भारत-अमेरिका असैन्‍य परमाणु संधि के भविष्‍य का आकलन
Vijay K. Sazawal, Ph.D.

परिचय

इतिहास 2015 को भारत-अमेरिका असैन्‍य परमाणु वाणिज्‍य के संबंध में जारी चर्चाओं की सफलता के वर्ष के रूप में दर्ज करेगा। राष्‍ट्रपति बराक ओबामा पिछले वर्ष भारतीय गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष अतिथि थे। उसकी पूर्व संध्‍या (25 जनवरी 2015) को दोनों देशों के प्रमुखों ने नई दिल्‍ली में घोषणा की कि दोनों देशों ने असैन्‍य परमाणु संधि पर प्रगति की राह में अड़ रहे दो सबसे विवादित मुद्दों पर समझौता कर लिया है। ये दोनों मुद्दे थे – भारतीय संसद द्वारा 2010 में पारित किया गया भारतीय परमाणु दायित्‍व कानून तथा दोनों देशों द्वारा 2008 में किए गए भारत-अमेरिका असैन्‍य परमाणु संधि से जुड़ी ‘’प्रशासनिक व्‍यवस्‍थाएं’’। नई दिल्‍ली में मिली महत्‍वपूर्ण सफलता ने इस बात की उम्‍मीद बढ़ा दी कि दो अमेरिकी परमाणु आपूर्तिकर्ता (वेस्टिंगहाउस तथा जनरल इलेक्ट्रिक) भारत को तीसरी पीढ़ी से आगे के सर्वसुविधासंपन्‍न आधुनिक लाइट वाटर रिएक्‍टर की बिक्री के लिए न्‍यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआईएल) के साथ गंभीरता से बातचीत आरंभ करेंगे।

किंतु अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं की फौरी प्रतिक्रिया बहुत अच्‍छे अर्थों में सतर्कता भरी और खराब अर्थों में सर्द रही। जनरल इलेक्ट्रिक ने नए घटनाक्रम में न के बराबर दिलचस्‍पी दिखाई और वेस्टिंगहाउस ने कुछ बयान दिए, जो सकारात्‍मक लग रहे थे। वेस्टिंगहाउस का पहले ही एनपीसीआईएल के साथ करार था, जो 2013 में किया गया था और जिसके अनुसार आरंभिक कार्य किया जाना था और उसे 2015 के अंत तक समाप्‍त किया जाना था। किंतु रिएक्‍टर निर्माण परियोजना पर गंभीर चर्चा आरंभ करने के लिए वास्‍तव में उनकी ओर से बिल्‍कुल उत्‍साह नहीं दिखा।

यदि 2015 की पहली छमाही में असैन्‍य परमाणु वाणिज्‍य की राह में संस्‍थागत बाधाएं कम हो गईं तो दूसरी छमाही ने राजनीतिक गतिशीलता प्रदान की, जिससे वेस्टिंगहाउस को गंभीरता के साथ वाणिज्यिक बातचीत करनी पड़ी। वास्‍तव में यह नजरिया 2015 के पतझड़ में बदला था, जब 22 सितंबर को वाशिंगटन में भारत और अमेरिका की पहली सामरिक एवं वाणिज्यिक वार्ता हुई और उसके कुछ दिन बाद (24 सितंबर को) इस लेखक ने वाशिंगटन के प्रमुख विचार मंच स्‍कूल ऑफ एडवांस्‍ड इंटरनेशनल स्‍टडीज (एसएआईएस) में एक प्रस्‍तुति दी, जिसमें मैंने भारत तथा एनपीसीआईएल के बीच परमाणु सौदे पर सफल बातचीत का खाका दिया था1 और अंत में 28 सितंबर को न्‍यूयॉर्क में मोदी-ओबामा शिखर वार्ता संपन्‍न हुई।

