नेपाल: जुड़वां शहर का समझौता और जनकपुर एवं अयोध्या के बीच संपर्क
Prof Hari Bansh Jha

पृष्ठभूमि

भारत और नेपाल के लोगों के बीच संबंध अनंत काल से बिना रुके चले आ रहे हैं। दुनिया में दूसरे कोई भी दो देश सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में एक दूसरे से इतने नहीं जुड़े हैं, जितने ये दोनों देश हैं। वास्तव में दोनों देशों के बीच रिश्तों की नींव लगभग दस हजार वर्ष पूर्व रामायण काल के दौरान देवी सीता और भगवान राम के जनकपुर में हुए अनूठे विवाह ने तैयार की थी।

यह तो सर्वविदित है कि देवी सीता की जन्मभूमि जनकपुर मिथिला की राजधानी थी; जबकि भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या अवध की राजधानी थी। तभी से जनकपुर और अयोध्या दुनिया के इस हिस्से में प्रमुख धार्मिक केंद्र बन गए हैं। हर वर्ष नेपाल, भारत और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लाखों लोग इन दोनों स्थानों की तीर्थयात्रा करते हैं।

वास्तव में जनकपुर और अयोध्या हिंदुओं के लिए उतने ही पवित्र हैं, जितने बौद्धों के लिए लुंबिनी तथा बोध गया हैं, ईसाइयों के लिए यरूशलम है और मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना हैं। फिर भी दुख की बात है कि जनकपुर और अयोध्या के विकास के लिए कभी ढंग से प्रयास किए ही नहीं गए हैं। नेपाल में जनकपुर को उतना ही नजरअंदाज किया गया, जितना भारत में अयोध्या को। नेपाल और भारत में कोई भी सरकार इन दोनों आध्यात्मिक केंद्रों के विकास पर गंभीर नहीं रही, हालांकि नेपाल तथा भारत के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध मजबूत करने में उनकी अतुलनीय भूमिका रही है।

किंतु जनकपुर और अयोध्या के आधुनिक इतिहास में इन दोनों सर्वाधिक पवित्र स्थलों के बीच संबंधों में नया मोड़ आया, जब भारत में टीकमगढ़ की रानी वृषभानु ने 1910 में जनकपुर में विश्वप्रसिद्ध जानकी मंदिर का निर्माण कराया। लगभग उसी समय उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी कराया, जिसे कनक भवन भी कहा जाता है। सदियों की अनदेखी के कारण लगभग 1,69,287 की जनसंख्या (2015 में) वाला पवित्र शहर जनकपुर और ऐतिहासिक जानकी मंदिर मच्छरों, जल निकासी की अपर्याप्त सुविधा, कचरा संग्रह और निस्तारण में कुप्रबंधन, कचरा डालने के लिए स्थान की कमी, स्वच्छता का बहुत घटिया वातावरण जैसी विभिन्न नागरिक समस्याओं से जूझ रहा है। जनकपुर को आध्यात्मिक वातावरण देने वाले मंदिरों तथा तालाबों का बुरी तरह अतिक्रमण हो चुका है। तालाब आम तौर पर बहुत अधिक प्रदूषित हैं। कई-कई घंटे तक बिजली जाने के कारण दिक्कतें और भी बढ़ गई हैं। जनकपुर को भारत के सीमावर्ती शहर जयनगर से जोड़ने वाली नेपाल की इकलौती रेलवे लाइन जनकपुर रेलवे अभी तक चालू नहीं हो पाई है। जनकपुर हवाई अड्डे को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे में बदलने के लिए अधिक प्रयास नहीं किए गए हैं। इनसे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और दूरदराज से शहर आने वाले हजारों तीर्थयात्रियों को भी बहुत अधिक असुविधा होती है।

एडीबी की जनकपुर विकास परियोजना

हाल ही में एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने अपनी एकीकृत शहरी विकास परियोजना के अंतर्गत जनकपुर में काम शुरू किया है। दो अरब रुपये की इस विकास योजना में सड़कों, नालियों के निर्माण तथा ठोस कचरा प्रबंधन समेत बुनियादी ढांचे का विकास किया जाएगा। इसके अलावा सामुदायिक विकास कार्यक्रम भी इस परियोजना का एक अंग है। किंतु जनकपुर की आम जनता काम की गति और गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं है।

जुड़वां शहर संबंधी समझौता

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल तथा भारत के बीच पारंपरिक संबधों को मजबूत करने में जनकपुर तथा अयोध्या की भूमिका पहचानी। 25 नवंबर, 2014 को उनकी दूसरी नेपाल यात्रा के दौरान जनकपुर और अयोध्या को जुड़वां शहर के रूप में विकसित करने के लिए दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ। इससे नई आशा जग गई क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति अथवा समाज की आकांक्षा भर नहीं थी बल्कि दुनिया भर में मौजूद 1 अरब से अधिक हिंदू यही चाहते हैं। इस भावना को प्रतिबिंबित करते हुए भारत के भूतल परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जनकपुर और अयोध्या को जोड़ने के लिए “राम जानकी मार्ग” के निर्माण की घोषणा की, जिसके लिए भारत सरकार ने 2,000 करोड़ रुपये आवंटित कर दिए।

