क्या ‘वन बेल्ट वन रोड’ चीन में आर्थिक उथलपुथल ला सकता है?
Prerna Gandhi, Research Associate, VIF

सन 2000 के बाद ही लगातार कई अर्थशास्त्रियों द्वारा चीनी अर्थव्यवस्था में गिरावट के कयास लगाये जा रहे थे. लेकिन इन सभी को गलत साबित करते हुए न केवल चीन की अर्थव्यस्था स्थिर रही बल्कि हाल ही में दस ट्रिलियन डॉलर की कीमत के सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) वाले देशों के समूह में भी शामिल हो गयी है. हालाँकि उस समाजवादी देश में इस बात का अधिक श्रेय, निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने वाली नीतियों को जाता है जिनके कारण बेहतर रूप से संसाधनों का बंटवारा कर पाना संभव हुआ. इसके पश्चात भी चीन के लिए आगे की राह आसान नही है.

छद्म बैंकिंग सेक्टर, जिसपर सरकार की कोई पकड़ नही है, की बढ़त के साथ-साथ यू. एस. फेड्रेअल रिज़र्व रेट में इसकी भेद्दता एवं बढ़ते हुए घरेलू कर्ज के चलते चीन की वित्तीय देनदारी बेहद जटिल होती जा रही है. ऐसे समय में ही चीनी-स्टाइल मार्शल प्लान का एक नमूना पेश करते हुए वन बेल्ट वन रोड (बीआरआई) जैसी महंगी परियोजना को फंड करना चीन के लिए एक व्यावहारिक नीति कतई नही है. इस परियोजना में चीन का निवेश अधिक है, जिसके तहत 2016 की अवधी तक अंतर्राष्ट्रीय एवं घरेलू स्तर पर परियोजनाओं की लागत लगभग पांच सौ बिलियन डॉलर1 है और पूरी तरह से बनने में इस परियोजना में लगभग 4 से 8 ट्रिलियन डॉलर की लागत आएगी. अमेरिका के मार्शल प्लान में केवल एक भू-भाग शामिल था जबकि चीन के बीआरआई में एशिया, अफ्रीका, यूरेशिया, ओशिनिया समेत सात भू-भागों में फैला हुआ है.

चीन की अत्यधिक क्षमताओं का उपयोग करना ही बीआरआई का असल आधार है जिसके साथ ही चीन की ऊर्जा एवं संसाधनों को भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु संरक्षित किया जा सकेगा. लम्बे समय से लगातार बेहतर होती चीन की आर्थिक स्थिति ने मुद्रा का अवमूल्यन करते हुए, बड़ी मात्रा में औद्योगिक अति-क्षमता एवं बड़ी बचत और इसके साथ ही असंतोषजनक पूँजी आवंटन जैसी स्थतियों को जन्म दिया है जिससे नियमित निरिक्षण में गिरावट हुई है. हालाँकि चीन के बाह्य कर्जों की लागत सकल घरेलू उत्पाद का केवल 13 प्रतिशत है फिर भी चीन का यह आंकड़ा अनुमानित डेब्ट-टू-जीडीपी अनुपात का 270 प्रतिशत पहले से ही है. (2016 के आँकड़े).

राज्य के स्वामित्व में सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 115 प्रतिशत बराबर उद्दम है जिनसे देश की वित्तीय स्थिरता कमजोर पड़ सकती है विशेषकर जब राजकोषीय घाटा2 अधिक हो रहा हो. पिछले दशक में चीन को लगभग छोटे-अवधी में किये जाने वाले निवेश एवं बड़े, घरेलू पूँजी निवेश से लगभग 3.8 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था3. धधकती हुई अर्थव्यवस्था को काबू करने के लिए चीन अब निवेश आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर उत्पादकता एवं उपभोगता आधारित अर्थव्यवस्था कि ओर बढ़ रहा है. चीन यह समझता है कि मध्यस्थता पूँजी को रोकने के लिए चीन को आधुनिक तकनीक एवं अन्य उभरते हुए क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा, जैसा की अन्य यूरोपीय देश भी कर रहे है जिससे कि प्रतिद्वंदता में तुलनात्मक रूप से चीन को लागत की कमी हाँसिल हो सके. आज सेवा (50.2प्रतिशत) की चीन के सकल घरेलु उत्पाद में हिस्सेदारी उद्योग (40.2प्रतिशत) से अधिक है4

