खिलाफत तो लगभग मरणासन्न है, लेकिन बाकी हैं समस्याएं और विचार

इराक में मोसुल को मुक्त कराने के लिए पिछले वर्ष अक्टूबर में जो दाएश विरोधी सैन्य अभियान आरंभ किया गया था, उसने महत्वपूर्ण बढ़त हासिल करते हुए इस वर्ष जनवरी में शहर के पूर्वी निकटवर्ती हिस्से पर फिर कब्जा कर लिया। अगले दो वर्षों में इराकी सुरक्षा बल (आईएसएफ) और गठबंधन के अन्य सहयोगी तमाम कठिनाइयों और दाएश लड़ाकों के प्रतिरोध के बावजूद मोसुल के पश्चिमी भाग के बाहरी हिस्सों तक पहुंच गए। इस बात से कोई इनकार नहीं कि आतंकवादी संगठन के विरुद्ध युद्ध के इस चरण में सघन अभियान के कारण दाएश अपने लड़ाके भी तेजी से गंवा रहा है और वित्तीय संसाधनों से भी हाथ धो रहा है। ऐसा लग रहा है कि योजना के अनुसार अभियान जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, ‘खिलाफत’ कायम करने की आतंकी संगठन की महत्वाकांक्षा भी कम से कम क्षेत्र के मामले में खत्म होती जा रही है।

हालांकि मोसुल को दाएश के “अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण” बताया जाता है, लेकिन उस पर मजबूत नियंत्रण करने के उसके लगातार प्रयासों को विदेशी लड़ाकों, समान विचार वाले आतंकी संगठनों का ध्यान आकर्षित करने और दुनिया भर से समर्थन एवं सहायता हासिल करने की खातिर “प्रचार” भर माना जा रहा है। किंतु इराक में सिर पर मंडराती और सीरिया में भी जल्द दिखने वाली हार के बावजूद दाएश की छाप इनमें से किसी भी देश से या दुनिया के दूसरे हिस्सों से आसानी से मिटने से नहीं जा रही है। यह पहले ही देखा जा चुका है कि वे भूमिगत हो गए हैं और भीषण आतंकी हरकतों को अंजाम दे रहे हैं। यह दोहरा घटनाक्रम है, जिसके कारण इसकी प्रासंगिकता कई वर्षों तक बनी रहेगी। इसकी विचारधारा और हमले करने के तरीके अंतरराष्ट्रीय समुदाय को डराते रहेंगे।

क्षेत्रीय परिदृश्य

सैन्य अभियान के बावजूद दाएश इराक और सीरिया की राजधानियों बगदाद और दमिश्क में और उनके आसपास हमले करने की अपनी ताकत लगातार दिखाता आ रहा है। ज्यादातर मामलों में शियाओं के प्रतिष्ठान ही संगठन के निशाने पर रहे हैं और इससे उस क्षेत्र में उसका सांप्रदायिक रवैया सामने आता है, जहां संप्रदायों के आधार पर विभाजन खतरनाक स्तर तक बढ़ता जा रहा है। मिस्र के कोप्टिक ईसाइयों पर हाल ही में हुए दोहरे हमले को इसी कोण से देखा जा सकता है। दाएश द्वारा इस हमले की जिम्मेदारी लिया जाना अचरज की बात नहीं है क्योंकि सीरिया और इराक में हार का मुंह देख रहा यह संगठन मिस्र में इस तरह की हिंसा आयात करने की कोशिश कर रहा है। नियमित अंतराल पर इस तरह के सुनियोजित हत्याकांडों को अंजाम देने की संगठन की क्षमता बताती है कि यह मिस्र में अधिक समय, संसाधन और लड़ाके खर्च कर रहा है, जहां आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ सकती है। 2015-16 में मुक्त कराए गए स्थानों (विशेषकर इराक में) पर हमलों की लगातार बढ़ती घटनाएं भी उतनी ही चिंताजनक हैं। ऐसी खबरें आई हैं कि फालुजा जैसे इलाकों, जिस पर पिछले वर्ष जून में आईएसएफ ने एक बार फिर कब्जा कर लिया था, में दाएश अपने “नेटवर्क और क्षमताएं” एक बार फिर तैयार कर रहा है। तिकरित जैसे शहरों में आत्मघाती विस्फोट भी आतंकियों की गतिविधियों के उदाहरण हैं। इसके अलावा जिन इलाकों पर पहले दाएश का कब्जा था, वहां से भागे लोगों का भी कुछ अता-पता नहीं है। ऐसी परिस्थिति में यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि आतंकी संगठन और वैचारिक स्रोत के रूप में दाएश की क्षमता कम जरूर हो गई है, लेकिन खत्म नहीं हुई है।

