एशिया-अफ्रीका वृद्धि गलियारा: क्या इससे पलटेगी बाजी?
Neha Sinha, Research Associate, VIF

एएजीसी दृष्टि पत्र – उत्पत्ति और इसके निर्माण के पीछे की संस्थाएं?

अफ्रीकी विकास बैंक (अफडीबी) की गांधीनगर, गुजरात में संपन्न 52वीं वार्षिक बैठक के दौरान 24 मई, 2017 को जापान और भारत के समर्थन वाले एशिया-अफ्रीका वृद्धि गलियारे (एएजीसी) से पर्दा हटाया गया। दृष्टि पत्र को तीन एजेंसियों – (i) द रिसर्च एड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (आरआईएस), नई दिल्ली; (ii) द इकनॉमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस एंड ईस्ट एशिया (ईआरआईए), जकार्ता तथा (iii) इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपिंग इकोनॉमीज जापान एक्सटर्नल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (आईडीई-जेटरो), टोक्यो ने मिलकर तैयार किया (मौलिक पाठक, लाइव मिंट, 2017)। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अफडीबी की उद्घाटन वार्षिक बैठक में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने जापान और भारत के समर्थन वाले एएजीसी पर जोर दिया, जिसका आह्वान चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट, वन रोड (ओबोर) परियोजना आरंभ होने के कुछ दिन बाद ही हुआ। एएजीसी एशिया और अफ्रीका में अवसरों और आकांक्षाओं का खाका है, जिसे इस धारणा के साथ आरंभ किया गया है कि यह स्वास्थ्य एवं औषधि, कृषि तथा कृषि प्रसंस्करण, आपदा प्रबंधन एवं कौशल उन्नयन में विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता देगा।

एएजीसी का विचार सबसे पहले प्रधानमंत्री और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे द्वारा नवंबर, 2016 में जारी संयुक्त बयान में आया था। 2016 में अपनी जापान यात्रा के दौरान श्री नरेंद्र मोदी और शिंजो अबे ने एशिया और अफ्रीका के बीच संपर्क सुधारने पर बहुत जोर दिया। दोनों ने मुक्त एवं खुले एशिया-प्रशांत क्षेत्र को केंद्र में रखा, जो क्षेत्र में संपन्नता लाने में बड़ी भूमिका निभाता है। अफ्रीका में सहयोग एवं साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए भारत-जापान संवाद के महत्व पर भी जोर दिया गया, जिसका लक्ष्य दोनों नेताओं के प्रयासों के साथ प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे एवं संपर्क के क्षेत्र में विशेष संयुक्त परियोजनाओं की संभावनाएं तलाशना है। इसके अलावा उन्होंने एशिया एवं अफ्रीका में औद्योगिक गलियारों तथा औद्योगिक नेटवर्क के विकास को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर एवं सहयोग करते हुए काम करने की अपनी मंशा भी प्रकट की।

क्या ओबोर का जवाब है एएजीसी?

एएजीसी परामर्श के स्तर की पहल है, जो समुद्री गलियारा है, जबकि ओबोर जमीनी गलियारा है। कहा जाता है कि एएजीसी अफ्रीका को भारत और दक्षिण पूर्व एशिया एवं ओशनिया के अन्य देशों से जोड़ेगा। इस पहल को “विशिष्ट पहल” माना जा रहा है, जो लाभप्रद और भरोसेमंद होगी और ओबोर परियोजना के ‘सरकारी रकम पर चलने वाले मॉडल’ से उलट सलाह-मशविरे की प्रक्रिया से निकली है। एएजीसी उस धुरी पर बना है, जिसमें व्यापार एवं आर्थिक संबंधों पर जोर देने के बजाय अफ्रीका की जनता को केंद्र में रखा गया है और यह बात बताए जाने की जरूरत है।

