कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए तीनों विकल्पों पर विचार

80 के दशक में कश्मीर में पंजाब के खालिस्तानी आतंकवाद की समाप्ति के बाद पाकिस्तान ने पंजाब में इस्तेमाल तरीकों को कश्मीर में भी इस्तेमाल करना शुरू कर दिया तथा पाक आइएसआइ ने अफगानिस्तान में प्रयोग किये। आतंकवादी हथियारों का कश्मीर में प्रयोग करके विश्व को यह दिखाने की कोशिश की कि कश्मीर की जनता भारत के साथ नहीं रहना चाहती। अक्सर राजनैतिक गलियारों में सैक्यूलिरिज्म में विश्वास करने वाले नेता कहते है सैक्यूलरिज्म की दुहाई देने वाले वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने अपने टाइम्स आॅफ इंडिया समाचार पत्र को दिये गये साक्षात्मकार में कहा है कि कश्मीर समस्या का हल बातचीत से निकाला जाना चाहिए और किसी बातचीत को क्रमबद्ध तरीके से करने के लिये बातचीत का एजेन्ड़ा तय किया जाना चाहिए।। परन्तु कोई भी राजनेता इस समस्या के हल के लिये एजेन्डा नहीं बताता।

एक सीधे तरीके से सोचा जाये तो कश्मीर समस्या के तीन हल हो सकते हैं। पहला जम्मू कश्मीर भारत का अंग रहे दूसरा जम्मू कश्मीर पाकिस्तान के साथ जाये तथा तीसरा स्वतंत्र देश। यदि हम दूसरे विकल्प पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि पाकिस्तान 1947 से लेकर आज तक कभी भी ऐसा देश नही रहा है जहां पर मानवधिकारों की स्थिति अच्छी रही हो या इतना विकास हुआ हो कि भारत के मुकाबले वहां पर एक आदमी की जिन्दगी ज्यादा खुशगवार हो। इस पर विचार करने पर पाया जाता है कि पाकिस्तान में मानवाधिकार जैसी किसी बात पर विचार ही नही किया जाता। पाक में अभी तक भूमि सुधार लागू ना होने के कारण पाक की ज्यादातर जमीन केवल 243 जमींदारों के कब्जे में हैं इस कारण वहां पर सामंती तथा कवायली कानूनों से ही रोजाना की जिन्दगी चलती है। इस का उदाहरण मलाला यूसुफ जई को गोली लगना तथा महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक समझना है। पाक ने विश्व को केवल दो चीजें ही निर्यात की है पहली आंतकवाद तथा दूसरी जमीन जैसे कि आर्थिक गलियारे समझौते में पाक चीन को 6000 एकड़ जमीन दे रहा है। पाक में ज्यादातर सेना का शासन रहा जिसके कारण प्रजातंात्रिक विरोध के लिये वहां पर कोई स्थान कभी रहा ही नहीं इसी कारण 80 के दशक में वहां के फौजी़ शासक जिया उल हक ने अमेरिका को अफगनिस्तान में लड़ने के लिये गरीब परिवार के युवाओं को इस्लामी मदरसों के रास्ते से तालिबानी आंतकवादी बनाकर अफगानिस्तान बनाकर अफगानिस्तान में रूसी सेनाओं के विरूद्ध लड़ने के लिये उपलब्ध करवाया। इस कारण जगह जगह पाकिस्तान में आंतकी कैम्प चलाये जा रहे हैं और केवल पाक अधिग्रहित कश्मीर में ही 44 आंतकी कैम्प चल रहे हैं। इन आंतकी सरगनाओं की आपसी वजूद की लड़ाई के कारण आये दिन पाक में बम धमाके तथा अन्य प्रकार की हिंसा देखने में आती है। इस कारण ना तो पाक में कोई विदेशी निवेश ही आ रहा है और ना ही वहां पर कोई औद्योगिक विकास हुआ, जैसा कि विश्व आर्थिक मंच नाम की संस्था की रिपोर्ट में छपा है। इस कारण अभी तक पाक का मुख्य उद्योग कृषि ही है और कृषि की बदहाली के बारे में हालात सब जानते हैं। इस कारण पाक की आर्थिक दशा बहुत खराब है और पाक आर्थिक तथा आंतकवाद के कारण एक फेल गणराज्य घोषित होने की कगार पर है इसको कश्मीर घाटी का बुद्धि जीवी वर्ग अच्छी प्रकार जानता है इस कारण कश्मीर का कोई भी बुद्धिजीवी या आम नागरिक पाक का हिस्सा नहीं बनना चाहता।

