

(लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से वीआईएफ का सहमत होना जरुरी नहीं है)

End Notes:

1. IMF Country Report No 17/358: People’s Republic of China, December 2017.
2. https://fortunedotcom.files.wordpress.com/2015/07/bridgewater-greater-ri...
3. Ibid.
4. Zero Hedge: China's Shadow-Lending Ecosystem Could Be As Large As $40 Trillion, PBOC Guesses, Tyler Durden, 10th April 2017,https://www.zerohedge.com/news/2017-10-03/chinas-shadow-lending-ecosyste...
5. Reuters: China bankruptcies rise steadily in 2017 amid 'zombie firm' crackdown, Aug 3, 2017, https://www.reuters.com/article/china-bankruptcy/china-bankruptcies-rise...
6. Economic and Social Survey of Asia and the Pacific 2017: Governance and Fiscal Management, Chapter 2. Perspectives from Sub-regions, http://www.unescap.org/sites/default/files/Chapter2-Survey2017.pdf
7. Reuters: China says framework for state-owned enterprise reform 'basically complete', Sep 28, 2017, Matthew Miller, Fang Cheng,https://www.reuters.com/article/us-china-soe-reforms/china-says-framewor...
8. National Bureau of Statistics of China: Composition of GDP, http://www.stats.gov.cn/tjsj/ndsj/2016/html/0302EN.jpg
9. Xinhua: China to invest big in ‘Made in China 2025’ strategy, Oct 12,2017, http://english.gov.cn/state_council/ministries/2017/10/12/content_281475...
10. US Chamber of Commerce: Made in China 2025- Global Ambitions built on Local Protections, https://www.uschamber.com/sites/default/files/final_made_in_china_2025_r...
11. World Economic Forum: 10 astounding facts to help you understand China today, 24 Jun 2017, Ceri Parker, https://www.weforum.org/agenda/2017/06/10-astounding-facts-to-help-you-u...
12. Xinhua: Economic Watch: China takes new steps to defuse local debt risks, 13 May 2017, http://www.xinhuanet.com/english/2017-07/13/c_136441592.htm


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: http://www.gatewayhouse.in/wp-content/uploads/2016/12/GH_ChinaSriLankaInvstMap-01.png

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