भारत ने चीन की महत्वाकांक्षी ओबोर परियोजना में शामिल होने से इनकार कर दिया। इस कार्यक्रम में भी आपस में जोड़ने का लक्ष्य है, लेकिन इसमें यूरेशियाई देशों तथा व्यापारिक सहयोगों में वृद्धि पर अधिक जोर दिया गया है। अब भारत ने जापान के सहयोग से एएजीसी की अपनी योजना का खुलासा कर दिया है। चीन को अब भी ओबोर के जरिये अफ्रीकी बाजार में अधिक पैठ बनाने की उम्मीद है (देवांशी दवे, पृष्ठ 1, 2017)। किंतु भारत के पास अफ्रीका में बड़ा व्यापार एवं नेटवर्क अनुभव है और जापान के पास अधिक विकसित तकनीक है। साथ ही गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचा प्रदान करने की जापान की क्षमता इस गलियारे के विकास में प्रमुख भूमिका निभाएगी। यह गठजोड़ चीन को बाजार में हिस्सेदारी के लिए तगड़ी टक्कर देगा। दूसरी ओर जापान प्रस्तावित वृद्धि गलियारे में लगभग 200 अरब डॉलर के निवेश का वायदा करने को तैयार है। इस वर्ष सितंबर में इसकी घोषणा होने की अपेक्षा है। जापान अफ्रीका में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में लगभग 32 अरब डॉलर का निवेश पहले ही कर चुका है (मौलिक पाठक, पृष्ठ 2, 2017)।


Image source: http://indianexpress.com/article/explained/to-counter-obor-india-and-japan-propose-asia-africa-sea-corridor-4681749/

इस वर्ष सितंबर में जापानी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान एएजीसी पर और भी जानकारी मिलेगी। दृष्टि पत्र के मुताबिक पहली नजर में यही लगता है कि अगला कदम परियोजना के लिए ‘दृष्टि अध्ययन’ की तैयारी करना है, जिसके लिए आरआईएस में अनुसंधान सहायता इकाई स्थापित की जाएगी। इकाई 2017 और 2018 के बीच एएजीसी अध्ययन की तैयारी करेगा। रिपोर्ट 2018 में भारत और जापान सरकार तथा अन्य नेताओं एवं नीति निर्माताओं को सौंपी जाएगी।

माना जा रहा है कि इस पहल में जन केंद्रित सतत वृद्धि रणनीति का ब्योरा होगा, जो एशिया और अफ्रीका में विस्तृत मशविरे के जरिये तैयार होगा। दृष्टि पत्र के अनुसार एएजीसी के चार प्रमुख स्तंभ हैं: (अ) क्षमता एवं कौशल वृद्धि; (आ) गुणवत्ता भरा बुनियादी ढांचा एवं संस्थागत संपर्क; (इ) विकास एवं सहयोग परियोजनाएं; और अंत में, (ई) जन सहभागिता। दृष्टि पत्र में सहयोग के कई क्षेत्र भी दिए हैं। डिजिटल संपर्क एशिया तथा अफ्रीका के बीच नई तकनीक एवं सेवाओं के विकास में सहायक होगा। ध्यान रहे कि इस पहल के अंतर्गत एशिया के पास वृद्धि और विकास के अपने अनुभव अफ्रीका के साथ साझा करने की अकूत संभावना है। एएजीसी में पांच प्रमुख बिंदु हैंः (अ) वित्तीय संसाधनों का प्रभावी उपयोग; (आ) उन्हें साझेदार देशों एवं क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक विकास एवं विकास संबंधी रणनीतियों के अनुरूप बनाना; (इ) पर्यावरण एवं समाज पर पड़ने वाला प्रभाव कम करने के लिए स्थापित अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने में उच्च मानदंड प्रयोग करना; (ई) आर्थिक क्षमता एवं टिकाऊपन, समावेश, सुरक्षा एवं आपदा से जूझने की क्षमता, सातत्य और सुविधा तथा सेवाओं के पहलुओं का पूरा ध्यान रखते हुए बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता प्रदान करना; और (उ) स्थानीय समाज एवं अर्थव्यवस्था में योगदान करना।

एएजीसी का मॉडल देशों के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में निवेश कर उन देशों का विकास करने पर जोर देता है। निवेश का ऐसा दर्शन सभी के लिए लाभकारी होता है; इसमें दूसरे देशों की सहायता कर लाभ प्राप्त करना होता है। एएजीसी से भारत को विश्व बाजार में अपनी स्थिति सुधारने का शानदार अवसर मिलेगा। इसके अलावा चीन की अर्थव्यवस्था मंदी से जूझ रही है, इसलिए एएजीसी की दृष्टि के साथ भारत को लाभ मिलने की उम्मीद है। फिलहाल तीनों क्षेत्रीय अनुसंधान एजेंसियां एएजीसी परियोजना को सुधारने के लिए लगातार योजना बना रही हैं। इस सितंबर में जब जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत आएंगे तो इस योजना पर आगे की चर्चा की जाएगी। लेकिन देर-सबेर यह योजना भारत के लिए वैश्विक अथव्यवस्था में प्रतिस्पर्द्धा का नया चरण आरंभ कर देगी।

