स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें और मोदी सरकार

आज कृषि और किसान बहस के केंद्र में है. किसानों के हितों के लिए देश में राजनीतिक उठापटक भी चल रही है. सरकार के खिलाफ आन्दोलन कर रहा धड़ा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों की आड़ लेकर सरकार को घेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है. ऐसी मांग उठ रही है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएं. हालांकि तथ्यों के धरातल पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों और मोदी सरकार द्वारा कृषि के क्षेत्र में किए गए कार्यों पर बारीकी से चर्चा उतनी नहीं हो रही जितनी होनी चाहिए. यह स्थिति तब है जब खुद एम.एस स्वामीनाथन ने एक ट्वीट के माध्यम से बयान जारी करके मोदी सरकार की कृषि नीतियों की सराहना की है.

हालांकि स्वामीनाथन के बयान पर भी विपक्ष ने कान बंद कर रखा है. यह दिखाता है कि किसान आन्दोलन को हवा दे रहे राजनीतिक धड़ों को समस्या से लड़ने और समाधान खोजने की बजाय अस्थिरता का वातावरण बनाए रखने में ज्यादा रूचि है. वरना स्वामीनाथन के हालिया बयान और आयोग की सिफारिशों की कसौटी पर मोदी सरकार के कृषि नीति का मूल्यांकन किया जाता. इतिहास में थोड़ा पीछे जाकर देखें तो भारत की स्वतंत्रता को आज सात दशक बीतने के बाद देश में अनेक राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन हुए हैं. आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरु नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार द्वारा समाजवादी नीतियों को तरजीह देने का परिणाम हुआ कि राज्य का हस्तक्षेप समाज के कार्यों में बढ़ा और समाज की राज्य पर निर्भरता बढ़ती चली गयी. यह आगे चलकर एक आदत सी बन गयी आज देश तमाम ऐसे आंदोलनों से जूझ रहा है जो या तो राजनीतिक हितों को साधने के लिए खड़े किए जा रहे हैं अथवा हमारा समाज ही सबकुछ राज्य से ही हासिल कर लेने की इच्छा को पाले हुए निष्क्रिय बैठा है. अभी हाल में ही मध्यप्रदेश के मंदसौर में जो कुछ भी हुआ वह इसका एक लक्षण है.

कृषि संबंधी समस्याओं की जहाँ तक बात है तो ऐसा बिलकुल नहीं है कि भाजपानीत केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकारें किसानों के लिए कुछ कर नहीं रही हैं, और बाकी प्रदेशों की कृषि नीति एकदम किसानों के लिए हितकर है. इस पूरे विषय में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों की चर्चा सर्वाधिक हुई है. ऐसा बताने का भरसक प्रयास किया गया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को अगर लागू किया गया होता तो आज यह स्थिति नहीं होती. इस प्रचार को प्रसारित करने में किसानों के साथ देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस प्रथम कतार में खड़ी नजर आई है. यह रोचक तथ्य है कि वर्ष 2006 में जब स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी गयी तब कांग्रेसनीत संप्रग सरकार थी और डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. वर्ष 2006 के बाद 8 साल तक वे देश के प्रधानमंत्री रहे. इस बीच उनके पास पर्याप्त समय था कि वे उन सिफारिशों को लागू कर देते और आज उन्हें भाजपा की सरकार से यह मांग नहीं करनी पड़ती. लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया. आज भी देश के कुछ राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है, अत: उसे प्रदेश स्तर पर उन सिफारिशों पर काम करने की स्वतंत्रता है. लेकिन हमें देखना होगा कि कांग्रेस शासित किन राज्यों ने किसानों के हितों के लिए ऐसा कदम उठाया है! क्या कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने ऐसा किया है अथवा हिमाचल की सरकार ने ऐसा कुछ किया है ? स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से पूर्णतया सहमत नहीं हुआ जा सकता और वो सिफारिशें किसानों की समस्याओं का रामबाण है, ऐसा भी नहीं लगता है.

फिर भी वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद कृषि क्षेत्र में हुए कार्यों को स्वामीनाथन आयोग के सिफारिशों की कसौटी पर समझने की कोशिश करें तो सरकार द्वारा किए गए अनेक ऐसे कार्य नजर आएंगे जो स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए थे. मसलन, स्वामीनाथन आयोग ने सिंचाई योजनाओं को सुदृढ़ करने की सिफारिश की थी. मोदी सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा बजट आवंटित किया गया और इसके तहत “हर खेत पानी” के लक्ष्यों को तय किया गया. इस योजना के अंतर्गत सरकार द्वारा पांच वर्षों में 50 हजार करोड़ की राशि आवंटित करने का प्रावधान भी तय किया गया है. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों में किसानों की फसल सुरक्षा एवं बीमा को लेकर पुख्ता प्रावधान लागू करने की बात की गयी थी. वर्तमान सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को सशक्त करते हुए इसको किसानों के लिए अत्यधिक हितकर बनाने के प्रावधानों को लागू किया है. किसानों को ऋण उपलब्ध कराने के प्रावधानों को भी इसके अंतर्गत सरल बनाने की दिशा में सरकार ने व्यापक कदम उठाए हैं. हाल ही में मोदी सरकार के केबिनेट ने किसानों के कर्ज के ब्याज दर में 5 फीसद की कटौती करते हुए उसे 4 फीसद तक लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है.

