राष्ट्रपति ट्रंप और येरुशलम
Amb K P Fabian

येरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने और अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से हटाकर येरुशलम ले जाने का राष्ट्रपति ट्रंप का 6 दिसंबर, 2017 का फैसला 1917 की बालफोर घोषणा की याद दिलाता है, जिसने इजरायल देश की स्थापना का रास्ता तैयार किया था। ट्रंप ने पूर्वी येरुशलम को अपनी राजधानी बताने वाले फलस्तीनियों के दावे नजरअंदाज कर दिए हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कई प्रस्तावों का उल्लंघन भी किया है, जिनमें 1980 का वह प्रस्ताव भी शामिल है, जहां इजरायल ने बेसिक येरुशलम लॉ का ऐलान करते हुए कहा था कि येरुशलम उसकी ‘शाश्वत और अखंड राजधानी’ है।

जिस स्थान को उस समय फलस्तीन कहा जाता था, वहां फलस्तीनियों के राजनीतिक अधिकारों की अनदेखी भी बालफोर घोषणापत्र में की गई, जब उन्होंने कहा कि ‘ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा, जिससे फलस्तीन में मौजूद गैर-यहूदी समुदायों के नागरिक और धार्मिक अधिकार के प्रति अथवा किसी भी अन्य देश में यहूदियों को मिल रहे अधिकारों एवं राजनीतिक दर्जे के साथ पक्षपात हो सकता हो।‘ फलस्तीनी उस समय बहुसंख्यक थे, लेकिन उनके लिए ‘गैर-यहूदी समुदाय’ शब्द का प्रयोग उसी यहूदी आंदोलन का हिस्सा था, जो फलस्तीनियों के अस्तित्व से ही इनकार करता है।

पृष्ठभूमि

यह सच है कि इस फैसले के जरिये ट्रंप चुनाव प्रचार के दौरान किया गया अपना एक वायदा पूरा कर रह थे। लेकिन ऐसा वायदा करने वाले वह पहले राष्ट्रपति नहीं हैं। पिछले राष्ट्रपति भी विदेश मंत्रालय को संसद के 1995 के एक प्रस्ताव पर कार्रवाई के लिए अधिक समय देने के मकसद से साल में दो बार छूट पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। वह प्रस्ताव दूतावास को हटाने से संबंधित ही था। यह भी बताया जा चुका है कि विदेश मंत्री टिलरसन और रक्षा मंत्री जनरल मैटिस ने सीईओ के अंदाज में लिए गए ट्रंप के इस फैसले का विरोध किया था।

ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि यदि “दोनों पक्ष राजी हों तो वह अब भी दो देशों के समाधान का समर्थन करते हैं” और उनके फैसले को सीमाओं के निर्धारण के मामले में किसी पूर्वग्रह की तरह नहीं देखा जाए। न तो फलस्तीनियों को और न ही बाकी दुनिया को इस सफाई पर भरोसा हुआ।

6 दिसंबर को हुई घोषणा की पृष्ठभूमि पर नजर डालते हैं। 20 जनवरी, 2017 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के दो दिन के भीतर ही ट्रंप ने अपने 37 साल के दामाद जैरेड कोरी कशनर को राष्ट्रपति के वरिष्ठ सलाहकार के पद पर बिठा दिया। इजरायल और फलस्तीन के बीच पेचीदा विवाद का समाधान निकालने के लिए इजरायल, फलस्तीनी प्रशासन और अन्य पक्षों के साथ बातचीत करने का अधिकार राष्ट्रपति से पाने के बाद अगस्त, 2017 से ही कशनर इस क्षेत्र की यात्रा करते रहे हैं। उन्होंने 32 साल के सऊदी शहजादे मुहम्मद बिन सलमान के साथ वक्त बिताया है और उनके साथ निजी रिश्ते भी बनाए हैं। दोनों को ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक अनुभव नहीं है। वे खुद को रचनात्मक मेधा से भरा मानते हैं और यह भी मानते हैं कि उनमें उम्रदराज नेताओं की घिसी-पिटी सोच से आगे जाने की कूवत है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने यह खबर (3 दिसंबर, 2017) प्रकाशित की थी कि सऊदी शहजादे ने समाधान योजना की जानकारी देने और उस पर रजामंदी लेने के लिए फलस्तीनी नेता महमूद अब्बास को बुलाया है। उस मुलाकात की जानकारी होने का दावा करने वाले लोगों के मुताबिक फलस्तीन को पूर्ण संप्रभुता नहीं मिलेगी, भूमि के अलग-अलग टुकड़े मिलेंगे और पूर्वी येरुशलम उसकी राजधानी नहीं होगा; अब्बास से कहा गया कि नए देश को अच्छा खासा वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा और शायद उन्हें भी ऐसा प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव रखा गया।