अफ्रीकी महाद्वीप में चीन की उपस्थिति

अफ्रीकी महाद्वीप चीनी सरकार के लिए बहुत आकर्षक ठिकाना है। 2015 में अफ्रीका में सबसे तेज विकास करने वाली पांच अर्थव्यवस्थाएं संसाधनों में समृद्ध थीं, जिसमें इथोपिया, आइवरी कोस्ट और रवांडा के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में क्रमशः 10.2 प्रतिशत, 8.8 प्रतिशत और 7.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी प्रकार 2016 में सेनेगल जैसे देशों ने 7.5 प्रतिशत विकास दर दर्ज की और इथोपिया (8 प्रतिशत), केन्या (6.5 प्रतिशत) तथा तंजानिया (7 प्रतिशत) की वृद्धि दर भी शानदार रही। अफ्रीकी अर्थव्यवस्था पर चीनी प्रभाव का अंदाजा अफडीबी शिखर बैठक में जारी 2017 के अफ्रीकन इकनॉमिक आउटलुक से लगाया जा सकता है, जिसमें बताया गया था कि चीन अब भी अफ्रीकी माल का प्रमुख उपभोक्ता है और अफ्रीका के वैश्विक निर्यात में उसकी 27 प्रतिशत हिस्सेदारी है। चीन अफ्रीका में नए निवेश में भी अगुआ है; 2015-16 में उसने 38.4 अरब डॉलर (कुल नए निवेश का 24 प्रतिशत) का भारी भरकम निवेश किया था। उसकी तुलना में भारत ने उसी वर्ष 64 नई परियोजनाओं में केवल 2.2 अरब डॉलर (कुल नए निवेश का 1.3 प्रतिशत) निवेश किया गया था (अविनाश नायर, इंडियन एक्सप्रेस, 2017)। 2014 में अफ्रीका ने भारत के निर्यात में 11 प्रतिशत और आयात में 9 प्रतिशत योगदान किया था। 2010 से अफ्रीका के लिए भारत के निर्यात और भारत में वहां के आयात में क्रमशः 93 प्रतिशत तथा 28 प्रतिशत वृद्धि हुई। इस बीच भारत के कुल निर्यात में अफ्रीका की हिस्सेदारी 8.1 प्रतिशत से बढ़कर 10.9 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2014 में भारत 40 अरब डॉलर आयात के साथ अमेरिका को पछाड़ते हुए यूरोपीय संघ और चीन के बाद तीसरा अफ्रीकी व्यापारिक साझेदार बन गया। (https://www.tralac.org/news/article/8371-africa-india-facts-and-figures-...) सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 में अफ्रीका के व्यापार ने भारत के कुल व्यापार में 9.4 प्रतिशत योगदान किया था। उसने 758 अरब डॉलर में 71.65 अरब डॉलर का योगदान किया था। देश के आयात में अफ्रीका का योगदान 8.7 प्रतिशत रहा था यानी 447.96 अरब डॉलर में 38.8 अरब डॉलर (पांडातिल और किशोर, फर्स्ट पोस्ट, 2017)। अफ्रीका के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन का 2015 में अफ्रीका में कुल व्यापार लगभग 179 अरब डॉलर रहा, जबकि जापान का अफ्रीका के साथ व्यापार 24 अरब डॉलर था (अल जजीरा, 2016)। इस तरह हम देख सकते हैं कि भारत और चीन की तुलना में अभी जापानी निवेश बहुत कम है।

एएजीसी में जापान और भारत का योगदान

एएजीसी प्राचीन समुद्री मार्ग को फिर तलाशकर और अफ्रीकी महाद्वीप को भारत एवं दक्षिण एशियाई तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से जोड़ने वाले नए समुद्री गलियारे बनाकर “मुक्त एवं खुला एशिया-प्रशांत क्षेत्र” तैयार करने का प्रयास है। परियोजना में शामिल पक्षों को उम्मीद है कि समुद्री गलियारे जमीनी गलियारों की तुलना में ‘सस्ते’ होंगे और उनमें ‘कार्बन उत्सर्जन’ भी कम होगा। उदाहरण के लिए एएजीसी के अंतर्गत जामनगर (गुजरात) तथा अदन की खाड़ी में जिबूती बंदरगाहों को जोड़ने की योजना है। उसी प्रकार मोंबासा (केन्या) तथा जंजीबार (तंजानिया) के बंदरगाहों को मुदरै (तमिलनाडु) के निकट बंदरगाहों से एवं कोलकाता को सित्वे बंदरगाह (म्यांमार) से जोड़ा जाएगा।