इन उच्‍चस्‍तरीय संवादों के कारण संपर्क समूह की अगली बैठक, जो प्रधानमंत्री मोदी की सितंबर 2014 की अमेरिका यात्रा के बाद असैन्‍य परमाणु मुद्दों का समाधान तेज गति से करने के लिए दोनों सरकारों द्वारा तय की गई थी, महत्‍वपूर्ण साबित हुई क्‍योंकि इसमें अमेरिकी रिएक्‍टर भारत को बेचने के सौदे को अंतिम रूप देने के दोनों पक्षों (अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं एवं एनपीसीआईएल) के प्रयास दोगुने हुए।

संधि के लिए लक्षित दिनांक तय करना

दोनों देशों के राजनयिकों और टेक्‍नोक्रेटों वाले संपर्क समूह की बैठक 24 नवंबर 2015 को वाशिंगटन में हुई। कुछ वार्ताओं में दोनों पक्षों के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडलों के साथ उद्योग प्रतिनिधियों ने हिस्‍सा लिया। हालांकि बैठक के बाद किसी प्रकार के प्रेस बयान नहीं थे किंतु बैठक का एक उद्देश्‍य दोनों वाणिज्यिक पक्षों (अमेरिकी परमाणु आपूर्तिकर्ता एवं भारतीय परमाणु इकाई) को यह जताना था कि सौदा करने के लिए उन्‍हें अपने प्रयास दोगुने करने होंगे और 24 जनवरी 2015 को हुए महत्‍वपूर्ण समझौते के बाद पनपी सद्भावना को बेकार नहीं होने देना है। यह कहा गया कि नई रिएक्‍टर परियोजना को सितंबर 2016 तक ‘’शुरू करने की अवस्‍था’’ में लाने के लिए दोनों वाणिज्यिक पक्षों को समय से समझौते कर लेने चाहिए। वेस्टिंगहाउस ने चुनौती तुरंत स्‍वीकार की, प्रधानमंत्री मोदी की 31 मार्च 2016 की अगली अमेरिकी यात्रा के साथ अपनी अपेक्षाओं को जोड़ा और आशा व्‍यक्‍त की कि ऐसी यात्रा से दोनों पक्षों को सौदा समय पर पूरा करने के लिए आवश्‍यक राजनयिक एवं तकनीकी सहारा मिलेगा।

इसके बाद वेस्टिंगहाउस ने अपनी भारतीय साझेदार लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) के साथ काम करने के लिए एक तकनीकी एवं सौदे पर बातचीत करने वाले दल को मुंबई भेजा ताकि फरवरी 2016 के अंत तक एनपीसीआईएल के सामने पेश करने के लिए विस्‍तृत प्रस्‍ताव तैयार किया जा सके। भारत ने भी प्रस्‍ताव में 6 (2 के बजाय) रिएक्‍टर शामिल करने के वेस्टिंगहाउस के अनुरोध पर स्‍वीकृति दे दी, जिससे वेस्टिंगहाउस को कीमत का ऐसा मॉडल तैयार करने का अवसर दिया, जिससे लागत कम रखी जा सकेगी।

दिसंबर 2015 के दूसरे सप्‍ताह में अमेरिकी परमाणु उद्योग के प्रतिनिधिमंडल की भारत यात्रा के दौरान ये अपेक्षाएं सार्वजनिक तौर पर व्‍यक्त की गई थीं। दौरे पर आए अमेरिकी प्रतिनिधमंडल के समक्ष भारत में अमेरिकी राजदूत, वेस्टिंगहाउस के सीईओ तथा भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा दिए गए विभिन्‍न बयानों ने इस धारणा को मजबूत किया कि या तो वाशिंगटन में 2016 के परमाणु सुरक्षा सम्‍मेलन के दौरान, जिसकी मेजबानी राष्‍ट्रपति ओबामा करेंगे और प्रधानमंत्री मोदी की जिसमें आने की योजना है अथवा उसी के आसपास किसी समय वेस्टिंगहाउस तथा एनपीसीआईएल परमाणु रिएक्‍टर आपूर्ति समझौते के संदर्भ में बड़ी घोषणा करेंगे।

फिर क्या हुआ?

