नि:शक्तता विधेयक, ऐतिहासिक उपलब्धि

इस देश के लोग वर्तमान दशक में 16 दिसंबर को दो कारणों के लिए याद रखेंगे: पहला कारण सदमे भरी याद है और दूसरा खुशी भरा है। पहली घटना कारण चार वर्ष पहले राष्ट्रीय राजधानी में एक युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घृणित एवं डरावनी घटना से संबंधित है। दूसरी और हालिया घटना इसे देश में निःशक्त लोगों के लिए महत्वपूर्ण तारीख बना गई है। समूचे शीतकालीन सत्र में बार-बार कार्यवाही बाधित होने के बावजूद लोकसभा ने इसी दिन एकता का दुर्लभ प्रदर्शन करते हुए ‘निःशक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक, 2016‘ को मंजूरी दे दी। निःशक्त वर्ग के लिए तो यह ऐतिहासिक क्षण था ही, उन नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के लिए भी था, जो दशकों से उनके हितों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं और समाज के इस अनदेखे वर्ग के उन परिजनों तथा संबंधियों के लिए भी ऐतिहासिक क्षण था, जिन्हें लोगों के हाथों शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी यह महत्वपूर्ण क्षण था, जो उस अवसर पर लोकसभा में मौजूद थे। सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री तथा उनकी सरकार ने निःशक्त लोगों को उनका अधिकार - गरिमा एवं सशक्तिकरण - प्रदान करने का मजबूत संकल्प दिखाया है। मोदी सरकार पिछली सरकार के अधूरे काम - जिसे दुर्भाग्य से ‘प्रतीकात्मक काम’ भर कहा जा सकता है क्योंकि वह उनकी जरूरतों को समझती ही नहीं थी - को पूरा करने के लिए मोर्चे पर डटी रही है। वर्तमाना सरकार ने कई मजबूत प्रयास किए हैं, जिनमें संभवतः सबसे महत्वपूर्ण था 2015 में ‘एक्सेसिबल इंडिया’ अभियान आरंभ करना, जिसका उद्देश्य सामाजिक बाधाएं दूर करना था - इसका लक्ष्य निःशक्तों को दया या कृपा का पात्र मानने की सदियों पुरानी धारणा को एकदम बदल देना था। उसके बजाय सरकार उन्हें ऐसी दुनिया में ले जाना चाहती है, जहां वे अपने काम बिना किसी के सहारे कर सकते हैं।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ का प्रयोग भी अपने विचार दोहराने के लिए करते रहे हैं। एक बार उन्होंने “विकलांग” शब्द के बजाय “दिव्यांग” (दिव्य क्षमताओं वाले व्यक्ति) शब्द का प्रयोग करने का सुझाव दिया क्योंकि प्रधानमंत्री के अनुसार निःशक्तों के पास “दिव्य क्षमताएं” होती हैं। इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री विभिन्न कार्यक्रमों में पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेते रहे हैं, जिनमें उनका जन्मदिन भी शामिल है, जहां उन्होंने निःशक्तों को सहायक उपकरणों का वितरण किया था। इस प्रकार के प्रयासों ने हमारे देश में निःशक्तता अधिकार आंदोलन को तेज किया है। हाल ही में पारित निःशक्तता विधेयक दिव्यांगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करेगा और गरिमापूर्ण जीवन जीने का समान अधिकार उन्हें दिलाने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

लेकिन मानसिकता बदलने; विकलांगों के प्रति दृष्टिकोण में आमूल-चूल परिवर्तन करने पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए यह आवश्यक है कि हम उनकी तरह सोचें; हम उनके यथार्थ को वैसे ही स्वीकार करें, जैसे उन्होंने कर लिया है; हम उनके साथ रहते हुए उन्हें दया का पात्र नहीं मानें बल्कि प्रतिभाशाली मानें, जो हमारी और आपकी ही तरह सफलता हासिल कर सकते हैं। कानून और प्रावधान अधिक से अधिक यही कर सकते हैं कि उनका जीवन आसान बन जाए, लेकिन असली परिवर्तन दफ्तरों, स्कूलों, सार्वजनिक स्थलों आदि से आरंभ होना चाहिए।