जनकपुर और अयोध्या की नगरपालिकाओं को समितियां बनानी थीं, नोडल अधिकारी नियुक्त करने थे, जन प्रतिभागिता का प्रयास करना था और बुनियादी ढांचे, पर्यावरण, आश्रय, शिक्षा, संस्कृति, खेल, जल शोधन, ठोस कचरा प्रबंधन, जन स्वास्थ्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शहरी तथा क्षेत्रीय नियोजन, पर्यटन एवं धरोहर प्रबंधन से जुड़ी विकास गतिविधियां आरंभ करने के लिए देसी तथा विदेशी स्रोतों से धन जुटाना था। इसके अलावा समझौते ने प्रतिनिधिमंडलों के आदान-प्रदान और जनकपुर तथा अयोध्या के बीच संस्थागत स्तर पर संवाद को बढ़ावा देने का प्रावधान भी किया है।

जनकपुर और अयोध्या की नगरपालिकाओं को जरूरी कामों में मदद करने के लिए नेपाल तथा भारत की सरकारों से नियमित बैठकें करने, ‘संयुक्त कार्य योजना’ तैयार करने और परियोजनाएं क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक ‘वित्तीय संसाधन’ जुटाने के लिए कहा गया। दोनों सरकारों से अन्य अंतरराष्ट्रीय शहरों के साथ गठजोड़ के लिए रूपरेखा तैयार करने के लिए संयुक्त प्रयास करने की अपेक्षा भी थी।

तीन वर्ष पहले किए गए जुड़वां शहर संबंधी समझौते का नवीकरण नहीं होता तो वह 24 नवंबर, 2017 को खत्म हो जाता। दुख की बात है कि जुड़वां शहर की जीवंत व्यवस्था स्थापित करने का सपना पूरा करने के लिए पिछले तीन वर्ष में अधिक प्रगति नहीं की गई है।

जनकपुर-अयोध्या संपर्क का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत में इस्लामी और ब्रिटिश शासन के दौरान विदेशी शासकों ने जनकपुर और अयोध्या के महान आध्यात्मिक मूल्यों को नष्ट करने का प्रयास किया। इतिहास गवाह है कि भारत में मुगल शासन के दौरान जनकपुर के मंदिरों को उसी प्रकार निशाना बनाया गया, जिस प्रकार अयोध्या में मंदिर निशाना बने थे। भगवान राम की जन्मभूमि इसका स्पष्ट प्रमाण है। उसी समय से दोनों पक्षों ने जनकपुर तथा अयोध्या के बीच 622 किलोमीटर की दूरी पर सड़कें तथा अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित करने का प्रयास नहीं किया।

समय बीतने के साथ लोग उस रास्ते को ही भूल गए, जिस पर चलकर भगवान राम और महर्षि विश्वामित्र सीता स्वयंवर के लिए जनकपुर पहुंचे थे और जिस मार्ग पर चलकर स्वयंवर के बाद अयोध्या लौटे थे। लेकिन आध्यात्मिकता से ओतप्रोत दो विभूतियों सुर किशोर दास और चतुर्भुज गिरि ने नई शुरुआत की और 1657 में जनकपुर में देवी सीता और भगवान राम की पूजा की वैभवशाली परंपरा उसी स्थान पर दोबारा आरंभ की, जहां आज जानकी मंदिर खड़ा है। उसके बाद से ही जनकपुर के आधुनिकीकरण में तेजी आई।

हाल में भारतीय विद्वान राम अवतार शर्मा को श्रेय दिया जा सकता है, जिन्होंने रामायण से संबंधित ग्रंथों के आधार पर उस रास्ते को तलाशने का बड़ा प्रयास किया, जिस रास्ते से देवी सीता और भगवान राम ने जनकपुर से अयोध्या तक की यात्रा की थी। उस रास्ते पर यात्रा करते समय जिन स्थानों पर वे रुके थे, उनमें से कुछ महत्वपूर्ण स्थानों का उल्लेख उनकी हिंदी पुस्तक ‘जहं जहं राम चरण चलि जाहीं’ में मिलता है, जिसे श्री राम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास ने प्रकाशित किया है। इससे पहले ‘अज्ञेय’ के नाम से विख्यात भारतीय विद्वान सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने इस क्षेत्र में बहुत अधिक योगदान किया।

जुड़वां शहर परियोजना के दूसरे पहलू

जुड़वां शहर परियोजना तब अधिक सार्थक होगी, जब जनकपुर और अयोध्या के बीच संपर्क को सड़कों के अलावा रेल, हवाई मार्ग और ऑप्टिकल फाइबर के जरिये भी विकसित किया जाए। इसके लिए जनकपुर और अयोध्या के बीच दैनिक न सही साप्ताहिक बस सेवा तो बहाल की ही जा सकती है।