दूसरा विकल्प है जनमत संग्रह के द्वारा कश्मीर की स्वतंत्रता के बारे में विचार करने का। इस विकल्प के अनुसार पूरे जम्मू कश्मीर पर विचार करना चाहिये। इस राज्य के तीन भाग जम्मू, कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र है जिनमें कुल 22 जिले हैं। जनमत संग्रह या किसी प्रकार के भारत विरोधी विचार की खबरें जम्मू और लद्दाख से नहीं आ रही हैं। यह भारत विरोधी प्रदर्शन दक्षिण कश्मीर के केवल 6 जिलों तक ही सीमित हैं ऐसा जन विपिन रावत ने टी0वी0 पर पत्रकारों से बात करते हुए कहा है क्योंकि यहां पर पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी पैसों तथा आंतक के द्वारा युवाओं को डराकर उन्हें पत्थरबाजी और अन्य प्रकार की देश विरोधी गतिविधियों के लिये तैयार करते हैं। जैसा कि कुछ समय पहले बड़गाम में देखने में आया कि जब एक आंतकवादी को सुरक्षाबल ने घेर लिया तब किस प्रकार सोशल मीडिया के द्वारा आइएसआइ मुठभेड़ के स्थान पर युवाओं को जाने के लिये प्रेरित कर रही थी। इसके अलावा जनमत संग्रह के लिये संयुक्त राष्ट्र के प्रावधान के अनुसार जनमत संगह पूरे जम्मू कश्मीर में होना चाहिये जिसमें पाक अधिग्रहित कश्मीर तथा चीन के कब्जे वाला क्षेत्र भी हैं। राष्ट्रसंघ के अनुसार जनमत संग्रह में जम्मू कश्मीर के मूल निवासियों द्वारा ही मत का प्रयोग करना चाहिए। परन्तु पाक अधिग्रहित कश्मीर तथा भारत के कब्जे वाले कश्मीर में कश्मीर के मूल निवासी या तो विस्थापित कर दिये गये हैं या जैसे पाक अधिग्रहित कश्मीर में वहां के पंजाब एवं पख्तुनिस्तान के लोगों का बड़ी संख्या में बसना क्योंकि 1974 में पाक के प्रधानमंत्री भुट्टो ने वहाॅ पर पाक के अन्य प्रदेशों के लोगों को बसने के लिए प्रोत्साहित किया जैसा कि पाक के प्रसिद्ध लेखक हुसैन हक्कानी ने अपनी पुस्तक में लिखा है। इस कारण पाक कब्जे वाले कश्मीर में वहाॅ के मूल निवासी अल्पसंख्यक होने के कगार पर है। दूसरी तरफ भारतीय कश्मीर में आंतक के बल पर घाटी से 3 लाख कश्मीरी पंडितों को वहां से पलायन करने पर मजबूर करके घाटी में हिन्दुओं की संख्या न्यूनतम हो गई हैं। इसलिये ना पाक अधिग्रहित कश्मीर और ना ही भारतीय कश्मीर में जनमत संग्रह के लिये असली मतदाता मौजूद हैं। इसके अलावा पाकिस्तान घाटी में इस्लामिक स्टेट के नाम पर कट्टरपंथी इस्लाम के निजामे मुस्तफा की आढ़ में आम मुस्लिमों को आंतक के द्वारा धमका कर भारत विरोधी प्रर्दशनों तथा, यदि जनमत संग्रह हुआ तो अपने पक्ष में वोट डालने के लिये बाध्य करेगा। इसलिये पाक तथा भारतीय कश्मीर में वहां के असली निवासियों तथा पाक के आंतकी माहौल में जनमत संग्रह का विकल्प पूरी तरह से समाप्त हो गया है।

इन हालातों में केवल एक ही विकल्प बचता है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहे जैसा कि आम कश्मीरी पाकिस्तान तथा पूरे दक्षिण एशिया के हालात देखकर सोचता है। इस समय पूरे दक्षिण एशिया तथा खासकर पाकिस्तान तथा कश्मीर के संदर्भ में एक बहुत चिन्ताजनक समझौता पाकिस्तान तथा चीन के बीच बनने वाला आर्थिक गलियारा है, जो चीन के औद्योगिक क्षेत्र को पाकिस्तान के ग्वादर बन्दरगाह से जोड़ेगा। इसके अलावा चीन पूरे पाकिस्तान में आप्टिकल फाइवर केवल का नेटवर्क बिछायेगा जिसके द्वारा चीनी दूरदर्शन पाक के हर हिस्से में चीन की संस्कृति को पहुँचायेगा। इस नेटवर्क का इस्तेमाल चीन पूरे पाक में चैकसी तथा निगरानी के लिये भी करेगा जिसके द्वारा पाक के मुख्य सड़क मार्ग, नगर तथा बाजारों पर चीन की हर समय नजर रहेगी। इस नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने के लिये चीन जगह जगह कंमाड़ सेन्टर बनायेगा जिनमें पूरे नेटवर्क की माॅनिटरिंग के अलावा आपात स्थितियों से निपटने के लिये सैनिक टुकड़िया भी तैनात रहेंगी। इस प्रकार चीन पाकिस्तान में ईस्ट इंडिया कंपनी की कहानी दोहरा रहा है और जिस प्रकार अंग्रजों ने इन्हीं हालातों में पूरे भारत पर कब्जा कर लिया था उसी प्रकार चीन भी एक दिन पाक पर कब्जा कर लेगा तब इन हालातों में क्या स्वतंत्र कश्मीर का अस्तित्व बच गया और जबकि इस गलियारे को जोड़ने वाली सड़क कश्मीर के पड़ोस से ही गुजरती हैं।

