70 वर्ष पश्चात् भारत-रूसी संस्कृतियों के जुड़ावों की ख़ोज

सेंट पीटर्सबर्ग का ऐतिहासिक शहर हाल ही में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद यानी इंडियन काउंसिल फ़ॉर कल्चरल रिलेशन (आईसीसीआर) द्वारा आयोजित तृतीय इन्डोलोजिस्ट संगोष्ठी का आयोजन स्थल बना। वर्ष 2015 से ही, भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद इस तरह की संगोष्ठियों का नियमित रूप से आयोजन कर रहा है। इस वर्ष इस संगोष्ठी का आयोजन रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में 26 अप्रैल से 28 अप्रैल 2018 तक सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी और आईसीसीआर के संयुक्त तत्वाधान में किया गया था।

इस वर्ष संगोष्ठी का विषय ‘इंडोलॉजी के परिपेक्ष्य में भारत और रूस: भूत, भविष्य एवं वर्तमान’ रहा। पिछले वर्ष मई-जून में संपन्न 18वें भारत-रूस वार्षिक सम्मलेन के घोषणापत्र में ही इस संगोष्ठी का आयोजन यहाँ होना तय हुआ था। घोषणापत्र में यह भी कहा गया था कि भारत और रूस दोनों ही देशों ने हर संभव स्तर पर, शांति और सुरक्षा बनाये रखने वाले कदम उठाये है और यह जरूरी है की ये देश वैश्विक आधारभूत संरचना का विकास इस तरह से करें जिसके माध्यम से सांस्कृतिक एवं सभ्यताओं की विविधता की झलक मिलने के साथ ही मानवता द्वारा एकता की शक्ति को भी प्रदर्शित किया जा सके। भारत-रूस सम्बन्ध कठिन समय में भी टिके रहें है और बाह्य तत्वों से हमेशा रूबरू रहें हैं। इस बात का प्रमाण हमें तब देखने को मिला जब रूसी इंडोलॉजी की प्रदर्शनी के दौरान अन्य यूरोपीय इंडोलॉजी की तरह इस बात का प्रचार करने की अथवा यह साबित करने की कोशिश नहीं की गयी कि भारतीय मूल के लोग रूसी मूल से किसी भी रूप से कमतर अथवा हीन हैं। रूसी शोधार्थी, भारत और उसकी संस्कृति को समझने में काफ़ी दिलचस्पी रखतें हैं और भारत से आये शोधार्थियों को अपने समतुल्य ही मानते है। उद्घाटन सत्र में अपने उद्बोधन के दौरान आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने भी कहा कि यह नवीन इंडोलॉजी का समय है और इस संगोष्ठी के दौरान यह प्रमाणित भी हो गया की रूस इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है।

इस संगोष्ठी की रूपरेखा तय करने का कार्य शैक्षणिक संचालक एवं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध अधिष्ठान के निदेशक, डॉ. अनिर्बान गांगुली ने किया। इसमें रूसी शोधार्थियों के पेपर्स को एकत्र करने का दायित्व सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी की डॉ. एना चेल्नोकोवा ने बखूबी निभाया। भारत-रूस संबंधों से परिचित डॉ. ततिअना शौम्यान, प्रोफेसर पुराबी रॉय, डॉ. अशोक गजानन मोदक, प्रोफेसर बोरिस ज़खार्यीन, प्रोफ़ेसर इरिना ग्लुश्कोवा, प्रोफ़ेसर नीलाक्षी सूर्यनारायण एवं अन्य विशिष्ट अध्येता जैसे प्रोफ़ेसर मकरंद परंजपे, प्रोफेसर संतीश्री पंडित, डॉ. उत्तम के सिन्हा, प्रोफ़ेसर पी कनागासबापथी व कई मध्य-प्रारंभिक शोधार्थ, विशेष प्रतिनिधी मंडल का हिस्सा थे। वक्ताओं ने भारत-रूस की भू-राजनीति, रणनीतिक सम्बन्ध, रक्षा, संस्कृति, भाषा, धर्म, साहित्य समेत अन्य विषयों पर अपने विचार रखे।