यदि दोनों देशों के कुछ अन्य शहरों के अलावा काठमांडू और नई दिल्ली के बीच बस संपर्क हो सकता है तो जनकपुर और अयोध्या के बीच उसी रास्ते पर बस सेवा बहाल क्यों नहीं की जा सकती, जिस रास्ते पर देवी सीता और भगवान राम ने यात्रा की थी। इस बात की पूरी संभावना है कि अधिकतर हिंदू गडकरी द्वारा घोषित राम जानकी मार्ग से होकर दोनों पवित्र शहरों के बीच यात्रा करेंगे। इसके बाद नेपाल और भारत जनकपुर-सीतामढ़ी मार्ग पर भी काम कर सकते हैं, जिससे जनकपुर और अयोध्या के बीच समय और दूरी कम हो जाएगी। इससे सीतामढ़ी नेपाली और भारतीय पर्यटकों के लिए बड़ा तीर्थस्थल बन जाएगा। जब राजा सीरध्वज जनक खेत जोत रहे थे तब सीतामढ़ी में ही सीता प्रकट हुई थीं।

जनकपुर और जयनगर के बीच ब्रॉड गेज रेलवे लाइन अगले कुछ महीनों में पूरी होने की संभावना है। ऐसे में दोनों सरकारें जुड़वां शहरों (जनकपुर और अयोध्या) के बीच सीधी रेल सेवा भी आरंभ कर सकती हैं। अयोध्या में नया हवाई अड्डा बनाकर और जनकपुर हवाई अड्डे पर सुविधाएं बेहतर कर दोनों शहरों के बीच हवाई संपर्क भी विकसित किया जा सकता है। विभिन्न आय वर्गों के तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की जरूरतें पूरी करने के लिए आधुनिक सुविधाओं वाले आश्रम, धर्मशाला, होटल और लॉज भी बनाए जाने चाहिए। जुड़वां शहर परियोजना के अन्य महत्वपूर्ण पहलू हो सकते हैं संचार संपर्क स्थापित करना, दोनों छोरों पर रेडियो/टीवी चैनल खोलना, ब्रॉडबैंड/ऑप्टिकल फाइबर संपर्क स्थापित करना आदि।

जनकपुर और अयोध्या के भीतर तथा आसपास चौड़ी और साफ सड़कों, हरियाली और स्वच्छ मंदिरों, तालाबों तथा नदियों से क्षेत्र में शांति बढ़ जाएगी। साथ ही ‘सीता लीला’ के नियमित प्रदर्शन के अलावा जनकपुर और अयोध्या में संग्रहालय, योग एवं ध्यान केंद्र बनाना भी आवश्यक है। राजा जनक, अष्टावक्र, गार्गी और क्षेत्र के अन्य साधु-संतों के साथ ही सीता माता की जीवनगाथा ‘सीतायन’ और भगवान राम की जीवनगाथा ’रामायण’ पर धार्मिक चर्चा से धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण बनाने में सहायता होगी।

बुनियादी ढांचे तथा संचार की सुविधाएं विकसित होने से जनकपुर-अयोध्या क्षेत्रों में गरीबी कम हो सकती है। जनकपुर और अयोध्या के बीच 622 किलोमीटर लंबी सड़क पर ढेरों तीर्थाटन केंद्र तैयार हो सकते हैं। जनकपुर और अयोध्या के बीच गरीबी से त्रस्त और कमजोर क्षेत्र ऐसी गतिविधियों से आर्थिक रूप से सबसे संपन्न क्षेत्रों में बदल सकता है।

निष्कर्ष

जनकपुर और अयोध्या के बीच संबंध ही नेपाल और भारत के बीच मजबूत सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संबंधों को पुनर्जीवित करने की धुरी होंगे। इसीलिए जुड़वां शहर विकास समझौते को राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और दोनों सरकारों की उदासीनता के कारण खत्म नहीं होने देना चाहिए। इसीलिए यह आवश्यक है कि जनकपुर और अयोध्या के नवनिर्वाचित मेयर नए सिरे से प्रयास करें ताकि जुड़वां शहर विकास समझौते का नवीकरण हो और विभिन्न गतिविधियों पर कामकाज प्रभावी तरीके से आरंभ कर तय समयावधि में पूरा कर लिया जाए। एडीबी के सहयोग वाली परियोजनाओं को जुड़वां शहर की परिकल्पना में समाहित करना चाहिए और बिना देर के क्रियान्वित करना चाहिए।

दोनों शहरों के बीच सभी प्रकार का संपर्क बढ़ने से कृषि, औद्योगिक, व्यापार एवं सेवा क्षेत्रों में वृद्धि की संभावना बढ़ेंगी और इस क्षेत्र में लाखों लोगों को रोजगार के मौके मिलेंगे, जिनसे अंत में जनता का जीवनस्तर ही बेहतर होगा। इन गतिविधियों से दोनों शहर ही नहीं जुड़ेंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती ही नहीं मिलेगी बल्कि नेपाल तथा भारत के बीच अनूठे रिश्ते और भी मजबूत होंगे।

(डॉ. झा नेपाल में सेंटर फॉर इकनॉमिक एंड टेक्निकल स्टडीज के कार्यकारी निदेशक हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक के निजी विचार हैं और वीआईएफ का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है)


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: https://www.columbuslost.com/temples/Rama-Janaki-Temple-in-Janakpur-Nepal/info

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