इराक और सीरिया में युद्ध आगे बढ़ने के साथ ही राजनीतिक तथा सुरक्षा संबंधी समस्याएं और भी बढ़ने की संभावना है। आपको यह बात अच्छी लगे या न लगे, लेकिन इसी संगठन के कारण कई क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ताकतें संयुक्त सैन्य अभियान के लिए साथ आई हैं और गठबंधन (अपने निहित स्वार्थों के कारण) बन रहे हैं। जिस तरह अतीत में अमेरिका और रूस वर्चस्व या एकाधिकार के लिए लड़ रहे थे, वही ईरान और सऊदी अरब के साथ भी हो रहा है, जो दाएश से लड़ाई के नाम पर सीरिया और इराक में अपने पिट्ठू बिठाकर अपना प्रभाव आजमा रहे हैं। तुर्की के लिए उत्तरी सीमाओं पर सीरियाई कुर्दों और इराक के भीतर कुर्द पशमरगा लड़ाकों की मौजूदगी उतनी ही परेशान करने वाली बात है। ऐसा उस क्षेत्र पर अपनी संप्रभुता स्थापित करने की कुर्दों की पुरानी महत्वाकांक्षा के कारण है। हाल में हुआ जनमत संग्रह तुर्की के वर्तमान राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दुअन के पक्ष में जाने के बाद यह चर्चा आरंभ हो गई है कि उन्हें अधिक ताकत मिल गई है और वह इस्लामिक तथा कुर्द अलगाववादियों को कुचलने के लिए उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। किंतु अभी यह देखना बाकी है कि पूरे क्षेत्र में आतंकवाद से लड़ने के मामले में उनकी नीतियों में कोई बदलाव आता है या नहीं। इराक में इस बात पर पहले ही चिंता जताई जा रही है कि उत्तर में कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार (केआरजी) निकट भविष्य में “अपनी सीमाएं बढ़ाने” जा रही है और इससे इराक सरकार के साथ खाई और बढ़ जाएगी, जो सरकार कुर्दों के अलगाववादी मंसूबों का बार-बार कड़ा प्रतिरोध करती रही है। परिणामस्वरूप दाएश का पतन (चाहे जब भी हो) होने के बाद इराक में और भी अशांति फैल जाएगी।