इस तरह से तकनीक, पूँजी एवं श्रम से परिपूर्ण उद्योग, बेहतरीन आधारभूत संरचना से चीन ने सभी को एक अच्छा मंच उपलब्ध करवाया है जिससे चीन को भी उभरती हुई चुनौतियों से लड़ने में मदद मिलेगी. हालाँकि चीन की अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है कि तीन दशक से भी कम समय में वह ‘विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ बनने के बेहद करीब ही है और यह अपनी दो सदी पुरानी ‘विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यस्व्था’ होने की ख्याति वापस पाना चाहता है. 2009 की प्रथम तिमाही से 2014 के तीसरे तिमाही तक चीन ने अपने सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 139 प्रतिशत बराबर बचत की थी. इससे पूर्व अमेरिका एवं जापान ने भी इस तरह की भारी बचत की थी जिसके पश्चात् वे मंदी के बेहद बुरे दौर से गुज़रे थे.

अमेरिका ने 2002-07 में अपने सकल घरेलू उत्पाद का 58 प्रतिशत बचत किया था. उसके बाद वहां मंदी का बहुत बुरा दौर छाया था. जापान ने भी 1985-90 के बीच अपने जीडीपी के बराबर बचत की थी और उसके पश्चात 20 साल से अधिक समय तक अपस्फीती का दौर देखा था जो घटती हुई सांख्यिकी5 एवं महत्वपूर्ण परिवर्तनों की आवश्यकता की अनदेखी से दीर्घकालिक हो गयी थी. बैंक ऑफ़ इंटरनेशनल सेटलमेंट द्वारा जारी सितम्बर 2016 की रिपोर्ट के अनुसार चीन आने वाले तीन वर्ष में आर्थिक परेशानी से पीड़ित हो सकता है6. अतः चीन की तेजी से बढती हुई आर्थिक वृद्धि से अपरिहार्य वित्तीय विस्फोट टल भी सकता है या बेहद जल्दी भी आ सकता है क्यूंकि अत्यधिक बचत से निवेश की गुणवत्ता में कमी आएगी और इसके साथ ही बड़े मुआवजों के लिए जमानत की आवश्यकता भी पैदा हो जाएगी.

बेल्ट एवं रोड पोर्टल पर दर्ज बीआरआई की प्राथमिकताओं में नीति-सहयोग, सुविधाजनक जुडाव, बेरोकटोक व्यापार, वित्तीय समावेशन एवं व्यक्ति-से-व्यक्ति को जोड़ना शामिल है. मई 2017 में एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र में आधारित संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक आयोग ने अपनी एक स्टडी में दक्षिण-मध्य एशियाई देशों में वित्तीय समस्यायों की चिंता जताई, विशेषकर उन देशों में जहाँ बीआरआई के तहत चीन का कुल निवेश उस देश की अर्थव्यवस्था के लगभग बराबर है. रिपोर्ट कहती है कि,“एक बड़े पैमाने पर आसानी से दिए जाने वाली आधारभूत संरचना से सम्बंधित परियोजनाओं को ऋण अगर विशेष छूट के साथ भी दिए जायेंगे तो उनसे छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश जिनमे वित्तीय बाज़ार अभी अविकसित है और जो ऋण-प्रबंधन7 में कुशल नही है, से उनकी व्यापक अर्थव्यवस्था (मैक्रोइकनोमिक) कमजोर हो सकती है. 2013 में चीन-उज्बेकिस्तान के बीच हुई 15 बिलियन डॉलर की निवेश डील उसके जीडीपी का एक चौथाई भी नही थी. इसी तरह चीन-कजाखस्तान सहयोग समझौता जो 2015 की शुरुआत में तय हुआ था और पाकिस्तान के साथ 46 बिलियन डॉलर का समझौता जो अप्रैल 2015 में तय हुआ था, इन देशों की जीडीपी का एक-पञ्च भाग है. संयुक्त राष्ट्र की एक स्टडी के अनुसार चीन-पाक के बीच प्रतिबद्धता अब 62 बिलियन डॉलर तक पहुँच गयी है. इसके साथ ही चीन और बांग्लादेश के बीच तय हुई 24 बिलियन डॉलर की डील भी बांग्लादेश की जीडीपी8 का लगभग 20 प्रतिशत है88. हो सकता है कि चीन की दिलचस्पी अपनी पूँजी को पुनःनिर्देशित करने तक सीमित हो, पर यदि ऐसा नही होता है और इस ऋण से चीन को उम्मेदानुसार लगान नही मिलता है, तो बीआरआई ऋण चीन के पहले से ही लदी हुई वित्तीय व्यवस्था पर एक और बोझ बनकर रह जायेंगे.