जब तथ्यों के आधार पर यह साफ है कि कश्मीरियों का वर्तमान तथा भविष्य केवल भारत के साथ ही सुरक्षित है तब कश्मीर कश्मीरियों को स्वयं पाक की चालों को नाकाम करने के लिये भारत सरकार का साथ देना चाहिये जैसा कि पंजाब जनता ने खालीस्तान आंतक के समय किया था। कश्मीरी जनता के साथ साथ भारत सरकार तथा वहां की सरकार को तुष्टिकरण के स्थान पर ऐसे कदम उठाने चाहिए जिनसे कुछ गिने चुने अलगाववादी तथा आंतकवादी अपने पाकिस्तानी आकाओं से अलग थलग पकड़कर वहां की जनता को डराने की कोशिश न करें। तुष्टिकरण के बडे़ उदाहरण हैं अभी अभी प्रकाश में आया है कि कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों की सड़क द्वारा पाक के साथ सूखे मेवों के व्यापार के नाम पर 1500 करोड़ की धनराशि अलगाववादियों एवं आंतकियों के पास पहुँचनी। इसके अलावा आंतकवाद से प्रभावित होने के नाम पर केन्द्र द्वारा दिये जाने वाले आर्थिक पैकेज। इसकी पुष्टि राष्ट्रीय जांच संस्था की रिपोर्ट तथा समाचार-पत्रों में किया जा रहा है। यह सर्वविदित है कि अक्सर इस प्रकार के पैकेज पाने तथा इसमें मिली धनराशि में भृष्टाचार तथा हेराफेरी करके पैसे कमाने के उद्देश्य से कुछ स्वार्थी तत्व आंतकवाद को कश्मीर में जीवित रखना चाहते हैं। सीमावर्ती व्यापार के बारे में और पाक जैसे दुश्मन देश के साथ होने वाले लेनदेन के बारे में सामान्तया भारत की उच्चतम इन्टलीजैन्स एजेंसी आइवी तथा राॅ को चैंकन्ना रहना रहना चाहिए था तथा इसके हर लेनदेन पर इनके साथ साथ आयकर विभाग की भी नजर होनी चाहिए थी। परन्तु इस व्यापार को करने वाले कश्मीर के प्रभावशाली लोगों के होने के कारण लम्बे समय से इस रास्ते से पाकिस्तान अलगावादियों एवं आंतकियों तक पैसा तथा हथियार भेजता रहा और भारतीय तंत्र इनको नाराज न करने के चक्कर में इस सबको चुपचाप देखता रहा और अब भी एनआइए ने तब कार्यवाही की है जब हालात बिलकुल खराब हो गये हैं।

इन सबको देखते हुए स्वयं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि कश्मीर की समस्या को केवल नरेंद्र मोदी ही सुलझा सकते हैं क्योंकि अब तक की कांग्रेसी सरकार देश के अन्य हिस्सों की तरह कश्मीर में भी केवल तुष्टिकरण ही करती रही और इसी तुष्टिकरण का प्रमाण है कि आज तक एक भी कश्मीरी आंतकी देशविरोधी गतिविरोधियों में लिप्त अपराधी को अदालतों से कोई सजा मिली हो। जैसा कि मसरत आलम तथा अन्य इसी प्रकार के प्रकरणों में देखने में आया। इसलिये अब देश आशा कर रहा है कि केंद्र सरकार कश्मीर के नागरिकों को पर्याप्त सुरक्षा देकर यह सुनिश्चित करेगी कि अलगाववादी या आंतकी एक आम कश्मीरी या नौजवान को अपने प्रोपगैंड़ा या धमकियों से ना तो बहका सके और ना ही उन्हें बाध्य कर सके। इसके लिए कड़े कदमों के रूप में कश्मीर में सोशल मीडिया तथा पाक टीवी पर पूरी तरह रोक लगानी चाहिये इसके अलावा बोलने के आजादी के नाम पर देश विरोधी गतिविधियां चलाने वालों के विरूद्ध ऐसी कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए जो इस प्रकार के अन्य तत्वों के लिये उदाहरण बन सके। कश्मीर पर मानवाधिकारों के नाम पर राजनीति करने वाले राजनैतिज्ञों तथा अरूणधती राय जैसे बुद्धिजीवियों को भी राजनीति से ऊपर उठकर कश्मीर की भोली भाली जनता को पाक जैसे नरक में जाने से रोकने में सरकार तथा सुरक्षा बलों की मदद करनी चाहिये। इनको भारत की पाकिस्तान से वापस आई उज्मा नाम की लड़की के कथन पर विश्वास करके पाकिस्तान करके आंतरिक हालातों के बारे में जनता को शिक्षित करके पाक के चुंगल में फँसने से बचाना चाहिये।

संदर्भ -

1. पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारे पर पाकिस्तानी अखबार डान में छपी रिपोर्ट।
2. हुसैन हक्कानी की किताब-मस्जिद में मिलिट्री।
3. राष्ट्रीय जांच संस्था की रिपोर्ट।
4. कश्मीरी बुद्धिजीवियों के विचार।

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