समस्या की जड़ लोगों की मानसिकता है, जो अनंत काल से ऐसी ही है - स्वतंत्रता के पहले से ऐसी थी, स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही और और बीसवीं शताब्दी से इक्कीसवीं शताब्दी में चलती आई है। इस दौरान एक ही बात एक जैसी रही, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निःशक्तों के प्रति लोगों की धारणा जस की तस रही। निःशक्तों को समाज से बहिष्कृत, मुख्यधारा के लोगों से भिन्न माना गया है और उनके बारे में पक्षपात भरी धारणाएं, हानिकारक पूर्वग्रह बना लिए गए हैं; उन्हें दया के पात्र व्यक्ति के तौर पर देखा गया है, जो समाज के लिए अनुपयुक्त हैं और उसमें या परिवार में योगदान करने के लायक नहीं हैं; उनका मजाक उड़ाया गया और कछ लोगों के लिए वे मनोरंजन का साधन बने रहे। पीढ़ियों से उन्हें कलंक माना गया, जिसके कारण वे सामाजिक और आर्थिक हाशिये पर धकेल दिए गए।

सबसे खराब बात यह रही कि यह पूर्वग्रह निःशक्त व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उनके परिजनों को भी इसकी तपिश झेलनी पड़ी क्योंकि पड़ोसियों तथा रिश्तेदारों ने सवाल पूछ-पूछकर उन्हें शर्मिंदा करते थे। इसके अलावा वित्तीय स्थिति के कारण भी कई परिवार अपने निःशक्त सदस्यों का त्याग कर देने पर मजबूर हो गए। कुछ ने तो अपने निःशक्त नवजातों को अनाथालय तक में छोड़ गए। कई ने अपनी हालत को पिछले जन्म के पापों का नतीजा बताया और मान लिया कि इस जीवन में कष्ट उठाकर ही उन्हें अपने पापों से छुटकारा मिल सकता है। अजीब बात है कि ऐसी गलत धारणा भी मौजूद है कि निःशक्तता कोई बीमारी होती है, जिसे धार्मिक स्थलों की यात्रा से ठीक किया जा सकता है। यह लड़ाई समाज तथा निःशक्त व्यक्तियों एवं उनके परिवारों के बीच लड़ी जा रही थी।

स्वतंत्रता के बाद कई गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) पनप आए, जिन्हें विदेश से और देश में भी अमीरों से अकूत आर्थिक सहायता मिली, लेकिन इसका अधिकतर लाभ दृष्टिहीनों अथवा बधिरों को मिला। दबे-कुचले अल्पसंख्यकों की ही तरह निःशक्तों को भी मुफलिसी के हवाले छोड़ दिया गया। 1980 के दशक में धीरे-धीरे स्थिति सुधरनी शुरू हुई, जब उनकी विकास संबंधी भूमिका खोजी जाने लगी। धीरे-धीरे लोगों ने उन क्षेत्रों को तलाशना शुरू कर दिया, जहां निःशक्त योगदान कर सकते थे। प्रौद्योगिकी में उन्नति के साथ ही चिकित्सा में होने वाले विकास यानी नई दवाओं के जरिये उनकी तकलीफें कम करने की कोशिश होने लगीं, उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए उपकरण तलाशे जाने लगे। किंतु यह प्रगतिशील रवैया विशिष्ट और शिक्षित वर्ग तक सीमित था। दुखद बात यह थी कि एक के बाद एक सरकारों में परिवर्तन लाने की इच्छा ही नहीं थी।

1990 के दशक में जब देश बड़े आर्थिक सुधारों से गुजर रहा था तभी उन्हें मान्यता दिलाने के अभियान आरंभ हुए। कुछ स्वर उठे, जिन्होंने समग्र कानून की जरूरत का समर्थन किया और निःशक्तों के सामाजिक तथा आर्थिक अधिकारों पर खास जोर दिया। और अंतिम महत्वपूर्ण पड़ाव 1995 में आया, जब ‘निःशक्त व्यक्ति (समान अधिकार, अधिकारों की रक्षा एवं पूर्ण सहभागिता) अधिनियम, 1995’ पारित हुआ। इस अधिनियम में निःशक्त व्यक्तियों को अधिक अधिकार प्रदान किए जाने पर ध्यान दिया गया और कई प्रावधान लागू किए गए। इसके दो लक्ष्य थे। पहला, निःशक्त व्यक्तियों की समानता एवं संपूर्ण सहभागिता को स्वीकार करना तथा सुनिश्चित करना। दूसरा, उनके आर्थिक एवं सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा करना तथा बढ़ावा देना। इसके अंतर्गत निःशक्तता के सात क्षेत्र हैं। अधिकार आधारित दृष्टिकोण के साथ अधिनियम में अत्यधिक निःशक्तता वाले व्यक्तियों को शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक स्थलों पर निर्बाध प्रवेश एवं संस्थाओं की सुविधा सुनिश्चित करने तथा भेदभाव करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की बात थी।