कई पेपर्स में इंडोलॉजी के इतिहास की कड़ियाँ रूस की शाखाओं से जुडी हुई मिली। रूसी शिक्षा प्रणाली में कई वर्ष पहले से ही भारतीय भाषाओँ पर काफ़ी निवेश किया जाता रहा है, जिसमें न केवल संस्कृत बल्कि तमिल, तेलेगु, बंगाली, हिंदी, मराठी आदि भी शामिल है। कई अतिथियों ने गेरसिम लेबेदेव जैसे रूसियों का जिक्र किया जिन्होंने भारत का भ्रमण किया और उसके बारे में लिखा जबकि कई अतिथियों ने टैगोर जैसे भारतियों के बारे में बात की जिन्होंने रूस का भ्रमण किया और/या उसके बारे में लिखा। इस के माध्यम से एक तरह से प्रधानमंत्री द्वारा पिछले वर्ष दिए गये उस बयां की पुष्टि हो गयी जिसमें कि उन्होंने कहा था, “भारत-रूस के सम्बन्ध संस्कृति से सुरक्षा तक के मसलों पर जुड़े हुए हैं।” भारतीय एवं विदेशी शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत किये गये कई पेपर्स में भारत और रूस के सांस्कृतिक संबंधों के विषय में विस्तार से बताया गया। इस बात को भी दोहराया गया की अब समय आ चुका है की भारत और रूस न केवल आधिकारिक तौर पर बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव के स्तर पर भी अपने संबंधों को पुनः स्थापित करनें के पुरजोर प्रयास करें।

सभी ने यह माना कि भारत-रूस के सम्बन्ध काफी खास है और सांसारिकता एवं उपयोगितावाद को छोड़ दें तो दोनों देशों के बीच एक बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं मानवीय सम्बन्ध है। यह भी महसूस किया गया की भारतियों के प्रति रूसी मेजबानी, औपचारिक नहीं बल्कि बेहद आत्मीय थी।

यह जानकर सभी को ख़ुशी हुई कि दोनों देशों के बीच सम्बन्ध केवल आधिकारिक स्तर पर सीमित नहीं थे बल्कि लोगों के बीच आपसी सम्बन्ध भी काफी समय से स्थापित थे। जैसा कि पहले बताया गया कि रूसी इंडोलॉजीकल अध्ययन किसी प्रायोजित एजेंडा से प्रभावित नहीं है बल्कि वास्तविक रूप से भारत की महान संस्कृति एवं सभ्यता को समझने से प्रेरित है। बल्कि अक्सर यह पाया गया है की रूसी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को बाकी लोगों से बेहतर समझते है।

इस सन्दर्भ में एक उदाहरण स्वयं स्वामी विवेकानंद का है जिनका वर्णन रूसी इंडोलॉजिस्ट्स ने भी किया (डॉ. मोदक के पेपर में उल्लेखित, जिसमें उन्होंने रूसी और यूरोपीय दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट किया है।) जब कोई भारत और रूस के बीच सामंजस्यता के कारणों की अटकलें लगाते है तो कई चीज़ें उभर कर सामने आती है। पहला तो दोनों ही देशों के बीच लगभग न के बराबर मतभेद है और दूसरी तरफ बेहद अद्भुद रूसी संस्कृति और पूर्वी कट्टर चर्च एवं अन्य कारकों का प्रभाव कुछ कारणों में से है।

इस बात पर गौर करने की आवश्यकता है की इंडिक अध्य्यन में शोध सामग्री की उपलब्धता में कमी एवं सीमित प्रशिक्षण सामग्री एवं संसाधन एक बड़ी समस्या है। भारत से जुड़े कई ऐतिहासिक दस्तावेज रूस में उपलब्ध है। दोनों देशों के पारस्परिक संबंधों के इतिहास अथवा इन संबंधो की शुरुआत के अध्य्यन से जुड़े शोधार्थी के लिए रशियन अकैडमी ऑफ़ साइंसेज के इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल मैनुस्क्रिप्ट्स काफ़ी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। ‘ओरिएंट’ से जुड़े लाखों ऐतिहासिक दस्तावेजों का घर है यह जिसमें भारतीय दस्तावेजों का संग्रह कमाल का है। सिल्क मार्ग से जुड़े कई दस्तावेज विशेष रूप से दिलचस्प हैं। यहाँ तक की सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी का पुस्तकालय भी भारतीय प्रतिलिपियों के भंडारण का अच्छा स्त्रोत है जिसमें बंकिम चन्द्र चटर्जी के उपन्यासों की हस्ताक्षर प्रति भी मौजूद है।