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 31 मार्च से 1 अप्रैल 2016 के बीच वाशिंगटन में परमाणु सुरक्षा सम्मेलन हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने इसमें हिस्सा लिया। हालांकि वेस्टिंगहाउस ने फरवरी 2016 के अंत तक एनपीसीआईएल को प्रस्ताव देने का अपना वायदा पूरा कर लिया था किंतु मोदी की यात्रा के दौरान वेस्टिंगहाउस और एनपीसीआईएल ने रिएक्टर आपूर्ति समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए। वास्तव में सम्मेलन से कुछ दिन पहले यह स्पष्ट हो गया था कि वाशिंगटन में एनपीसीआईएल में से कोई नहीं होगा बल्कि परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के प्रमुख समेत कुछ चुनिंदा व्यक्ति होंगे। इसका अर्थ था कि वेस्टिंगहाउस के प्रस्ताव में बहुत अधिक खामियां थीं, जिन्हें 31 मार्च की अंतिम समयसीमा तक सही नहीं किया जा सका।

परमाणु ऊर्जा सम्मेलन के उपरांत वेस्टिंगहाउस के सीईओ डैनी रोडरिक ने सार्वजनिक बयान दिया कि उन्हें अपनी कंपनी तथा एनपीसीआईएल के बीच परमाणु समझौता जून 2016 तक पूरा हो जाने की उम्मीद है। उसी समय 7 और 8 जून को प्रधानमंत्री मोदी वाशिंगटन की आधिकारिक यात्रा पर जाएंगे। ऐसी उपलब्धि को विशेष रूप से दिखाने के लिए यह उपयुक्त मौका होगा और इससे दोनों पक्षों को खामियां दूर करने के लिए अधिक समय मिलेगा। लेकिन इस बात की उत्सुकता तो होगी ही कि वेस्टिंगहाउस तथा एनपीसीआईएल के बीच जून में होने वाला समझौता क्या इतना विस्तृत होगा कि उससे दोनों में सितंबर तक सौदे पर हस्ताक्षर करने का भरोसा उत्पन्न हो जाएगा, जिस सौदे के बाद निर्माण परियोजना 2016 के अंत तक “शुरुआत के लिए तैयार” हो जाएगी।

सौदे की पड़ताल

परमाणु सौदे सामान्य रूप से जटिल होते हैं। भारत में वह जटिलता कई गुना बढ़ जाती है। संस्थागत एवं परियोजना से संबंधित ढेरों पहलू होते हैं, जिन्हें बड़ी जिग्सॉ पहेली की तरह एक दूसरे के साथ जोड़ना होता है। संस्थागत पहलुओं में राज्य एवं केंद्रीय एजेंसियों से मंजूरी तथा अनुमति प्राप्त करना, एनपीसीआईएल द्वारा जमीन का अधिग्रहण, बहुतस्तरीय नियामकीय प्रक्रिया के जरिये रिएक्टर की डिजाइन, निर्माण एवं परिचालन का प्रमाणन आदि शामिल हैं। परियोजना से संबंधित पहलुओं में कार्य का विस्तृत विश्लेषण, दायित्वों का विभाजन, ठेके की शर्तें एवं नियम, परियोजना लागत का निर्धारण, वित्तपोषण समेत परियोजना की आूपर्ति की लागत तथा अन्य संबंधित पहलू शामिल हैं, जैसे तकनीकी-वाणिज्यिक प्रस्ताव से संबंधित एनपीसीआईएल का कारोबारी मॉडल। यदि कुडनकुलम में रूसी वीवीईआर रिएक्टर अथवा जैतापुर में फ्रांस के ईपीआर रिएक्टर को भारत में बातचीत की स्थिति का नमूना मानें तो ऐसा लगेगा कि इस प्रकार के सौदों की बातचीत पूरी होने में कम से कम तीन वर्ष और कभी-कभी इससे भी अधिक समय लगता है।