2007 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने निःशक्तों की बात को मजबूत करने के लिए व्यावहारिक एवं सराहनीय कदम उठाते हुए निःशक्तों के भाग्य को अंतरराष्ट्रीय विधान के साथ बांधने का फैसला किया। भारत ने निःशक्त व्यक्तियों के अधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र संधि (यूएनसीआरपीडी) पर हस्ताक्षर कर दिए, जो दुनिया भर में निःशक्त व्यक्तियों को बुरी दशा से निकालने के लिए की गई मानवाधिकार संधि है। यह संधि मानती है कि निःशक्त व्यक्ति “मानवाधिकार तथा मौलिक स्वतंत्रता वाले व्यक्ति” होते हैं तथा “मात्र चिकित्सा तथा सामाजिक संरक्षण के पात्र नहीं” होते हैं। संधि यह भी कहती है कि “निःशक्तता लगातार विकसित होता विचार” है तथा “निःशक्त व्यक्ति मानवीय विविधता तथा मानवता का हिस्सा है।”

इस अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुसार “निःशक्तता तब आती है, जब दुर्बलता का सामना उन बाधाओं से होता है, जो व्यक्ति को समाज में दूसरों के समान सहभागिता से रोकती हैं।” इस संधि का उद्देश्य निःशक्तता वाले व्यक्तियों की सुरक्षा करना, उन्हें बढ़ावा देना तथा यह सुनिश्चित करना है कि उन्हें अन्य व्यक्तियों के समान ही मानवाधिकारों एवं मौलिक स्वतंत्रता का उपयोग करने का अवसर मिले तथा उनकी गरिमा का भी पूरा ध्यान रखा जाए।

यूएनसीआरपीडी पर हस्ताक्षर करने वालों को अपने कानून एवं नीति में उपयुक्त परिवर्तन करने होते हैं ताकि निःशक्त व्यक्तियों के अधिकार प्रभावी हो सकें। इस संधि को स्वीकार कर भारत अपने कानूनों को संधि के अनुरूप परिवर्तित करने के लिए बाध्य हो गया था। किंतु संप्रग सरकार ने जिस भावना के साथ संधि पर हस्ताक्षर किए थे, उसके उलट वह कानून के साथ तालमेल बिठाने में असफल रही। सरकार की ओर से लगातार प्रयास नहीं होने के कारण संधि के प्रावधान कागजों में ही रह गए।

तीन वर्ष बाद संप्रग को झटका लगा, जब संयुक्त राष्ट्र संधि के प्रावधानों में दिए गए समग्र विधेयक को कानूनी जामा पहनाने में नाकाम रहने के कारण निःशक्त वर्गों ने उसकी तीखी आलोचना की। जब कोई और रास्ता नहीं रहा तो सरकार ने बढ़ते असंतोष से निपटने के लिए 2010 में निःशक्त व्यक्तियों के अधिकार विधेयक तैयार किया और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने सुधा कौल की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया। समिति ने 2011 में अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसमें 1995 के अधिनियम में कुल 105 संशोधन किए जाने का सुझाव था। किंतु विधेयक का मसौदा इतनी बड़ी चुनौती का सामना करने में नाकाम रहा। इससे निःशक्त वर्ग में बहुत निराशा भर गई और उन्होंने तथा उनके लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने एकमत से इसे नकार दिया क्योंकि उन्हें लगता था कि संशोधित कानून ‘खैरात’ के मॉडल पर आधारित था।