अपने हथियार और गोलाबारूद तैयार करने की दाएश लड़ाकों की तकनीकी दक्षता एक और पहलू है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसका पता हाल ही में मोसुल अभियान के दौरान चला। इसके बाद यह खुलासा भी हुआ कि इस संगठन के पास ड्रोन भी हैं, हालांकि वे उतने अधिक परिष्कृत नहीं हैं। ऐसे ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले पुर्जे उन बाजारों में खुलेआम मिलते हैं, जहां आम लोग आते रहते हैं; इसीलिए उन्हें खरीदना मुश्किल काम नहीं है। हकीकत है कि संगठन अपनी ऑनलाइन सामग्री के जरिये बम बनाने की तकनीकें दिखाता रहा है और उनसे प्रेरित हुए कुछ लोग भी उसने भर्ती कर लिए हैं। लेकिन अब जबकि विदेशी लड़ाके अपने देश लौट रहे हैं तो वे अपने साथ वे कौशल लेकर जा रहे हैं और इस बात की संभावना भी नहीं नकारी जा सकती कि ये कौशल वे अपने जैसे विचारों वाले दूसरे व्यक्तियों को सिखा देंगे। अकेले हमले करने वालों की बढ़ती घटनाओं को देखकर यह बात सच लगती है कि इस तरह के कौशल और विचारों का हस्तांतरण हो रहा है। हाल के दिनों में ऐसे अकेले हमले करने वाले गंभीर खतरा बन गए हैं। आज के जो रंगरूट युद्ध का अनुभव लेकर अब अपने देश लौट रहे हैं, वे ही कल भर्ती करने वाले बनेंगे। लेकिन सुरक्षा तंत्रों द्वारा बढ़ती निगरानी के कारण वे खामोश बैठे हैं और उनकी गतिविधियां भी दबी-छिपी ही होंगी।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य

दाएश के प्रभाव का प्रत्यक्ष या परोक्ष असर विभिन्न देशों में विभिन्न प्रकार से दिखाई देता है। फ्रांस में नवंबर, 2015 में सिलसिलेवार हमलों के बाद से फ्रांस, बेल्जियम, तुर्की, ब्रिटेन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश आदि दाएश से संबंधित आतंकी घटनाओं के गवाह बने हैं। इस समय, जब इस संगठन पर पश्चिम एशिया में जबरदस्त दबाव है तब यह अपनी पैठ बढ़ाने के लिए अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र की ओर देख रहा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हाल में हुए हमलों से यह चिंता पैदा हो गई है कि इन देशों में दाएश का प्रभाव बढ़ रहा है। इसके साथ ही उत्तरी अफ्रीका और मध्य एशिया में भी उसकी गतिविधियों के विस्तार की संभावना है। भोपाल और उज्जैन में हुए विस्फोट भी दाएश से प्रेरित चरमपंथियों का काम हो सकते हैं, हालांकि उनका सीरिया में संगठन के नेतृत्व से प्रत्यक्ष संबंध अभी पता नहीं चला है।

इसे देखते हुए दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में चरमपंथ का हालिया उभार अपने कामकाज के लिए वैकल्पिक ठिकाने तलाश रहे इस संगठन के लिए अनुकूल है। इसीलिए क्षेत्र के लिहाज से वहां खिलाफत चाहे नहीं हो, लेकिन चरमपंथी विचारधारा के कायम रहने की अच्छी खासी संभावना है। दुनिया भर में दाएश का समर्थन करने की शपथ ले चुके या उससे प्रेरित चरमपंथी व्यक्ति तथा समवैचारिक आतंकी संगठन स्थानीय मसलों का फायदा उठा सकते हैं। उदाहरण के लिए यूरोप तथा अमेरिका में आव्रजन एवं शरणार्थी नीतियां, दक्षिण थाईलैंड में मुस्लिम उग्रवाद, चीन में उइगर समस्या, म्यांमार में रोहिंग्या समस्या, दक्षिणपूर्वी देशों (इंडोनेशिया और फिलीपींस) में बहुत पुरानी चरमपंथी समस्याएं, इजरायल-फलस्तीन संघर्ष तथा भारत में हिंदू-मुस्लिम विभाजन कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जो चरमपंथ को बढ़ावा देते रहेंगे और जिनके कारण आतंकी समूहों में भर्तियां होती रहेंगी। सबसे बुरी स्थिति तब होगी, जब अपना संघर्ष जारी रखने के लिए संभवतः अल कायदा उन आतंकियों का ठिकाना बन जाएगा, जो अभी दाएश में हैं।