अरब सूत्रों ने न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर की पुष्टि कर दी है। 7 नवंबर को महमूद अब्बास को समाधान की उस योजना के बारे में बताया गया, जिस पर कशनर और शहजादे पहले ही राजी हो चुके थे। साथ ही अब्बास से कहा गया कि यदि वे सहमत नहीं होते हैं तो उनके पास इस्तीफा देने का ‘विकल्प’ है। दिलचस्प है कि बेरूत से बुलाए गए लेबनानी प्रधानमंत्री साद हरीरी ने 4 नवंबर को रियाद में ही अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। अपने भाषण में हरीरी ने ईरान को धमकी दी कि उसके “हाथ काट दिए जाएंगे।” जो हरीरी को जानते हैं, उन्हें लगता है कि ऐसे शब्द हरीरी के नहीं हो सकते।

वॉशिंगटन स्थित फलस्तीनी दूतावास ने 18 नवंबर को चेतावनी दी कि यदि फलस्तीनी प्रशासन शांति प्रक्रिया में गंभीरता से हिस्सा नहीं लेता है तो दूतावास बंद हो जाएगा। अजीब बात यह थी कि दूतावास ने महमूद अब्बास के संयुक्त राष्ट्र महासभा में सितंबर, 2017 को दिए गए उस बयान को इसकी वजह बताया था, जिसमें उन्होंने इजरायल को अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय में घसीटने की बात कही थी। प्रमुख फलस्तीनी अधिकारी साएब एरेकात ने जवाब दिया कि यदि दूतावास बंद हो जाता है तो वे अमेरिका की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे। इसके बाद दूतावास बंद करने की कवायद रोके जाने के संकेत मिले। लेकिन दूतावास पर अब भी तलवार लटक रही है।

अमेरिकी संसद के निचले सदन ने 5 दिसंबर को एकमत से टेलर फोर्स कानून पास कर दिया, जिसके अनुसार यदि फलस्तीनी प्रशासन इजरायल द्वारा मारे गए अथवा अपराधी करार दिए गए फलस्तीनी लड़ाकों के परिवारों को वेतन देता है तो उसे मिलने वाली वित्तीय सहायता 2018 से 2024 के बीच बंद कर दी जाएगी। टेलर फोर्स पूर्व सैन्य अधिकारी थे, जिनकी 2016 में इजरायल में यात्रा करते समय हत्या कर दी गई थी।

हम मोटा-मोटा निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ट्रंप ने महमूद अब्बास पर सामने रखी गई शर्तें स्वीकार करने के लिए दबाव डाला और घोषणा करने से पहले वह उनकी स्वीकृति का इंतजार कर रहे थे। उस सूरत में अब्बास अड़े रहे और ट्रंप ने यह ऐलान कर दिया।

अमेरिका का राजनयिक रूप से अलग-थलग पड़ना

अमेरिका को पहले से अंदाजा रहा हो या न रहा हो, वह करीब-करीब पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया है। 15 सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद में अमेरिका को वीटो का इस्तेमाल करना पड़ा क्योंकि बाकी 14 सदस्यों ने उस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था, जिसमें येरुशलम में दूतावास स्थापित करने के किसी भी निर्णय को “अमान्य” करार दिया गया है। महासभा में केवल सात देशों (ग्वाटेमालला, होंडुरास, मार्शल आईलैंड्स, माइक्रोनेशिया संघ, नौरू, पलाऊ और टोगो) ने अमेरिका और इजरायल के पक्ष में मतदान किया। सातों की कुल जनसंख्या ही केवल 3.47 करोड़ है। अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि निकी हेली ने सदस्य देशों को सार्वजनिक रूप से धमकी दी थी और कुल 56 सदस्यों का मतदान से दूर रहना या अनुपस्थित रहना बताता है कि धमकी का कुछ सदस्य देशों पर तो असर हुआ।

कशनर को शहजादे से समर्थन का वायदा मिला हो या न मिला हो, दोनों पवित्र मस्जिदों के संरक्षक शाह सलमान के पास ट्रंप के कदम का विरोध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। अरब लीग और इस्लामिक सम्मेलन संगठन (ओआईसी) ने कड़ा विरोध जताया। किंतु पता चला है कि अरब लीग में मतभेद है। सऊदी अरब समेत कुछ सदस्य ट्रंप के साथ अधिक कठोरता के पक्ष में नहीं हैं।

सड़कों से स्पष्ट जवाब मिल रहा है। सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला केवल अरब देशों तक सीमित नहीं रहा है। इंडोनेशिया और मलेशिया में भी भारी विरोध प्रदर्शन हुए हैं और मलेशिया में तो स्वयं प्रधानमंत्री नजीब रजाक ने उनका नेतृत्व किया है। गाजा में मरने वालों की संख्या 16 हो चुकी है।

भारत की प्रतिक्रिया
भारत अपने इसी सैद्धांतिक रुख पर अड़ा रहा कि येरुशलम की स्थिति का निर्णय दोनों पक्षों के बीच समझौते से होना चाहिए और इसीलिए उसने संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। प्रधानमंत्री नेतन्याहू जल्द ही भारत आने वाले हैं। प्रधानमंत्री मोदी जल्द ही रामल्ला जा सकते हैं।

आगे क्या?