तो क्या वेस्टिंगहाउस साल भर के भीतर एनपीसीआईएल के साथ बातचीत पूरी कर सकता है? आशावादी व्यक्ति कह सकता है कि कुछ भी संभव है क्योंकि वेस्टिंगहाउस-एलएंडटी प्रस्ताव टर्नकी यानी तैयारशुदा परियोजना होगी। रोडरिक सार्वजनिक रूप से यह कहना पसंद करते हैं कि वह एक दशक से भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं किंतु वह यह नहीं बताते हैं कि सितंबर 2012 में वेस्टिंगहाउस में आने से पहले वह एक प्रतिस्पर्द्धी कंपनी के लिए काम करते थे, जो ऐसे रिएक्टर की डिजाइन बेचती है, जो बनाया ही नहीं गया है। किंतु यह सच है कि वेस्टिंगहाउस और एनपीसीआईएल भारत को एपी-1000 रिएक्टर बेचने के लिए 2009 से ही मिलते और बात करते रहे हैं, जब भारत ने अमेरिकी रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं को पूरी परियोजना का ठेका देने के लिए स्थानों की घोषणा की तथा वेस्टिंगहाउस को गुजरात में मीठी विरदी आवंटित किया गया। उस समय मीडिया में अटकलें थीं कि अमेरिकी आपूर्तिकर्ता ने एनपीसीआईएल को लागत तथा शुल्क के जो पहले अनुमानित आंकड़े दिए हैं, वे एनपीसीआईएल एवं डीएई द्वारा भविष्य में अपेक्षित लक्षित आंकड़ों से लगभग दोगुने हैं। उसके बाद 2010 में भारतीय संसद ने परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम (सीएलएनडीए) पारित कर दिया तथा अमेरिका में राजनेताओं, नीति निर्माताओं तथा अमेरिकी परमाणु आपूर्तिकर्ताओं समेत सभी का ध्यान भारतीय उत्तरदायित्व कानून में खामियां बताने पर केंद्रित हो गया तथा उनमें से प्रत्येक ने सीएलएनडीए में परिवर्तन से पहले आगे बढ़ने से एक तरह से इनकार कर दिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि भारत को अमेरिकी रिएक्टरों की आपूर्ति के मसले पर 2010 और 2015 के बीच बहुत कम सार्थक चर्चा हुई। केवल एक अपवाद रहा, जिसमें एनपीसीआईएल सद्भावना दिखाते हुए साइट की लाइसेंसिंग से संबंधित “आरंभिक कार्य” के लिए वेस्टिंगहाउस को 2013 में 1 करोड़ डॉलर का ठेका देने के लिए सहमत हो गई।

अनिश्चितता भरे इस समय में वेस्टिंगहाउस से जुड़े दो समानांतर घटनाक्रम हो रहे थे। पहले घटनाक्रम में वेस्टिंगहाउस चेक गणराज्य में रिएक्टर के नए अवसर तलाश रही थी, जहां सीईजेड इकाई तेमेलिन में दो नए रिएक्टर लगाने की योजना बना रही थी। चयन प्रक्रिया दो रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं पर टिक गई। वेस्टिंगहाउस और रोसातोम अंतिम चरण में अपनी-अपनी सरकारों के समर्थन के साथ जूझ रही थीं। अपनी वाणिज्यिक पेशकश को आकर्षक बनाने के लिए वेस्टिंगहाउस ने स्थानीयकरण को बढ़ावा देने, लागत कम करने और अपनी पेशकश को अधिक सार्वजनिक स्वीकृति दिलाने के मकसद से स्थानीय चेक आपूर्तिकर्ताओं के साथ कई समझौते कर लिए। उस समय डीएई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने निजी तौर पर मुझे बताया था कि जिस चेक गणराज्य में ठेका हासिल करने की संभावना केवल 50 प्रतिशत है, वहां वेस्टिंगहाउस ने कितने अधिक मार्केटिंग और राजनीतिक संसाधन झोक दिए हैं, जबकि भारत में कंपनी को पहले ही इकलौते आपूर्तिकर्ता के रूप में ठेका मिल गया है, फिर भी यहां उसके मार्केटिंग और जनसंपर्क के प्रयास नहीं के बराबर हैं।