आधारभूत संरचना को ‘नेटवर्क इफ़ेक्ट’ की आवश्यकता है जिससे उन्हें पहले से ही मौजूद आधारभूत संरचना के साथ अधिक जुडाव मिले. इससे अधिकाधिक लोग इसका उपयोग कर सकेंगे और इससे अधिक मात्रा में लगान वसूला जा सकेगा. इससे वाजिब तौर पर नीति-सहयोग की आवश्यकता पैदा हो जाती है. हालाँकि बीआरआई के मसले पर चीन शायद असल भू-राजनीती को अनदेखा करते हुए प्रोत्साहन राशी पर अधिक ध्यान केन्द्रित कर रहा है. इस छूट से लोगों का व्यवहार इस बात से प्रभावित होगा कि उन्हें क्या दिया जा रहा है. प्रोत्साहन राशी आधारित पक्षपात से लोगो को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है की आखिर क्यों अपने निजी हितों से ग्रस्त लोग उस जगह के लोगों के हितों बेहतर करने के लिए अग्रसर है. चीन शायद यह सोचता है कि देश मौद्रिक प्रोत्साहन राशि व् सस्ते ऋणों से प्रभावित होंगे और स्वयं ही चीन की नीतियों का सहयोग करेंगे.

यह भी संभव है की एकल अथवा संस्थागत तौर पर इसका प्रभाव रहे. पर एक देश पर इन सबका प्रभाव इतनी आसानी से नही होता क्यूंकि वहाँ अन्य कारक भी मौजूद होते है. नीति-निर्धारण में शुरुआती स्तर पर भ्रम हमेशा ही बने रहते है और आम तौर पर प्रथम चरण की नीतियाँ अक्सर अधूरी ही होती है. इसलिए ऐसा संभव है की चीन अभी पक्षपाती पुष्टिकरण से ग्रस्त हो या फिर अपने काम की जानकारी को ग्रहण कर अन्य पर ध्यान न देने की आम मनुष्य प्रवर्ती से पीड़ित हो.