तत्कालीन सरकार ने विधेयक को निःशक्त व्यक्तियों के अधिकारों की 21वीं सदी वाली उस समझ के अनुरूप बनाने के कई प्रयास किए, जैसी समझ भारत द्वारा स्वीकारी गई यूनसीआरपीडी में थी। विधेयक के तीन प्रारूप थे - तीनों को पिछले प्रारूपों का घिसा-पिटा रूप बताया गया। पहला वह था, जिसका प्रस्ताव देश भर के निःशक्त व्यक्तियों एवं उनके संगठनों से मशविरा कर समिति ने 2011 में पेश किया था; दूसरे को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 2012 में अधिसूचित किया था, जिसका विभिन्न हितधारकों ने विरोध किया था; और तीसरा 2013 का आरपीडी विधेयक था, जिसे खारिज कर दिया गया। वास्तव में विधेयक के सभी प्रारूपों ने निःशक्तों के पूरे खेमे को एकजुट कर दिया क्योंकि वे इन घटनाओं से बेहद निराश थे। हर बार सिफारिशें तथा संशोधन संतोषजनक नहीं होते थे।

सरकार उनके बीच फंस गई थी। एक ओर नागरिक समाज के कुछ सदस्य थे, जिन्होंने विधेयक के सभी प्रारूपांे को “प्रतिगामी कानून” बताते हुए नकार दिया और वापस कर दिया क्योंकि मसौदे के प्रावधान संतोषजनक नहीं थे। दूसरी ओर कार्यकर्ताओं का एक और खेमा था, जो कानून को जल्द से जल्द पारित होते देखना चाहता था क्योंकि लंबे समय बाद उसे उम्मीद की एक किरण नजर आई थी। निःशक्तों का कष्ट ऐसी स्थिति में पहुंच गया था कि वे सरकार से मिली रत्ती भर राहत भी स्वीकार करने के लिए तैयार थे।

कई समितियों एवं मसौदों के बाद अंत में निःशक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक, 2014 को 199 संशोधनों के साथ राज्य सभा में पेश कर दिया गया। लेकिन इससे बात नहीं बनी और खटपट चलती रही। निःशक्तों के बीच बड़ी संख्या को ऐसा लगा कि उसमें संयुक्त राष्ट्र संधि के प्रावधानों को बहुत हल्कार कर दिया गया है। इसलिए उन्होंने विधेयक को स्थायी समिति के पास भेजे जाने की मांग कर डाली। जब तक स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की, संप्रग सत्ता से बाहर हो चुका था और मई, 2015 में नई सरकार के सामने रिपोर्ट रखी गई, जिसकी सिफारिशों में निःशक्त वर्ग द्वारा जताई गई विभिन्न चिंताओं को शामिल किया गया।

संसद में काम नहीं हो पाने के कारण जब अधिकतर निःशक्त लोग उम्मीद छोड़ चुके थे, उस समय निःशक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक, 2016 के पारित होने से कई दिल खिल उठे। निःशक्त लोगों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया और भगवान का शुक्रिया अदा किया। विधेयक में 21 निःशक्तताओं को मान्यता दी गई, जो 1995 के अधिनियम की तुलना में तीन गुना अधिक थीं। यही इस बात का प्रमाण है कि विधेयक कितना व्यापक है। यह महत्वपूर्ण बात है क्योंकि परंपरागत रूप से निःशक्तता को केवल तीन समूहों के साथ जोड़ा जाता रहा है - अस्थि विकलांगता के शिकार, दृष्टिहीन एवं बधिर। अन्य निःशक्त समूह जैसे मानसिक निःशक्तता के शिकार, मनोवैज्ञानिक विकारों के शिकार, कुष्ठ रोगी तथा मस्तिष्क पक्षाघात (सेरेब्रल पाल्सी) अथवा ऑटिज्म के पीड़ितों को भी किसी बीमारी का शिकार मान लिया जाता था और इसीलिए उन्हें लाभ नहीं मिलता था। इसीलिए विधेयक लाभ पाने वालों तथा नहीं पाने वालों के बीच का अंतर कम करेगा।

नए विधेयक में एक और महत्वपूर्ण बात थी निःशक्तों को सरकारी पदों, कार्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों में आरक्षण, जिसे तीन प्रतिशत से बढ़ाकर चार प्रतिशत कर दिया गया है। कभी सोचा है कि हममें से कितने लोगों के संगठन में कोई सहकर्मी अथवा हमारे पास बैठने वाला सहपाठी दृष्टि दोष से पीड़ित था अथवा शारीरिक रूप से निःशक्त था, ऑटिज्म पीड़ित था अथवा डिस्लेक्सिया से पीड़ित था? शायद आंकड़े निराशाजनक होंगे। अधिकतर संगठनों एवं स्कूलों को बहुत लंबा सफर तय करना है। प्रगतिशीलता दिखाने भर के लिए उन्हें भर्ती करने का कोई लाभ नहीं, विविधता को आत्मसात करना होगा। हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। जरूरी है कि हम विविधता का सम्मान करें। हमें भिन्नता का सम्मान करना होगा और दकियानूसरी सोच से बाहर आना होगा। संगठन साझा भाषा एवं मूल्यों का वातावरण तैयार कर ऐसा कर सकते हैं ताकि विभिन्न प्रकार के लोग एक दूसरे से संवाद कर सकें तथा वैचारिक आदान प्रदान कर सकें।