अंत में सीईजेड ने 2014 में खरीद रद्द कर दी ओर यह संकेत दिया कि दोनों आपूर्तिकर्ताओं ने अस्वीकार्य कीमतें लगाई हैं। हालांकि रद्द करने से पहले वेस्टिंगहाउस और रोसाटम को दो बार अपनी पेशकश में संशोधन करने का मौका दिया गया था। तेमेलिन का मौका हाथ से जाने के बाद वेस्टिंगहाउस को चीन में चल रही रिएक्टर परियोजना और भारत तथा ब्रिटेन में नए रिएक्टरों की बिक्री के मौकों का ही सहारा रह गया।

उसी समय आम जनता और वैश्विक वित्तीय बाजारों को इस बात का भान नहीं था कि वेस्टिंगहाउस का स्वामित्व रखने वाली तोशिबा भारी वित्तीय संकट से गुजर रही है। इस बात का खुलासा 2015 में हुआ और ऐसा लगा कि वेस्टिंगहाउस की खरीद से ही वह संकट में फंसी। तोशिबा ने वेस्टिंगहाउस को 2006 में भारी भरकम कीमत (5.4 अरब डॉलर) में खरीदा था और बाद में पता चला कि चीन में वेस्टिंगहाउस की एपी-1000 परियोजना खराब दौर से गुजर रही है। तोशिबा ने बट्टे खाते में गए 1.3 अरब डॉलर के घाटे को छिपाया, जो वेस्टिंगहाउस को 2012 (92.6 करोड़ डॉलर) और 2013 (40 करोड़ डॉलर) में हुए थे और जिन्हें छिपाने के लिए शुद्ध लाभ को 1.3 अरब डॉलर बढ़ाकर बताया गया। (ध्यान रहे कि इन घाटों के अलावा वेस्टिंगहाउस 2007 के बाद से 8 वर्ष में औसतन लाभ में ही रही है।) इस कारण तोशिबा के पूरे नेतृत्व को हटा दिया गया और कंपनी में बाजार तथा जनता का भरोसा बहाल करने के लिए नए अधिकारी नियुक्त किए गए। तोशिबा ने 2012 में वेस्टिंगहाउस का प्रबंधन भी बदल दिया, जब डैनी रोडरिक को नए सीईओ के रूप में नियुक्त किया गया। इससे पता चलता है कि 2007 से 2015 तक तोशिबा बहुत अनिश्चितता और बेचैनी के दौर से गुजरी, जब उसका वित्तीय घाटा आखिरकार सार्वजनिक कर दिया गया। इससे यह भी पता चलता है कि तोशिबा अथवा वेस्टिंगहाउस ने 2009 में भारत सरकार द्वारा गुजरात का परियोजना स्थल आवंटित किए जाने के बाद भी भारतीय अवसर के बारे में इतना धीमा एवं सतर्कता भरा रवैया क्यों अपनाया। दिलचस्प है कि इन दिनों भारत से खरीद का कोई भी ठेका हासिल करने वेस्टिंगहाउस द्वारा की गई प्रगति की सकारात्मक खबरें तोशिबा का शेयर भाव थोड़ा बढ़ा देती हैं। स्पष्ट है कि तोशिबा द्वारा भारत को वेस्टिंगहाउस एपी-1000 रिएक्टर बेचे जाने का वित्तीय बाजार पूरे उत्साह के साथ स्वागत करेंगे।

सौदा पक्का करना

क्या सौदा वक्त पर यानी जनवरी 2017 में राष्ट्रपति बराक ओबामा का कार्यकाल पूरा होने से पहले पक्का किया जा सकेगा? सैद्धांतिक रूप से कुछ भी संभव है। व्यावहारिक नजरिये से मुझे इस बात पर संदेह है कि आज और जनवरी 2017 के बीच की छोटी सी अवधि में ‘’शुरू करने की अवस्‍था’’ वाले यानी शॉवल रेडी समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। अगर सभी संस्थागत एवं परियोजना संबंधी औपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं तो भी मुझे नीचे दिए गए चार क्षेत्र ऐसे विवादित मुद्दे लगते हैं, जिनका समाधान 2017 की समयसीमा पूरी करने के लिए निर्धारित समय के भीतर संभवत: नहीं हो सकेगा।