समुद्री गलियारों के विकास के अलावा एएजीसी में एशिया और अफ्रीका के देशों के बीच वृद्धि के केंद्रों में मजबूत संस्थागत, औद्योगिक एवं परिवहन बुनियादी ढांचा बनाने का भी प्रस्ताव है। इसके पीछे विचार है एशिया और अफ्रीका में अर्थव्यवस्थाओं को एकीकरण हेतु साथ मिलकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी आर्थिक गुट तैयार करने के योग्य बनाना। परियोजना में जापान अपनी अत्याधुनिक तकनीक एवं गुणवत्ता भरा बुनियादी ढांचा बनाने की क्षमता के जरिये योगदान करेगा, जबकि भारत अफ्रीका में काम करने का अपना कौशल साथ लाएगा। दोनों देशों के निजी क्षेत्रों से अपेक्षा है कि वे अफ्रीका में बुनियादी ढांचा, बिजली अथवा कृषि-व्यापार परियोजनाओं के लिए संयुक्त उपक्रम और गठबंधन बनाने हेतु साथ आएंगे और बड़ी भूमिका निभाएंगे। भारत और जापान के अलावा दक्षिण अफ्रीका, मोजांबिक, इंडोनेशिया, सिंगापुर और ऑस्ट्रेजिया ने भी विचार प्रक्रिया में अपने प्रतिनिधि भेजे। चीन के बारे में पूछने पर ईआरआईए की महानिदेशक अनीता प्रकाश ने कहा कि उनके संगठन ने आसियान क्षेत्र और चीन समेत छह अन्य देशों का प्रतिनधित्व किया। उन्होंने बताया कि उसके अलावा इस परियोजना पर काम करने वाले चीनी विद्वान भी ईआरआईए के साथ जुड़े हैं (अविनाश नायर, इंडियन एक्सप्रेस, 2017)।

एएजीसी दृष्टि पत्र पर अफ्रीकी राष्ट्रों की प्रतिक्रिया

अफ्रीकी विकास बैंक ने एएजीसी दृष्टि पत्र का स्वागत किया है। अफ्रीका और एशिया के बीच व्यापारिक गलियारा हमेशा से ही रहा है, इसलिए एएजीसी और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि बुनियादी ढांचा महंगा है और बुनियादी ढांचे की हर जगह जरूरत है। ऐसे विशेष क्षेत्र होंगे ही, जहां बुनियादी ढांचा बनाया जाना है। अफडीबी के अध्यक्ष अकिनवुमी अदेसिना ने भी गांधीनगर में वार्षिक बैठक में दिलचस्पी दिखाई और बताया कि अफ्रीकी महाद्वीप के भीतर वृद्धि गलियारों पर उन्होंने पहले ही काम शुरू कर दिया है।

कुछ अधिकारियों ने कहा है कि एएजीसी से जुड़ी आर्थिक, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक साझेदारी की वर्तमान मांगों और चुनौतियों की फेहरिस्त तैयार करने के लिए और अध्ययन किए जाएंगे। इससे इस परियोजना की राह में खड़ी चुनौतियों और बाधाओं का पता चल जाएगा। इससे सतत वृद्धि और विकास तथा सर्वोत्तम तौर-तरीकों के आदान-प्रदान का सहयोगात्मक पक्ष भी सामने आएगा। इन सभी पक्षों के आधार पर एएजीसी के भावी अध्ययन भारत तथा जापान की सरकारों एवं अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया एवं ओशनिया की सरकारों को यह साझेदारी गहरी करने का रास्ता सुझाएंगे (अविनाश नायर, इंडियन एक्सप्रेस, 2017)। एएजीसी के निर्माण की राह पर कैसे बढ़ा जाए, इसका आगे का विवरण या तो जुलाई में तब दिया जाएगा, जब हैम्बर्ग (जर्मनी) में जी-20 देशों के सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे से मुलाकात करेंगे या तब दिया जाएगा, जब सितंबर में भारत जापानी प्रधानमंत्री की मेजबानी करेगा।