स्वामीनाथन आयोग ने मृदा जांच एवं उत्पादकता बढाने की तकनीक को लाने की सिफारिश की थी. मोदी सरकार ने सॉयल हेल्थ कार्ड के माध्यम से मृदा की जांच करके उसे अत्यधिक उत्पादन के अनुकूल बनाने की दिशा बड़ा कदम बढाया है. स्वामीनाथन आयोग ने कृषि क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढाने की दिशा में काम करने की सिफारिश की थी. किसानों की आत्म हत्या का को लेकर भी स्वामीनाथन आयोग ने चिंता जताई थी. इस दिशा में फसल सुरक्षा की गारंटी को बीमा योजना के माध्यम से किसानों के अनुकूल बनाने के लिए सरकार ने नीतिगत स्तर पर तो काम किया ही है वहीँ उत्तर प्रदेश, महराष्ट्र जैसी कुछ सरकारों ने कर्ज माफ़ी के बोझ को भी राजकोष पर डाला है. इसके अतिरिक्त स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के कुछ बिंदु ऐसे हैं जो वर्तमान परिदृश्य में व्यवहारिक नहीं हैं. वैसे तो कर्ज माफ़ी का रास्ता भी पूर्णतया उचित नहीं कहा जा सकता है. इससे एक किस्म की गलत धारणा का निर्माण ही हो रहा है. पहले कर्ज लेना फिर उसे माफ़ कराने के लिए सडकों पर उतरना, यह परंपरा अगर राजनीतिक वोटबैंक बनाने का माध्यम बन गयी तो इसके परिणाम बेहद निराशाजनक होंगे.इस उठापटक के बीच वर्तमान सरकार के कृषि क्षेत्र में किए गए कार्यों पर खुद एम.एस स्वामीनाथन ने भी टिप्पणी करते हुए कहा है कि केंद्र ने किसानों के आयोग की कई सिफारिशें लागू की हैं. मोदी सरकार ने किसान आयोग की बेहतर बीज, सॉयल हेल्थ कार्ड, बीमा, सिंचित क्षेत्र की वृद्धि को लागू किया है. स्वामीनाथन की यह टिप्पणी इसबात की तस्दीक करती है कि केंद्र की मोदी सरकार सिफारिशों के अनुरूप सही दिशा में काम कर रही है.

वर्तमान में देश के अन्दर चल रहे किसान आंदोलनों की भी बारीकी से पड़ताल की जानी चाहिए. मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों की मांगों को लेकर खड़ा आन्दोलन देखते ही देखते हिंसक होता गया और फिर राजनीति के चंगुल में फंस गया. इस आन्दोलन को राजनीति का गाढा रंग चढाने और वोट के लिए सियासत को चमकाने के लिए ही हिंसक किया गया हो, इससे भी खारिज नहीं किया जा सकता है. इसके अलावा भी अभी हाल में ही एक किसान आन्दोलन जंतर-मंतर पर देखने को मिला था, जिसकी तमाम विसंगितियों पर भी थोड़ी बहुत चर्चा हुई थी. जंतर-मन्तर पर चला किसान आन्दोलन तामिलनाडू के किसानों का आन्दोलन था. मध्य प्रदेश के मंदसौर के किसानों और तामिलनाडू के किसानों द्वारा सरकार के खिलाफ किए गए आन्दोलन के बीच एक रोचक तथ्य ये निकलकर आता है कि मध्य प्रदेश के किसान प्रदेश सरकार के खिलाफ आन्दोलन कर रहे थे, और वहां प्रदेश में भाजपा की सरकार है. वहीँ तामिलनाडू में भाजपा की सरकार नहीं है तो वहां के किसानों को आन्दोलन करने दिल्ली आना पड़ा क्योंकि यहाँ केंद्र में भाजपा की सरकार है. आश्चर्य है कि सारे आन्दोलन भाजपा के खिलाफ ही हैं! जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है वहां के किसान दिल्ली तक आ रहे हैं लेकिन आन्दोलन भाजपा सरकार के खिलाफ ही कर रहे हैं. ऐसे में इन आंदोलनों में राजनीतिक हितों के हस्तक्षेप का संदेह बेजा नहीं है.

किसानों की आत्महत्या के आंकड़े अगर उठाकर देखें तो कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक में स्थिति कम भयावह नहीं नजर आती है. अप्रैल 2017 एक समाचार पत्र में छपी खबर के मुताबिक़ कर्नाटक में प्रतिदिन दो से चार किसानों के आत्महत्या करने के औसत आकंडे सामने आते हैं. लेकिन कर्नाटक की सरकार किसानों के कर्जमाफी को लेकर अभी भी तैयार नहीं है. आश्चर्य इस बात का है कि वहां कोई आन्दोलन भी कांग्रेस सरकार के खिलाफ नहीं हो रहा है! राहुल गांधी भी मध्य प्रदेश के मंदसौर की तरह कर्नाटक नहीं गए हैं. अर्थात, किसानों को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस की चिंता बेहद सिलेक्टिव और वोट आधारित है. वहीँ कांग्रेस शासित पंजाब में भी किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है, लेकिन वहां के किसानों की समस्याओं में भी राहुल गांधी और कांग्रेस की कोई रूचि नहीं है. कांग्रेस ने जिस ढंग से किसानों के लिए बिना कुछ किए इसे राजनीतिक और हिंसक रंग देने की कोशिश की है, वह कतई लोकतंत्र के आदर्शों के अनुकूल नहीं है. कांग्रेस को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि उन्होंने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर क्या किया है ?

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं एवं नेशनलिस्ट ऑनलाइन में एडिटर हैं.)


Image Source: http://www.timesnow.tv

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