1. टर्नकी ठेका: हालांकि वेस्टिंगहाउस ने ही आरंभ में ऐसे तरीके पर जोर दिया था, लेकिन उन्हें अचंभा भी था कि एनपीसीआईएल ने उनकी सलाह कितनी जल्दी मान ली। एनपीसीआईएल ने ऐसा शायद कुडनकुलम 1 और 2 रिएक्टरों के निर्माण में हुए अनुभव के कारण किया, जहां निर्माण के प्रबंधन की जिम्मेदारी एनपीसीआईएल ने ली थी। उस अनुभव ने एनपीसीआईएल की क्षमताओं पर प्रश्न खड़े किए क्योंकि उससे पहले उसने दूसरी पीढ़ी के प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) की बेहद छोटी परियोजनाएं हाथ में ली थीं और तीसरी पीढ़ी के काफी बड़े रूसी एलडब्ल्यूआर रिएक्टर को बनाने में उसे तकनीकी दक्षता तथा संसाधनों में बड़ी वृद्धि करनी पड़ी। एपी-1000 तीसरी पीढ़ी से भी आगे की और भी बड़ी डिजाइन है और इसकी डिजाइन तैयार करने एवं निर्माण की पूरी जिम्मेदारी वेस्टिंगहाउस-एलएंटी को सौंपकर एनपीसीआईएल ने संभवत: दूरदर्शिता ही दिखाई किंतु इस व्यवस्था में नुकसान यह है कि एनपीसीआईएल इन रिएक्टरों में इस्तेमाल किए गए हजारों छोटे पुर्जों की कीमतों को नहीं जांच पाएगी और कीमत के अनुसार हुए परिवर्तनों, स्थानीयकरण एवं लागत कम करने के अन्य प्रयासों को विस्तार से नहीं समझ पाएगी, जिन प्रयासों के कारण ही भारत में बने रिएक्टर दुनिया में सबसे सस्ते रिएक्टर साबित हुए हैं।

लब्बोलुआब यह है कि यदि रिएक्टर आपूर्तिकर्ता ऐसा तकनीकी वाणिज्चिक प्रस्ताव बना सकता है, जो एनपीसीआईएल की वित्तीय जरूरतों तथा शुल्क संबंधी लक्ष्य पर खरा बैठता है तो सौदा पक्का हो जाएगा। लेकिन ऐसे लक्ष्यों पर इतने कम समय में बातचीत करना असंभव न सही मुश्किल तो होगा ही।

रिपोर्ट बताती हैं कि यदि विदेशी रिएक्टर की लागत 20 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट से अधिक नहीं होती है तो एनपीसीआईएल अपना कारोबारी मॉडल बदले बगैर ही उससे बनी बिजली पर शुल्क का लक्ष्य प्राप्त कर लेगी। कुडनकुलम 3 और 4 रिएक्टरों में रोसातोम के साथ बातचीत में ऐसी कीमत पर सहमति बन गई थी। लेकिन बाजार का जायजा लेने पर पता चलता है कि भारतीय रिएक्टरों के लिए रूसी कंपनी द्वारा तय की गई कीमत अन्य से ली जा रही कीमत के मुकाबले काफी कम है। इसका अर्थ है कि भारत को किसी ने किसी वजह से विशेष कीमत प्राप्त हुई थी। वास्तव में मेरा विश्लेषण बताता है कि सबसे अधिक प्रतिस्पर्द्धी कीमत चीनी कंपनियां देती हैं और 60 साल तक टिकने लायक डिजाइन वाले उनके तीसरी पीढ़ी से आगे के नवीनतम रिएक्टर (एचपीआर-1000) की कीमत बेहद आशावादी है, जो 23 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट से 26 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट के बीच रखी गई है। मैं आशावादी शब्द का प्रयोग करता हूं क्योंकि “हुआलोंग वन” रिएक्टर अभी तक पूरी तरह नहीं बनाया गया है और असली लागत इससे अधिक हो सकती है। (इसकी तुलना में अमेरिका के जॉर्जिया राज्य में वॉग्टल न्यूक्लियर पावर स्टेशन में निर्माणाधीन दो नए एपी-1000 रिएक्टरों की लागत 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने की संभावना है।) इसलिए जिस लागत की अपेक्षा है और जो लागत प्राप्त हो सकती है, उसके बीच का अंतर पाटने के लिए वेस्टिंगहाउस और एनपीसीआईएल को कड़ी मेहनत करनी होगी। एनपीसीआईएल को अपने कारोबारी मॉडल में अड़ियलपन दूर कर आपूर्तिकर्ताओं के बराबर जोखिम उठाना होगा। इस तरह डीएई अथवा एनपीसीआईएल पर राजनीतिक दबाव डालकर ठेका हासिल करने का मंसूबा पालने वाले किसी विदेशी आपूर्तिकर्ता को भी यह सबक किलेगा कि अतीत में ऐसे तरीके कारगर साबित नहीं हुए हैं और भविष्य में भी इनके कारगर होने की संभावना नहीं है।