निष्कर्ष में, चीन का शीर्ष नेतृत्व आने वाले खतरे के बारे अधिक सतर्क है. हाल ही में, चीन को सभी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं वित्तीय संस्थानों द्वारा चेतावनी मिल चुकी है. मूडी की रेटिंग में भी चीन पिछड़ गया है. इसी वर्ष अप्रैल में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘राष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार कि सुरक्षा’ के विषय पर बैठक बुलाई थी. अब तक के सबसे घाटेदार वर्षों में से एक होने की पुष्टि के एक दिन बाद ही इस बैठक का आयोजन किया गया था. इस बैठक में सेंट्रल बैंक के गवर्नर समेत अन्य महत्वपूर्ण गणमान्य हालाँकि उपस्थित तो थे, परन्तु कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्य निर्धारक मंडल पोलितब्यूरो भी इसमें शामिल था और उन्होंने इन वित्तीय जोख़िमों पर उचित कदम उठाने की बात भी कही, यह इस बात को प्रमाणित करता है कि उनके बीच महत्वपूर्ण स्तर पर इस बात की स्वीकृति बन चुकी है9. 18 अगस्त 2017 को चीनी-स्टेट काउंसिल ने बीआरआई में नकली एवं तर्कहीन निवेश को रोकने के लिए एक नियमावली भी जारी की थी. अब क्यूंकि बीआरआई की चर्चा 2013 से ही जारी है इसलिए इस वर्ष में जून तक के लिए राज्य-अधिकृत चीनी निवेश कंपनी ‘सीनोंश्योर’ द्वारा कई उद्धमों एवं बैंकों को 1.73 बिलियन डॉलर का मुआवज़ा दिया गया है10. बताई गयी यह रकम कम भी हो सकती है क्यूंकि कई बीआरआई की मुख्य परियोजनाएं उम्मीद के अनुसार लगान नही वसूल कर सकीं. जिस नाटकीय ढंग से वेनेजुअला जैसे अमीर देश जिसपर चीन आर्थिक रूप से बेहद मेहेरबान था11, कि अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गयी और पाकिस्तान, जो चीन-पाकिस्तान कोरिडोर से बेहद फायदा लेने की बात सोच रहा है, भी सामानांतर स्थिति में है. इस तरह क्या चीनी नियामक बेल्ट एवं रोड में आने वाली वित्तीय समस्यायों को सुलझा पाएंगे ये तो अब निर्णायक द्वारा ही तय हो पायेगा.

सन्दर्भ:

1. Pricewater Coopers: China and Belt & Road Infrastructure, 2016 review and outlook, February 2017,https://www.pwchk.com/en/consulting/br-watch-infrastructure.pdf
2. Economic and Social Survey of Asia and the Pacific 2017: Governance and Fiscal Management, Chapter 2. Perspectives from Sub-regions, http://www.unescap.org/sites/default/files/Chapter2-Survey2017.pdf
3. Forbes: Why China Lost About $3.8 Trillion To Capital Flight In The Last Decade, February 22, 2017, https://www.forbes.com/sites/insideasia/2017/02/22/china-capital-flight-...
4. National Bureau of Statistics of China: Composition of GDP, http://www.stats.gov.cn/tjsj/ndsj/2016/html/0302EN.jpg
5. South China Morning Post: China’s credit excess is unlike anything the world has ever seen, April 21, 2017,http://www.scmp.com/business/global-economy/article/2089577/can-worlds-l...
6. Reuters: BIS warns China banks risk crisis within three years, September 19, 2016, https://www.reuters.com/article/us-china-banking/bis-warns-china-banks-r...
7. Economic and Social Survey of Asia and the Pacific 2017, Governance and Fiscal Management, Pg. 68,http://www.unescap.org/sites/default/files/publications/Survey%202017-Fi...
8. Economic Times: UN warns about financial risks in China’s One Belt One Road project, May 25, 2017, https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/un-warns-about-financi...
9. Bloomberg: How China Is Tackling Dangers in Its Financial System, October 10, 2017 https://www.bloomberg.com/news/articles/2017-10-09/how-china-is-getting-...
10. China's insurance industry invests RMB700 bln for B&R construction, August 21, 2017, https://eng.yidaiyilu.gov.cn/home/rolling/24203.htm
11. Bloomberg: Is Pakistan China's Venezuela?, November 27, 2017, https://www.bloomberg.com/gadfly/articles/2017-11-27/is-pakistan-china-s...

(लेख में लेखक के निजी विचार हैं और वीआईएफ का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है)


Translated by: Shiwanand Dwivedi
Image Source:
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