निष्कर्ष

भारत-अफ्रीका फोरम के 2015 के सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने 10 अरब डॉलर के द्यण की घोषणा की थी, जिसने अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों में नए नजरिये की शुरुआत की। इससे न केवल अफ्रीकी देशों में परियोजनाओं के लिए धन मिला बल्कि क्षमता निर्माण एवं शिक्षा में भी योगदान हुआ। भारत अफ्रीका में पांचवां सबसे बड़ा निवेशक है और पिछले 20 वर्ष में 54 अरब डॉलर से अधिक का निवेश उसने किया है, जिससे अफ्रीकी नागरिकों को लाखों की संख्या में रोजगार मिला है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अफडीबी की वार्षिक बैठक का उद्घाटन करते हुए यह भी कहा था कि अफ्रीका में विकास में सहायता के लिए भारत अमेरिका तथा जापान के साथ काम कर रहा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया था कि उनकी सरकार ने अफ्रीका को विदेश एवं आर्थिक नीति के लिहाज से सर्वाधिक वरीयता प्रदान की है। इसलिए एएजीसी दृष्टि अध्ययन के साथ परियोजना के विकास के लिए व्यापक खाका तैयार होगा, जिससे भारत, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया और ओशनिया के साथ अफ्रीका का एकीकरण कर उसके आर्थिक लाभ के भौगोलिक सिम्युलेशन मॉडल का निर्माण होगा।

यह मानना समझदारी होगी कि अफ्रीका और दक्षिण एशियाई क्षेत्र के विकास के लिए भारत-जापान धुरी से दोनों महाद्वीप एक दूसरे के और करीब आ जाएंगे। स्वाभाविक है कि बुद्धिजीवी एएजीसी को ओबोर के खिलाफ भारत-जापान का उपक्रम मानेंगे, लेकिन ऐसा सोचना इसमें शामिल सभी पक्षों के समग्र एवं सर्वांगीण सामाजिक-आर्थिक विकास के उस विचार के साथ अन्याय होगा, जो विचार इसमें निहित है और जो एएजीसी का केंद्र है।

संदर्भ

1. अल जजीरा, 2016, http://www.aljazeera.com/news/2016/08/japan-pledges-invest-30bn-africa-1... .
2. “एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडॉर लॉन्च्ड“, द टाइम्स ऑफ इंडिया, टीएनएन, 25 मई, 2017.
3. दीपनयन चौधरी (26 मई, 2017)। “इंडिया, जापान कम अप विद एएजीसी टु काउंटर चाइनाज ओबोर”, द इकनॉमिक टाइम्स.
4. देवांशी दवे, “द ग्रोथ कॉरिडॉरः इंडियाज फ्यूचर विद एशिया एंड अफ्रीका”, द इंडियन इकनॉमिस्ट, 29 मई, 2017.
5. अवनीश नायर, “टु काउंटर ओबोर, इंडिया एंड जापान प्रपोज एशिया-अफ्रीका सी कॉरिडॉर”, द इंडियन एक्सप्रेस, 31 मई, 2017.
6. मौलिक पाठक, ‘इंडिया-जापान पार्टनरशिप टु प्ले की रोल इन एशिया-अफ्रीका कॉरिडॉर’, लाइव मिंट, 25 मई, 2017.
7. ऋतम वोरा, “एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडॉरः विजन डॉक्युमेंट फोकसेज ऑन इनक्लूजिविटी”, बिजनेस लाइन, 24 मई, 2017.
8. http://www.ptinews.com/news/8728761_Modi-bats-for-Asia-Africa-growth-cor...
http://www.livemint.com/Politics/gfSbaVJjfHuoUKPTMxrU8L/IndiaJapan-partn...
http://www.financialexpress.com/economy/vision-document-for-asia-africa-...
https://www.tralac.org/news/article/8371-africa-india-facts-and-figures-... .
9. राजेश पांडातिल और किशोर कदम, 2017, “नाइजीरिया इज इंडियाज टॉप अफ्रीकन पार्टनरः इंडिया-अफ्रीका ट्रेड एक्सप्लेन्ड इन 65 ग्राफिक्स”, फर्स्ट पोस्ट, 2017.


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: http://www.gujaratglobal.com/wp-content/uploads/2017/05/Gandhinagar028.jpg

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
4 + 0 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.
Contact Us