2. वित्त पोषण: किसी परियोजना की लागत तय करने के लिए वित्तपोषण यानी रकम की व्यवस्था करना महत्वपूर्ण होता है। यह स्पष्ट है कि भारत अमेरिका के निर्यात-आयात बैंक (एक्जिम) से मिलने वाली सरकारी सहायता प्राप्त विदेशी खरीदार वित्तीय सहयोग प्राप्त करना चाहेगा। इसके अलावा यह मानने के भी ठोस कारण हैं कि तोशिबा जापान बैंक ऑफ इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जेबीआईसी) से वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकता है यद्यपि अधिकतर मामलों में जेबीआईसी एक्जिम के निर्णयों के अनुरूप ही फैसले लेता है।

किंतु एक्जिम फिलहाल ऊहापोह में फंसा है। अमेरिकी संसद ने एक बार एजेंसी के अधिकार पत्र (चार्टर) को समाप्त हो जाने दिया था और हालांकि बाद में उसे उबार लिया गया, लेकिन एजेंसी 1 करोड़ डॉलर से अधिक की नई परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देने के बारे में कोई निर्णय नहीं ले सकती क्योंकि उसके निदेशक मंडल में समुचित कार्य करने के लिए पर्याप्त संख्या में सदस्य ही नहीं हैं। ओबामा प्रशासन आवश्यक न्यूनतम संख्या सुनिश्चित करने के लिए तीसरे निदेशक की नियुक्ति हेतु कठिन परिश्रम कर रहा है किंतु अभी तक अमेरिकी कांग्रेस का रवैया असहयोगात्मक रहा है। इसीलिए इस समय और संभवतः अगले कुछ महीनों में भी एक्जिम 1 अरब अर्थात् 100 करोड़ डॉलर का कोई भी ऋण मंजूर नहीं कर सकता।

एक्जिम से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए खरीदार को अमेरिकी आपूर्तिकर्ता की कुल लागत का 15 प्रतिशत हिस्सा पहले ही नकद में अदा करना होता है, उसके बाद बैंक बाकी 85 प्रतिशत रकम आसान दरों पर देता है। अंत में एनपीसीआईएल ने वेस्टिंगहाउस के साथ 6 रिएक्टर का सौदा किया हो सकता है किंतु व्यावहारिक रूप से पहले चरण में निर्माण की वास्तविक परियोजना में 1 या 2 रिएक्टर ही शामिल होंगे और यह भी इस बात पर निर्भर करेगा कि एनपीसीआईएल 15 प्रतिशत नकद भुगतान के लिए अपने खजाने से, भारतीय राजकोष से या बाजार से उगाहकर कितनी रकम दे सकती है। यदि लागत के लिहाज से लाभ की बात की जाए तो पहले 1 या 2 रिएक्टर अंतिम रिएक्टर की तुलना में महंगे पड़ेंगे अर्थात् किसी को (भारतीय करदाताओं को?) पहले कदम की अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ेगी।