उपरोक्त घटनाओं को देखते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में विभिन्न स्थानों पर अकेले व्यक्ति छिटपुट हमले करेंगे। अतीत में ऐसे चरमपंथी तत्वों ने आंतक की भयावह घटनाओं को अंजाम दिया है, इस बात के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं। हालांकि उनमें से सभी वाकई में अकेले हमला करने वाले (लोन वुल्फ) नहीं थे, लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि दाएश या अल-कायदा इस तरह के हमलों के लिए भड़काते होंगे ताकि लोगों के बीच डर कामय करने के लिए आसान निशानों पर इस तरह के हमले कर व्यापक क्षेत्र में अपना वजूद कायम रखा जा सके। 22 मार्च को लंदन में हुआ हमला दाएश से प्रेरित ऐसा ही हमला लगता है और इसे आगे आनो वाली मुश्किलों का स्पष्ट संकेत मानना चाहिए। इसी तरह अप्रैल के आरंभ में स्टॉकहोम की सड़क पर वाहन से किए गए हमले और सेंट पीटर्सबर्ग में ट्रेन में हुए विस्फोट से भी यही संकेत मिलते हैं कि आतंकियों की योजनाएं पहले जितनी परिष्कृत नहीं रही हैं और उन्हें ढूंढना और मुश्किल हो रहा है। इस समय चाकू और वाहन दो सबसे प्रभावी ‘हथियार’ लग रहे हैं। दुर्भाग्य से इसे रोकने का कोई सटीक उपाय नहीं है। रूमिया जैसे प्रकाशनों के जरिये दाएश का प्रचार इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाता है। इतना ही नहीं, छुटभैये अपराधियों, तस्करों, मानव तस्करी करने वालों तथा चरमपंथियों के बीच बढ़ती सांठगांठ ने समस्या बढ़ा दी है क्योंकि इसके कारण चरमपंथियों को हथियार खरीदने और अवैध धन जुटाने में बहुत कम कठिनाई होती है। एक विश्लेषक ने बिल्कुल ठीक कहा है, “...यह आतंकवाद का ऐसा युग है, जहां ऐसे काम करने वाले उन्मादी व्यक्ति आईएसआईएस या अल-कायदा जैसे आतंक के ठेकेदारों से निर्देश नहीं लेते हैं और न ही उनसे सीधे बात करते हैं।”

गठबंधन का अभियान तो सीरिया और इराक में हमले जारी रखेगा, लेकिन अपने लक्ष्यों के बारे में प्रमुख शक्तियों के बीच मतभेद बने रहेंगे। सीरिया में अमेरिका के हालिया हवाई हमले इसका उदाहरण हैं, जिनके कारण रूस के साथ तनाव बढ़ गया। इसे देखते हुए इस बात में संदेह है कि ये शक्तियां आतंकवाद से मिलजुलकर कितना लड़ सकती हैं।

सीरिया और इराक में अगले कुछ दिनों या महीनों में दाएश का चाहे जो भी हश्र हो, वह आभासी खिलाफत में तो बदल ही जाएगा। तकनीकी रूप से दक्ष नेता, कट्टर विचारक और समर्थक यह सुनिश्चित करेंगे कि सघन सैन्य उपायों के बीच इसका अस्तित्व बचा रहे। बेहद कट्टर ऑनलाइन समुदाय ही इसके बाद सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौती खड़ी करता है। दाएश ने स्वयं को महज एक आतंकी समूह से वैचारिक खतरे में तब्दील कर लिया है। इसके कट्टरपंथी विचारों से कैसे निपटा जाए, यह अभी तक पता नहीं चला है। विश्लेषक एवं युद्ध रणनीतिकार बेशक दाएश के खिलाफत के संपूर्ण पतन का इंतजार करते रहें, लेकिन वैश्विक समुदाय को ‘वाहनों एवं चाकुओं’ के जरिये और भी हमलों के लिए तैयार रहना चाहिए।


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: http://www.snopes.com

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