संगोष्ठी के समापन सत्र में कुछ लोगों ने इस सम्बन्ध में कई सलाह-मशवरे भी दिए। भारतीय भाषाओँ में रूसियों की दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए, रूसी विश्वविद्यालयों में कुछ भारतीय-भाषाओँ से जुड़े कार्यक्रम चलाए जा सकते है। जैसा की बताया गया की रूस में भारत-रूस से जुड़े कई ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद है। इस सम्बन्ध में यह सलाह दी गयी की इन सभी दस्तावेजों को ठीक ढंग से सूचीबद्ध कर, उन शोधार्थियों को भी उपलब्ध करवाया जाए जो रूस में निवास नहीं करते।

इस दिशा में पहला कदम यह होगा कि एक विशेषज्ञों की कमिटी इसके लिए तैयार की जाए जिसमें प्रोफेसर पुराबी रॉय जैसे सदस्य हो जिन्हें रूस में काम करने का लम्बा अनुभव हो और जो दस्तावेजों की विषय-वस्तु से परिचित हों। साथ ही, इस बात पर भी जोर दिया गया की भारत को रूसी अध्य्यन में पुनः निवेश करनें की आवश्यकता है और इस अध्य्यन का दायरा केवल भाषा, साहित्य तक सीमित न होकर, इतिहास और संस्कृति के दायरों को भी छुये यह आवश्यक है।

यदि भारत-रूसी सम्बन्ध में इंडोलॉजीकल अध्य्यन को विस्तार देना है तो हम इस बात को अनदेखा नहीं कर सकते की इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाओं को पैदा करना होगा। वे दिन अब चले गये जब सोवियत संघ और शीत युद्ध के चलते हर दूसरा भारतीय शोधार्थी इंडो-रूसी अध्य्यन की ओर रुख किया करता था। अतः सारे प्रयास तब तक विफल ही रहेंगे जब तक की इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाओं को पैदा नहीं किया जाता।

अतः इंडोलॉजीकल या रूसी अध्य्यन के क्षेत्र में सांस्कृतिक जुड़ाव तो भारत-रूस संबंधों के एक पक्ष है और ये पूरी तरह तब तक सफ़ल नहीं हो सकता जब तक की भारत-रूस के कूटनीति संबंधों को मजबूत न बनाया जाए। रूसी अध्येताओं ने दुःख के साथ बताया की एक वक़्त था जब एक भारतीय पत्रकार स्थायी रूप से मास्को में रहा करता था। अब ऐसा नही है।

यदि भारत को एशिया में महाशक्ति बनना है तो यह आवश्यक है की वह अपने इस यूरेशियन मित्र के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाए रखे जिसके साथ इसके मतभेद कम और जुड़ाव अधिक हैं। अतः भारत-रूसी कूटनीति संबंधों के ७० वर्ष पूरे होने के बाद यदि भारत सरकार इसे आगे बढ़ाना चाहती है तो उसे इस मसले पर व्यावहारिक नीति बनाने की जरूरत है। इस क्षेत्र में नई पहल का हमें इंतज़ार रहेगा।

जैसे की आईसीसीआर एक दस-वर्षीय परियोजना बना सकता है जिसमें की वह इंडोलॉजी अध्य्यन के जरिये भारत-रूस के सहयोग में भागीदारी कर सकता है। कुछ समितियाँ बनाई जा सकतीं है। प्रतिलिपियों को संकलित किया जा सकता है। दोनों पक्षों को इंडो-रशियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडोलॉजिकल स्टडीज की स्थापना हेतु सहयोग करना होगा और इस पहल को सभी संस्थानों से महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध करवाने होंगे।

(ये लेखक के निजी विचार है और इन विचारों से वीआईएफ़ का सहमत होना बाध्यकारी नहीं है)


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)

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