परमाणु उत्तरदायित्व का मुद्दा जोखिम से और इसीलिए वित्त पोषण से करीब से जुड़ा है। पहले परिचालक (एनपीसीआईएल) और फिर देसी कंपनियों समेत आपूर्तिकर्ताओं को परमाणु उत्तरदायित्व नीति उपलब्ध कराने की तारीख के मामले में भारत बार-बार चूक चुका है। भारतीय परमाणु बीमा कोष (आईएनआईपी) को संभालने वाले जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया से ताजा सूचना यह है कि एनपीसीआईएल को अगले 2 या 3 हफ्तों में पॉलिसी जारी कर दी जाएगी। यह स्पष्ट नहीं है कि पॉलिसी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर भी लागू होगी या नहीं।

3. भूमि अधिग्रहण: एनपीसीआईएल ने अभी तक गुजरात के मीठी विरदी में जमीन का अधिग्रहण नहीं किया है। भारत में उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण बहुत भावनात्मक मुद्दा है और औद्योगिक भूमि का अधिग्रहण मुश्किल भी है और धीमा भी। गुजरात सरकार जमीन को एनपीसीआईएल के नाम कर देती है तो भी इसमें कोई संदेह नहीं कि किसानों से लेकर परमाणु विरोधी कार्यकर्ताओं तक नागरिक समाज से फौरन कानूनी चुनौतियां सामने आएंगी, जिनसे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि निर्माण आरंभ होने से पहले लंबी मुकदमेबाजी चलेगी।

4. भारत-जापान असैन्य परमाणु संधि: 2008 में अमेरिका-भारत असैन्य परमाणु संधि होने के बाद से ही भारत-जापान समझौते पर काम चल रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो जापानियों विशेषकर सांसदों को आपत्ति हैं। जापान की चिंताएं दूर करने के लिए भारत ने सभी यत्न किए हैं और अमेरिका ने भी इस सौदे के प्रति समर्थन जताया है। किंतु जब से तोशिबा ने टोक्यो में अपना राजनीतिक प्रभाव आजमाना शुरू किया तब से स्थितियां बदल गईं। हाल ही में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने संधि पर सहमति जता दी किंतु औपचारिक हस्ताक्षर होने से पहले इस पर जापानी संसद में मतदान होना है तथा मंजूरी मिलनी है। इस साल की पहली छमाही में ऐसा हो सकता है किंतु देर भी हो सकती है।

वेस्टिंगहाउस-एनपीसीआईएल वित्तीय समझौता पूरा होने के लिए भारत-जापान संधि महत्वपूर्ण है। ऐसा केवल इसीलिए नहीं है कि वेस्टिंगहाउस की स्वामी कंपनी जापानी है बल्कि इसलिए भी है क्योंकि भारतीय एपी-1000 परियोजना के लिए कई पुर्जे जापान में ही तैयार होंगे।

अंत में मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि वेस्टिंगहाउस और एनपीसीआईएल भारत को एपी-1000 रिएक्टर बेचने का सौदा पक्का करने में अच्छी प्रगति कर रहे हैं। यह बात इसी से साबित होती है कि जून 2016 में समझौते पर हस्ताक्षर होने हैं। किंतु दोनों पक्षों द्वारा अंतिम “शॉवल रेडी” समझौते पर हस्ताक्षर से पहले कुछ प्रमुख बाधाएं दूर की जानी हैं। वह अंतिम परिणाम कुछ ही महीनों में नहीं मिल सकता किंतु मुझे विश्वास है कि देर-सवेर ऐसा हो ही जाएगा। भारत-अमेरिका रणनाीतिक साझेदारी में असैन्य परमाणु समझौता प्रमुख पहलू है और बना रहेगा।

संदर्भ

1. https://www.sais-jhu.edu/content/getting-it-putting-momentum-behind-us-i...

लेखक इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी कंसल्टिंग, वॉशिंगटन, डीसी से जुड़े हैं।


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Published Date: 9th May 2016, Image Source: http://www.en.wikipedia.org
(Disclaimer: The views and opinions expressed in this article are those of the author and do not necessarily reflect the official policy or position of the Vivekananda International Foundation)

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