अमेरिका ऐसा मानता है कि विरोध प्रदर्शन अधिक समय तक नहीं चलेंगे; सऊदी अरब उसके साथ है; फलस्तीन मुक्ति संगठन पर कम संप्रभुता वाले देश के लिए सहमत होने का दबाव डाला जा सकता है। पूर्वी येरुशलम का छोटा सा हिस्सा संभवतः फलस्तीन मुक्ति संगठन को संतुष्ट कर देगा, जो सऊदी अरब और अन्य देशों की वित्तीय सहायता पर बुरी तरह निर्भर है। सऊदी अरब के लिए फलस्तीनियों के लिए लड़ने के बजाय है ईरान के साथ लड़ाई में इजरायल का समर्थन पाना ज्यादा जरूरी है।

यह लगभग निश्चित हो सकता है कि सऊदी शहजादे ने बातचीत में कशनर की योजना स्वीकार कर ली हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि सऊदी अरब येरुशलम मसले पर ट्रंप का खुला समर्थन कर सकता है। ट्रंप का निर्णय ईरान के खिलाफ सऊदी-इजरायल गठबंधन के रास्ते में आ सकता है। शहजादे को इजरायल की यात्रा का सार्वजनिक न्योता दिया जा चुका है। दोनों देशों के बीच खुफिया सहयोग बढ़ रहा है। शहजादे की इजरायल यात्रा में अभी समय लगेगा।

सऊदी अरब में शहजादे ने अमेरिका के उपरोक्त विश्लेषण से रजामंदी जता दी होगी, लेकिन यह समझना अहम है कि येरुशलम पूरी तरह से फलस्तीनी मसला नहीं है। माना जाता है कि पैगंबर येरुशलम से ही स्वर्ग गए थे और 1.5 अरब मुसलमानों के लिए पवित्र शहर के ऊपर इजरायल की संप्रभुता स्वीकार करना मुश्किल होगा। येरुशलम ईसाइयों के लिए भी पवित्र है। 1947 की संयुक्त राष्ट्र योजना में शहर को अंतरराष्ट्रीय दर्जा दिया जाना सही ही था।

महमूद अब्बास ने कहा है कि अमेरिका अब निष्पक्ष मध्यस्थ की तरह काम नहीं कर सकता। उनका कहना सही है, लेकिन इस बात में संदेह है कि अमेरिका कभी निष्पक्ष मध्यस्थ था। जॉन मेयर्सहाइमर ने 2007 में अपनी पुस्तक द इजरायली लॉबी एंड यूएस फॉरेन पॉलिसी में साबित किया है कि क्षेत्र में अमेरिका की नीतियों पर इजरायल का ही असली नियंत्रण होता है। इसीलिए अमेरिका निष्पक्ष हो ही नहीं सकता।

मोरसी को सत्ता से बाहर करने वाले 2003 के सैन्य तख्तापलट के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड की ताकत कम होने लगी थी, लेकिन ट्रंप के कदम से उसे राजनीतिक लाभ होगा। जॉर्डन में ब्रदरहुड विरोध प्रदर्शनों में आगे रहा और ये दस साल में सबसे बड़े प्रदर्शन थे। ब्रदरहुड के अलावा इस्लामिक स्टेट के लिए भी नई भर्तियां करना आसान होगा। आईएस ने इराक और सीरिया में अपने कब्जे वाले कमोबेश सभी इलाके गंवा दिए हैं, लेकिन विचारधारा के रूप में यह पूरी दुनिया में कुछ युवाओं के लिए आकर्षक बना हुआ है। फलस्तीनी विद्रोह कर सकते हैं और अब्बास को अपना पद गंवाना पड़ सकता है। सर्वेक्षण बताते हैं कि 53 प्रतिशत समर्थन हमास के नेता इस्माइल हानी को प्राप्त है और अब्बास के पास केवल 41 प्रतिशत समर्थन है।

भावी घटनाक्रम इस बात पर निर्भर करेगा कि इस्लामी दुनिया के हिस्से पर अमेरिका की पहल का कितना विरोध होता है, सऊदी-ईरान टकराव किस दिशा में जाता है, वृहत्तर इजरायल परियोजना समेत इजरायल का अपना दीर्घकालिक एजेंडा कैसा होता है। भू-राजनीतिक आसमान पर बादल छाए हैं और तूफान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

(राजदूत के पी फैबियन भारतीय विदेश सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और पश्चिम एशिया से संबंधित विषयों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ हैं)

(ये लेखक के निजी विचार हैं और वीआईएफ का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है)


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source; https://southfront.org/us-president-may-recognize-jerusalem-as-israels-capital-next-week/

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