विश्व बैंक का अनुमान है कि विश्व की 15 प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी निःशक्तता से पीड़ित है। निःशक्त व्यक्तियों को श्रम बाजार से बाहर कर देने पर सकल घरेलू उत्पाद में लगभग तीन से सात प्रतिशत की वार्षिक हानि होती है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ लोग निःशक्तता से पीड़ित हैं और यह आंकड़ा भी बहुत कम करके आंका गया है।

यह विधेयक अनूठा है क्योंकि निःशक्त व्यक्तियों में भी महिलाओं एवं बच्चों को कमजोर समूह मानकर उनके लिए अलग से भारतीय निःशक्तता कानून बनेगा। विधेयक में कहा गया कि “उपयुक्त सरकारों को अपनी आर्थिक क्षमता एवं विकास की सीमाओं में रहते हुए निःशक्त व्यक्तियों के अधिकार की सुरक्षा एवं संवर्द्धन के लिए आवश्यक योजनाएं एवं कार्यक्रम तैयार करने होंगे ताकि उनके लिए स्वतंत्र रूप से अथवा समुदाय में रहने योग्य जीवन स्तर सुनिश्चित किया जा सके।” इसमें यह भी कहा गया कि “ऐसी योजनाओं तथा कार्यक्रमों के अंतर्गत निःशक्त व्यक्तियों को मिलने वाली सहायता अन्य लोगों को समान योजनाओं के अंतर्गत मिलने वाली सहायता से कम से कम 25 प्रतिशत अधिक होनी चाहिए।”

कई संशोधनों के साथ कुछ प्रावधान हल्के भी किए गए। भेदभाव करने वालों के लिए जेल का प्रावधान खत्म कर दिया गया है। इसके बजाय पहले उल्लंघन पर 10,000 रुपये के जुर्माना होगा तथा उसके बाद प्रत्येक उल्लंघन पर “कम से कम 50,000 रुपये और अधिक से अधिक पांच लाख रुपये तक का जुर्माना होगा।”

रोजगार में आरक्षण संबंधी प्रावधान को भी कुछ हल्का कर दिया गया है। आरंभिक विधेयक में कार्यालयों में पांच प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था, उसे अब घटाकर चार प्रतिशत कर दिया गया है। इस प्रावधान के विरुद्ध कई आवाजें उठी हैं, लेकिन हमें सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के घटते अवसरों को भूलना नहीं चाहिए। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के कई संस्थानों का अब निजीकरण हो रहा है; सरकारों ने कर्मचारी ठेके पर रखना आरंभ कर दिया है और अनुबंध नया चलन बन गया है। अब निजी क्षेत्र से अपेक्षाएं बढ़ गई हैं क्योंकि नीति आयोग द्वारा जनवरी, 2016 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार निःशक्तों में बेरोजगारी बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई है। यद्यपि विधेयक में निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात नहीं कही गई है किंतु उसमें निःशक्त व्यक्तियों को रोजगार देने पर निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की बात जरूर कही गई है।

नया विधेयक हितधारकों तथा निःशक्तों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। कानून की सफलता/असफलता के बारे में बात करना अभी बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन उम्मीद बहुत अधिक है। अब सरकार ही नहीं बल्कि लोगों के लिए भी कानून के प्रावधानों का प्रभावी रूप से प्रचार करना ही असली चुनौती है। प्रभावी क्रियान्वयन के साथ ही नागरिक समाज में भी समावेश की इच्छा उत्पन्न की जानी चाहिए ताकि परिवर्तन को आवश्यक माना जाए, कानूनी बाध्यता नहीं।

(लेखिका द पायनियर में सहायक संपादक हैं)


Translated by: Shivanand Dwivedi (Original Article in English)
Published Date: 20th March 2017

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.